उत्तराखंड

उत्तराखंड हाईकोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग को बड़ा झटका, REC ने फिर खारिज किया प्रस्ताव

Kavita2
27 Oct 2026 4:07 PM IST
उत्तराखंड हाईकोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग को बड़ा झटका, REC ने फिर खारिज किया प्रस्ताव
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नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की लंबे समय से चल रही कवायद को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट के स्थायी स्थानांतरण के लिए प्रस्तावित वन भूमि के उपयोग संबंधी प्रस्ताव को रीजनल इंपावर्ड कमेटी (आरईसी) ने विचार-विमर्श के बाद खारिज कर दिया है। समिति ने प्रस्ताव में कई महत्वपूर्ण कमियों की ओर संकेत किया है। विशेष रूप से परियोजना के लिए वन भूमि के चयन और वैकल्पिक गैर-वन भूमि की उपलब्धता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरईसी ने प्रस्ताव को वन संरक्षण संबंधी दिशानिर्देशों के पैरा 1.10 (i) के आधार पर अस्वीकार किया है। समिति ने पाया कि प्रस्तावित परियोजना नॉन-साइट-स्पेसिफिक श्रेणी की है। इसका अर्थ है कि हाईकोर्ट परिसर का निर्माण अनिवार्य रूप से उसी वन भूमि पर करना आवश्यक साबित नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त परियोजना के लिए उपयुक्त वैकल्पिक गैर-वन भूमि की संभावनाओं का पर्याप्त परीक्षण नहीं किए जाने को भी प्रस्ताव खारिज करने का प्रमुख कारण बताया गया है।

हल्द्वानी में हाईकोर्ट शिफ्ट करने की योजना को झटका

उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना कई वर्षों से चर्चा में है। नैनीताल में सीमित स्थान, बढ़ता यातायात दबाव, न्यायिक परिसर के विस्तार की चुनौतियां और दूरदराज से आने वाले वादकारियों की परेशानियों को देखते हुए हाईकोर्ट को सुविधाजनक स्थान पर स्थानांतरित करने की आवश्यकता महसूस की जाती रही है।

इसी क्रम में हल्द्वानी को संभावित विकल्प के रूप में चुना गया था। राज्य सरकार ने अगस्त 2026 में हल्द्वानी के बेल बाबा मंदिर के पास स्थित वन भूमि पर नए हाईकोर्ट परिसर के निर्माण के लिए प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की थी।

योजना के अनुसार, लगभग 73 हेक्टेयर के चिह्नित वन क्षेत्र में से 30 हेक्टेयर जमीन का इस्तेमाल नए न्यायिक परिसर के निर्माण के लिए किया जाना प्रस्तावित था। हालांकि, वन भूमि के उपयोग के लिए आवश्यक वैधानिक स्वीकृतियां मिलना बाकी थीं।

REC ने प्रस्ताव खारिज करने के पीछे बताए ये कारण

रीजनल इंपावर्ड कमेटी ने प्रस्ताव की समीक्षा के दौरान वन संरक्षण से जुड़े नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं को महत्वपूर्ण माना।

प्राप्त विवरण के मुताबिक, समिति की आपत्तियों का मुख्य आधार यह रहा कि प्रस्तावित हाईकोर्ट परिसर नॉन-साइट-स्पेसिफिक परियोजना है। ऐसी परियोजनाओं के लिए यह जांचना आवश्यक होता है कि क्या निर्माण किसी गैर-वन भूमि पर भी किया जा सकता है।

समिति ने यह भी पाया कि वैकल्पिक गैर-वन भूमि की तलाश पर्याप्त रूप से नहीं की गई। ऐसे में वन क्षेत्र का उपयोग करने की आवश्यकता को संतोषजनक ढंग से स्थापित नहीं किया जा सका।

यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वन भूमि को गैर-वन कार्यों के लिए इस्तेमाल करने से पहले नियमानुसार केंद्रीय स्वीकृति और अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन करना होता है।

क्या होता है नॉन-साइट-स्पेसिफिक प्रोजेक्ट?

