उत्तराखंड

धामी सरकार का बड़ा फैसला, मदरसों में धार्मिक शिक्षा के लिए नई व्यवस्था

Kavita2
30 Oct 2026 9:59 AM IST
धामी सरकार का बड़ा फैसला, मदरसों में धार्मिक शिक्षा के लिए नई व्यवस्था
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देहरादून। उत्तराखंड में मदरसों सहित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने राज्य के अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए धार्मिक शिक्षा का नया पाठ्यक्रम तैयार कराया है। कक्षा एक से आठवीं तक का पाठ्यक्रम पहले ही तैयार हो चुका है, जबकि नौवीं से 12वीं तक के पाठ्यक्रम का मसौदा भी अंतिम रूप ले चुका है। अब इसे मंजूरी दिलाने और शिक्षण संस्थानों में लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का दावा है कि इस प्रकार का राज्यस्तरीय औपचारिक धार्मिक शिक्षा पाठ्यक्रम तैयार करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बनेगा। इस पाठ्यक्रम में धार्मिक मान्यताओं के साथ भारतीय इतिहास, संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय एकता और महान व्यक्तित्वों के योगदान को भी शामिल किया गया है। हालांकि पाठ्यक्रम लागू करने की अंतिम तारीख की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।

राज्य सरकार की इस पहल का उद्देश्य मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा के साथ उनकी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना है। इसके लिए विभिन्न धार्मिक समुदायों के शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की सहायता ली गई है। पाठ्यक्रम तैयार करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि विद्यार्थियों को केवल धार्मिक मान्यताओं की जानकारी ही न मिले, बल्कि वे देश के इतिहास, महान स्वतंत्रता सेनानियों और समाज के विकास में योगदान देने वाले व्यक्तित्वों के बारे में भी जान सकें।

उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, कक्षा एक से आठवीं तक का धार्मिक शिक्षा पाठ्यक्रम तैयार किया जा चुका है। इसके बाद नौवीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए भी पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया पूरी की गई है। अक्टूबर में आयोजित प्राधिकरण की बैठक में मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध समुदायों से जुड़े शिक्षाविदों ने अपने-अपने विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया। विशेषज्ञ समितियों ने धार्मिक शिक्षा से संबंधित पाठ्यक्रमों को अंतिम रूप दिया। उच्च कक्षाओं के पाठ्यक्रम को शासन की स्वीकृति के लिए भेजने की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।

नई शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि धार्मिक शिक्षा को विद्यार्थियों के लिए वैकल्पिक रखा जाएगा। किसी भी छात्र को उसकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक पाठ्यक्रम पढ़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में नियमित आधुनिक शिक्षा पहले की तरह अनिवार्य रहेगी। धार्मिक शिक्षा के लिए अलग समय निर्धारित किया जाएगा, ताकि विद्यार्थियों की मुख्य शैक्षणिक पढ़ाई प्रभावित न हो।

प्राधिकरण की व्यवस्था के अनुसार, धार्मिक शिक्षा की कक्षाएं नियमित विद्यालय समय शुरू होने से पहले या छुट्टी के बाद आयोजित की जा सकेंगी। इससे विद्यार्थियों को गणित, विज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी और अन्य विषयों की नियमित पढ़ाई के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों का अध्ययन करने का अवसर मिलेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य आधुनिक शिक्षा और धार्मिक अध्ययन के बीच संतुलन स्थापित करना है।

पाठ्यक्रम में धार्मिक इतिहास, परंपराओं, दर्शन और सांस्कृतिक विरासत को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसके अलावा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों के बारे में भी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी। प्राधिकरण का मानना है कि इससे विद्यार्थियों में अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और उन्हें भारत के विविध इतिहास को समझने का अवसर मिलेगा।

उत्तराखंड सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए पहले ही महत्वपूर्ण प्रशासनिक बदलाव किए हैं। राज्य में मदरसा बोर्ड की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर एक जुलाई 2026 से उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को सक्रिय किया गया। इसके तहत अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता और शिक्षा व्यवस्था को नए ढांचे में लाने की प्रक्रिया शुरू हुई। धार्मिक शिक्षा के लिए प्राधिकरण और आधुनिक शिक्षा के लिए संबंधित शिक्षा विभाग के मानकों का पालन करने की व्यवस्था बनाई गई है।

इस बदलाव का प्रभाव केवल मदरसों तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य के अन्य मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में भी संबंधित समुदायों के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम उपलब्ध कराया जाएगा। इनमें मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध समुदायों से जुड़े संस्थान शामिल हैं। विशेष रूप से तिब्बती बौद्ध शिक्षण संस्थानों के लिए भी राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की योजना है।

अब तक कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में धार्मिक विषयों की पढ़ाई अलग-अलग व्यवस्थाओं और परंपराओं के अनुसार कराई जाती रही है। नए पाठ्यक्रम के माध्यम से धार्मिक शिक्षा के लिए एक व्यवस्थित ढांचा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी धर्मों के विद्यार्थियों को एक ही धार्मिक सामग्री पढ़ाई जाएगी। अलग-अलग समुदायों की मान्यताओं और परंपराओं को ध्यान में रखते हुए उनके लिए पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं।

प्राधिकरण की प्रस्तावित व्यवस्था में धार्मिक शिक्षा से संबंधित परीक्षाएं आयोजित करने और विद्यार्थियों को प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने की भी योजना है। हालांकि इन प्रमाणपत्रों की मान्यता और परीक्षा संबंधी विस्तृत नियमों पर स्थिति स्पष्ट होना अभी बाकी है। शासन की मंजूरी के बाद इन व्यवस्थाओं के लागू होने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

राज्य सरकार की इस पहल को अल्पसंख्यक शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का उद्देश्य विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना और साथ ही उन्हें धार्मिक तथा सांस्कृतिक विरासत का अध्ययन करने का विकल्प देना है। हालांकि नई व्यवस्था की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि शिक्षण संस्थानों में प्रशिक्षित शिक्षक, आवश्यक अध्ययन सामग्री और उचित शैक्षणिक संसाधन कितनी प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराए जाते हैं।

इस बीच नौवीं से 12वीं तक के पाठ्यक्रम को मंजूरी मिलने और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हाथों इसके औपचारिक विमोचन की तैयारियों को लेकर चर्चा है। लेकिन विमोचन की निश्चित तारीख और लागू करने संबंधी अंतिम आदेश की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल इसे प्रस्तावित एवं तैयार पाठ्यक्रम के रूप में देखा जा रहा है।

उत्तराखंड की इस पहल पर अन्य राज्यों की भी नजर रह सकती है। यदि यह व्यवस्था सफल होती है तो अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में आधुनिक शिक्षा और वैकल्पिक धार्मिक अध्ययन को एक साथ संचालित करने का मॉडल विकसित हो सकता है। फिलहाल राज्य सरकार और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की प्राथमिकता पाठ्यक्रम की स्वीकृति तथा उसे व्यवस्थित रूप से लागू करने की प्रक्रिया पूरी करना है।

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