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रुद्रप्रयाग : उत्तराखंड के केदारनाथ धाम जाने वाले पैदल मार्ग पर पर्यावरणीय नियमों के कथित उल्लंघन का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) पहुंच गया है। शिकायत में सीवेज के उचित शोधन, नालों को सीवर नेटवर्क से जोड़ने और ठोस कचरे के प्रबंधन में कमियों का आरोप लगाया गया है। मामले की सुनवाई करते हुए एनजीटी ने उत्तराखंड सरकार सहित संबंधित विभागों और अधिकारियों से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 17 दिसंबर 2026 को होगी।
यह मामला सोनप्रयाग-गौरीकुंड-केदारनाथ तीर्थयात्रा मार्ग से जुड़ा है। पर्यावरणीय नियमों के पालन को लेकर दायर आवेदन में कहा गया है कि यात्रा मार्ग और आसपास के क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियों के अनुरूप अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था पर्याप्त होनी चाहिए।
किन विभागों को जारी हुए नोटिस?
एनजीटी ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तराखंड जल संस्थान, रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी, राज्य के मुख्य सचिव और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को नोटिस जारी किए हैं। यह आवेदन 22 सितंबर को नोएडा के पर्यावरण कार्यकर्ता अमित गुप्ता ने दाखिल किया था। अधिकरण ने अपने आदेश में कहा कि आवेदन में पर्यावरणीय मानकों के अनुपालन से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया है। संबंधित विभागों से जवाब मिलने के बाद मामले की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल आरोपों पर एनजीटी की ओर से कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।
सीवेज ट्रीटमेंट की क्षमता पर सवाल
आवेदन में केदारनाथ और गौरीकुंड में सीवेज शोधन की मौजूदा क्षमता को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, केदारनाथ में प्रतिदिन 600 किलोलीटर क्षमता वाला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है, जबकि गौरीकुंड में इसकी क्षमता 200 किलोलीटर प्रतिदिन बताई गई है।
आवेदन में दावा किया गया है कि यात्रा के चरम समय में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के कारण मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती। याचिकाकर्ता ने केदारनाथ में शोधन क्षमता बढ़ाकर 1,000 किलोलीटर प्रतिदिन करने की जरूरत बताई है। ये याचिका में किए गए दावे हैं, जिनकी पुष्टि संबंधित विभागों के जवाब और उपलब्ध आंकड़ों से होनी बाकी है।
नालों और ठोस कचरे के निस्तारण पर भी चिंता
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ नाले सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं हैं। इससे बिना पर्याप्त शोधन वाले अपशिष्ट जल के निस्तारण को लेकर चिंता जताई गई है। इसके अलावा पैदल मार्ग पर ठोस कचरे के संग्रह, परिवहन और निस्तारण की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि व्यवस्था तैयार करते समय केवल स्थानीय आबादी को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। यात्रा के दौरान पहुंचने वाले श्रद्धालुओं, दुकानों, ठहरने की जगहों और अन्य गतिविधियों से पैदा होने वाले अपशिष्ट का भी आकलन किया जाना चाहिए।
17 दिसंबर को होगी अगली सुनवाई
रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी ने कहा है कि एनजीटी के आदेश का विस्तृत अध्ययन करने के बाद मौजूदा व्यवस्थाओं और लगाए गए आरोपों की स्थिति स्पष्ट होगी। संबंधित विभागों के जवाब से सीवेज शोधन, जल निकासी और कचरा प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर जानकारी सामने आने की उम्मीद है।
केदारनाथ क्षेत्र हिमालय के संवेदनशील पर्यावरणीय इलाकों में शामिल है। यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में यात्रा सुविधाओं के विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण और कचरे के उचित निस्तारण की व्यवस्था बनाए रखना महत्वपूर्ण है। अब मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर को होगी। उस दौरान संबंधित विभागों के जवाब और पर्यावरणीय नियमों के पालन से जुड़े तथ्यों पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
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