उत्तराखंड

मानसून ने बिगाड़ी उत्तराखंड की पेयजल व्यवस्था

Kavita2
2 Sept 2026 1:49 PM IST
मानसून ने बिगाड़ी उत्तराखंड की पेयजल व्यवस्था
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देहरादून। उत्तराखंड में मानसून की तेज बारिश, भूस्खलन और नदी-नालों के उफान ने पेयजल व्यवस्था को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। एक जुलाई से अब तक राज्य के 10 जिलों में कुल 1558 पेयजल योजनाएं आपदा की चपेट में आकर क्षतिग्रस्त हुई हैं। सबसे अधिक नुकसान देहरादून जिले में हुआ है, जहां 521 योजनाएं प्रभावित हुईं। वहीं रुद्रप्रयाग में सबसे कम तीन पेयजल योजनाओं को नुकसान पहुंचा है।

उत्तराखंड जल संस्थान ने फिलहाल सभी क्षतिग्रस्त योजनाओं को अस्थायी रूप से बहाल कर पेयजल आपूर्ति सामान्य करने का दावा किया है। इस काम पर अब तक 363.52 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। हालांकि योजनाओं की स्थायी मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए 2791.09 लाख रुपये यानी करीब 27.91 करोड़ रुपये की आवश्यकता बताई गई है।

जल संस्थान ने नुकसान और जरूरी बजट से संबंधित रिपोर्ट शासन को भेजकर धनराशि उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।

बारिश और भूस्खलन से पेयजल व्यवस्था प्रभावित

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में मानसून के दौरान भारी बारिश के साथ भूस्खलन और मलबा आने की घटनाओं का सीधा असर पेयजल योजनाओं पर पड़ा है। कई स्थानों पर पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हुई हैं तो कुछ जगह जलस्रोत और योजनाओं से जुड़े अन्य ढांचे प्रभावित हुए हैं।

पहाड़ी इलाकों में पेयजल पाइपलाइन कई बार नदी, नाले और ढलान वाले क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं। तेज बारिश के बाद जमीन खिसकने या नदी-नालों का जलस्तर बढ़ने से इन पर नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।

देहरादून में सबसे ज्यादा 521 योजनाएं प्रभावित

जल संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इस मानसून सीजन में देहरादून जिले में पेयजल योजनाओं को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यहां 521 योजनाएं क्षतिग्रस्त दर्ज की गई हैं।

राजधानी देहरादून के शहरी क्षेत्र के साथ जिले में बड़े ग्रामीण और पर्वतीय इलाके भी हैं। मानसून के दौरान कई क्षेत्रों में भारी बारिश और मलबा आने की घटनाओं ने पेयजल ढांचे को प्रभावित किया।

इसके विपरीत रुद्रप्रयाग जिले में केवल तीन योजनाओं के क्षतिग्रस्त होने की जानकारी दी गई है। बाकी प्रभावित योजनाएं अन्य आठ जिलों में हैं।

1558 योजनाओं को अस्थायी रूप से किया बहाल

पेयजल योजनाओं के क्षतिग्रस्त होने के बाद जल संस्थान के सामने सबसे पहली चुनौती प्रभावित इलाकों में पानी की आपूर्ति बहाल करने की थी। विभाग के अनुसार सभी 1558 योजनाओं को अस्थायी रूप से चालू कर दिया गया है।

अस्थायी बहाली में क्षतिग्रस्त पाइपलाइन की तत्काल मरम्मत, वैकल्पिक पाइपलाइन बिछाने और जरूरत के अनुसार दूसरे स्रोतों से आपूर्ति जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।

इससे लोगों को तत्काल राहत मिली है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए योजनाओं की व्यापक मरम्मत जरूरी होगी।

अस्थायी बहाली पर 3.63 करोड़ खर्च

उत्तराखंड जल संस्थान ने सभी प्रभावित योजनाओं को अस्थायी रूप से बहाल करने के लिए 363.52 लाख रुपये यानी करीब 3.63 करोड़ रुपये खर्च किए हैं।

यह राशि मुख्य रूप से तत्काल पेयजल आपूर्ति शुरू करने और आपदा से प्रभावित ढांचे को कामचलाऊ तरीके से दुरुस्त करने में खर्च की गई है।

