उत्तराखंड

उत्तराखंड में ग्लेशियर झील की बाढ़ से बचाव की बड़ी पहल

Ratna Netam
13 Oct 2026 10:00 PM IST
उत्तराखंड में ग्लेशियर झील की बाढ़ से बचाव की बड़ी पहल
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देहरादून। उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर झील के फटने से अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को कम करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। राज्य सरकार ने मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को बताया कि वसुंधरा ताल में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की निगरानी के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों की टीम ने करीब 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस ग्लेशियर झील में आधुनिक सेंसर लगाए हैं। इनकी मदद से झील के जलस्तर और अन्य बदलावों की निगरानी की जा सकेगी।राज्य सरकार के अनुसार, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, खराब मौसम और दुर्गम रास्तों के बावजूद वैज्ञानिक टीम ने अपना अभियान सफलतापूर्वक पूरा किया। टीम के सुरक्षित लौटने पर आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) में विशेषज्ञों का स्वागत किया।
वसुंधरा ताल में लगाए गए आधुनिक सेंसर
चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल उच्च हिमालयी क्षेत्र की महत्वपूर्ण ग्लेशियर झीलों में शामिल है। समुद्र तल से लगभग 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित इस झील की गहराई करीब 38 मीटर बताई गई है।झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का उद्देश्य जलस्तर में होने वाले बदलाव और संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना है।इस प्रणाली को केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की नेविकसित किया है। इसे वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के सहयोग से स्थापित किया गया है।वैज्ञानिकों ने झील के भीतर और आसपास सेंसर लगाए हैं, जिनसे जलस्तर, मौसम और अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों की निगरानी में मदद मिलेगी।
खराब मौसम में भी वैज्ञानिकों ने पूरा किया अभियान
उच्च हिमालयी क्षेत्र में वैज्ञानिक उपकरण स्थापित करना आसान काम नहीं है। अत्यधिक ऊंचाई, कम तापमान, खराब मौसम और दुर्गम रास्ते इस प्रकार के अभियानों को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।इसके बावजूद वैज्ञानिक और तकनीकी टीम ने निर्धारित कार्यों को पूरा किया।इस अभियान के लिए 30 सितंबर को देहरादून से विशेषज्ञों का दल रवाना हुआ था। दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान और वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञ शामिल थे।अभियान का उद्देश्य वसुंधरा ताल में आधुनिक निगरानी प्रणाली स्थापित करने के साथ ग्लेशियर झील से जुड़े जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन करना था।
कैसे काम करेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम?
ग्लेशियर झील के अचानक टूटने या बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकलने से तेज बाढ़ आ सकती है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहा जाता है।इस प्रकार की बाढ़ पहाड़ी क्षेत्रों में नदियों के जलस्तर को अचानक बढ़ा सकती है और निचले क्षेत्रों में गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।नई चेतावनी प्रणाली झील की परिस्थितियों में बदलाव का पता लगाने में मदद करेगी। सेंसर से प्राप्त जानकारी के आधार पर संबंधित अधिकारी संभावित खतरे का आकलन कर सकेंगे।इस प्रणाली का उद्देश्य आपदा प्रबंधन एजेंसियों को समय रहते सूचना उपलब्ध कराना है, ताकि आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जा सकें।हालांकि, किसी भी चेतावनी प्रणाली की वास्तविक प्रभावशीलता उसकी लगातार निगरानी, संचार व्यवस्था और समय पर चेतावनी पहुंचाने की क्षमता पर निर्भर करती है।
आपदा प्रबंधन सचिव ने किया टीम का स्वागत
आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने अभियान पूरा कर लौटे वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का स्वागत किया।उन्होंने उच्च हिमालयी क्षेत्र में चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच किए गए कार्य की सराहना की।राज्य सरकार का उद्देश्य ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाना है।इस पहल के माध्यम से आपदा जोखिम न्यूनीकरण और पूर्व चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है।
उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों पर विशेष नजर
उत्तराखंड में हिमालयी ग्लेशियरों और उनसे बनी झीलों की संख्या काफी अधिक है।राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, वर्ष 2023 के आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई थी।इनमें कुछ झीलों को संभावित खतरे के आधार पर विशेष निगरानी की आवश्यकता वाली श्रेणी में रखा गया है।वसुंधरा ताल में चेतावनी प्रणाली लगाने का फैसला इसी जोखिम को ध्यान में रखते हुए किया गया है। राष्ट्रीय ग्लोफ जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत ऐसी झीलों की निगरानी मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
भविष्य में आपदा से बचाव में मिलेगी मदद
वसुंधरा ताल में अर्ली वार्निंग सिस्टम का पहला चरण पूरा होना उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण कदम है।इससे ग्लेशियर झील की परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन करने और संभावित बदलावों की समय पर पहचान करने में सहायता मिल सकती है।राज्य सरकार की योजना उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आधुनिक निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र को और मजबूत करने की है।फिलहाल वसुंधरा ताल में सेंसर लगाने का शुरुआती कार्य पूरा हो चुका है। आगे प्रणाली की निगरानी, डेटा संचार और चेतावनी तंत्र की प्रभावशीलता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा।
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