वन संरक्षण की दृष्टि से नॉन-साइट-स्पेसिफिक परियोजना ऐसी परियोजना को कहा जाता है, जिसे किसी एक विशेष स्थान पर ही स्थापित करना अनिवार्य नहीं होता।

उदाहरण के तौर पर ऐसी इमारतें या संस्थागत परिसर, जिनके निर्माण के लिए अन्य उपयुक्त स्थान भी तलाशे जा सकते हैं, इस श्रेणी में आ सकते हैं।

इसके विपरीत कुछ परियोजनाएं अपनी तकनीकी या भौगोलिक जरूरतों के कारण निश्चित स्थान पर ही बनाई जा सकती हैं।

हाईकोर्ट के नए परिसर के संबंध में समिति की आपत्ति का मूल विषय यही है कि वन भूमि का विकल्प क्यों चुना गया और इसके स्थान पर दूसरी उपयुक्त गैर-वन भूमि का चयन क्यों नहीं किया जा सकता।

पहले गौलापार में भी अटक चुकी है स्थानांतरण योजना

उत्तराखंड हाईकोर्ट की शिफ्टिंग को लेकर यह पहली बाधा नहीं है। इससे पहले हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में नए न्यायिक परिसर के निर्माण की योजना बनाई गई थी।

वर्ष 2023 में गौलापार में लगभग 26 हेक्टेयर भूमि पर हाईकोर्ट परिसर स्थापित करने की योजना सामने आई थी। हालांकि, वन भूमि और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी आपत्तियों के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।

मई 2024 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी गौलापार की प्रस्तावित भूमि पर बड़ी संख्या में पेड़ होने का उल्लेख करते हुए वहां निर्माण नहीं करने की बात कही थी। इसके बाद नए स्थान की तलाश शुरू हुई।

इसी प्रक्रिया के तहत बाद में हल्द्वानी के बेल बाबा मंदिर के निकट भूमि चिह्नित की गई।

वन संरक्षण और पर्यावरणीय चिंताओं पर भी विवाद

हाईकोर्ट के स्थानांतरण को लेकर पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा लगातार उठता रहा है। प्रस्तावित भूमि के वन क्षेत्र में होने के कारण पर्यावरणीय प्रभाव, वन्यजीवों की आवाजाही और वन संरक्षण कानूनों के अनुपालन पर सवाल सामने आए हैं।

अक्टूबर 2026 में केंद्र सरकार ने भी प्रस्तावित वन भूमि के हस्तांतरण से संबंधित नियमों के कथित उल्लंघन की शिकायत पर राज्य सरकार से जांच करने और आवश्यक कार्रवाई के लिए कहा था।

हालांकि, किसी परियोजना के लिए वन भूमि चिह्नित किए जाने और उस भूमि को निर्माण कार्य के लिए अंतिम स्वीकृति मिलने में महत्वपूर्ण कानूनी अंतर होता है।

हाईकोर्ट में भी पहुंच चुका है शिफ्टिंग का मामला

नैनीताल से हल्द्वानी हाईकोर्ट स्थानांतरित करने का मामला न्यायिक प्रक्रिया का भी हिस्सा बन चुका है।

सितंबर 2026 में उत्तराखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने स्थानांतरण से संबंधित भूमि चयन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।

अदालत ने माना था कि उस समय परियोजना भूमि चिह्नित करने के चरण में थी। वन भूमि का उपयोग या उसका आरक्षण समाप्त करने की स्थिति आने पर केंद्र सरकार की आवश्यक मंजूरी लेनी होगी।

अदालत ने नैनीताल में स्थान और बुनियादी सुविधाओं की कमी तथा वादकारियों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का भी उल्लेख किया था।

अब राज्य सरकार के सामने क्या विकल्प?

आरईसी के स्तर पर प्रस्ताव खारिज होने के बाद हाईकोर्ट स्थानांतरण की प्रक्रिया में नई चुनौतियां सामने आ गई हैं।

आगे की कार्रवाई के लिए संबंधित विभागों को समिति की आपत्तियों का अध्ययन करना होगा। विशेष रूप से वैकल्पिक गैर-वन भूमि की उपलब्धता और प्रस्तावित स्थल के चयन का औचित्य महत्वपूर्ण रहेगा।

यदि राज्य सरकार स्थानांतरण की योजना आगे बढ़ाती है, तो उसे निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप अगला कदम उठाना होगा।

फिलहाल इस फैसले से हल्द्वानी में प्रस्तावित नए हाईकोर्ट परिसर के निर्माण की योजना को झटका लगा है। हालांकि, भूमि संबंधी प्रस्ताव खारिज होने का अर्थ हाईकोर्ट स्थानांतरण की संपूर्ण योजना का स्थायी रूप से समाप्त होना नहीं है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार वैकल्पिक जमीन की तलाश करती है या प्रस्तावित स्थल के संबंध में नियमों के अनुरूप आगे कोई नई पहल करती है।

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