हालांकि अस्थायी मरम्मत लंबे समय तक पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। भविष्य में बारिश या दूसरी प्राकृतिक आपदा के दौरान कमजोर हिस्से फिर क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

स्थायी मरम्मत के लिए चाहिए 27.91 करोड़

जल संस्थान ने क्षतिग्रस्त योजनाओं की स्थायी मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए 2791.09 लाख रुपये की जरूरत बताई है। यह राशि करीब 27.91 करोड़ रुपये होती है।

संस्थान ने शासन से इस धनराशि की उपलब्धता सुनिश्चित करने का आग्रह किया है। बजट मिलने के बाद योजनाओं के क्षतिग्रस्त हिस्सों को स्थायी रूप से ठीक करने का काम शुरू किया जा सकेगा।

पाइपलाइन समेत कई ढांचों को नुकसान

शासन को भेजी गई रिपोर्ट में बताया गया है कि बारिश, भूस्खलन, मलबा और नदी-नालों के उफान से पेयजल योजनाओं की पाइपलाइन सहित अन्य ढांचों को नुकसान हुआ है।

कई पर्वतीय क्षेत्रों में पाइपलाइन लंबी दूरी तय कर गांवों तक पानी पहुंचाती हैं। रास्ते में भूस्खलन होने से पाइप टूटने या बहने का खतरा रहता है। इसी तरह तेज बहाव वाले नालों और नदियों के आसपास बने ढांचे भी मानसून में प्रभावित हो सकते हैं।

शासन से बजट की मांग

जल संस्थान ने अपनी रिपोर्ट के साथ शासन से स्थायी मरम्मत के लिए आवश्यक बजट जारी करने का अनुरोध किया है। विभाग का जोर इस बात पर है कि मानसून के दौरान की गई अस्थायी व्यवस्था को जल्द स्थायी रूप दिया जाए।

अगर कमजोर पाइपलाइन और अन्य ढांचे समय रहते मजबूत नहीं किए जाते हैं तो भविष्य में बारिश के दौरान पेयजल आपूर्ति फिर बाधित हो सकती है।

पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी चुनौती

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में पेयजल योजनाओं की मरम्मत मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होती है। दुर्गम इलाकों तक सामग्री पहुंचाना और भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में काम करना मुश्किल होता है।

बारिश जारी रहने पर मरम्मत कार्य भी प्रभावित हो सकता है। कई बार एक स्थान पर पाइपलाइन ठीक करने के बाद दूसरी जगह भूस्खलन से नुकसान हो जाता है।

यही वजह है कि मानसून के दौरान विभाग को लगातार योजनाओं की निगरानी करनी पड़ती है।

पेयजल आपूर्ति बनाए रखना प्राथमिकता

किसी भी क्षेत्र में पेयजल योजना क्षतिग्रस्त होने का सीधा असर स्थानीय आबादी पर पड़ता है। इसलिए आपदा के बाद पानी की आपूर्ति जल्द बहाल करना आवश्यक होता है।

जल संस्थान का कहना है कि इस बार प्रभावित सभी योजनाओं को अस्थायी रूप से बहाल कर दिया गया है। अब विभाग का ध्यान स्थायी मरम्मत के लिए बजट प्राप्त करने पर है।

मानसून के बाद बड़े स्तर पर मरम्मत की जरूरत

एक जुलाई से अब तक 1558 योजनाओं का क्षतिग्रस्त होना राज्य के पेयजल ढांचे पर मानसून के असर को दर्शाता है। सभी योजनाओं को अस्थायी रूप से चालू कर दिया गया है, लेकिन करीब 27.91 करोड़ रुपये की स्थायी मरम्मत अभी बाकी है।

शासन से बजट मिलने के बाद जल संस्थान क्षतिग्रस्त पाइपलाइन और अन्य संरचनाओं के पुनर्निर्माण का काम आगे बढ़ा सकेगा। फिलहाल विभाग को मानसून के शेष समय में इन अस्थायी रूप से बहाल योजनाओं पर विशेष निगरानी रखनी होगी, ताकि दोबारा नुकसान होने पर पेयजल आपूर्ति लंबे समय तक बाधित न हो।

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