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कुमाऊनी रीति-रिवाज से एक हुए नवीन और मोराया
हल्द्वानी: दुबई में शुरू हुई दोस्ती और फिर प्यार में बदले रिश्ते को उत्तराखंड में शादी का मुकाम मिला। बागेश्वर के नवीन परिहार और थाईलैंड की मोराया ने हल्द्वानी के शीतला देवी मंदिर में कुमाऊनी रीति-रिवाजों के अनुसार सात फेरे लिए। मंगलवार, 20 अक्टूबर को दशहरे के अवसर पर दोनों विवाह बंधन में बंधे। इस मौके पर नवीन के परिजनों के साथ मोराया के परिवार के सदस्य भी मौजूद रहे। अलग-अलग देशों से जुड़े इस जोड़े ने स्थानीय परंपराओं के बीच नए जीवन की शुरुआत की।
नवीन परिहार मूल रूप से बागेश्वर जिले के उडल गांव के रहने वाले हैं। उनके पिता पूरन सिंह परिहार बीएसएफ से सेवानिवृत्त हैं। नवीन ने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई बागेश्वर में पूरी की। इसके बाद उन्होंने हल्द्वानी से होटल मैनेजमेंट का कोर्स किया और रोजगार के सिलसिले में दुबई चले गए। वहीं उनकी मुलाकात थाईलैंड की रहने वाली मोराया से हुई। शुरुआत में दोनों के बीच परिचय और दोस्ती का रिश्ता बना।
करीब तीन साल पहले हुई यह मुलाकात समय के साथ गहरे रिश्ते में बदल गई। दोनों ने एक-दूसरे को समझने के बाद साथ जीवन बिताने का निर्णय लिया। इसके बाद परिवार की सुविधा को ध्यान में रखते हुए शादी की तैयारी की गई। नवीन के परिजनों के अनुसार, कुछ व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण परिवार के लिए विदेश जाना संभव नहीं था। इसलिए विवाह समारोह भारत में आयोजित करने का फैसला हुआ और हल्द्वानी को इसके लिए चुना गया।
शादी की तैयारियों में नवीन की बहन के घर की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी बहन बेबी धपोला हल्द्वानी के देवलचौड़ में रहती हैं। सोमवार को उनके घर पर विवाह से जुड़ी पारिवारिक रस्में पूरी की गईं। अगले दिन मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विवाह संपन्न हुआ। परिवार के सदस्यों और विदेश से आए मेहमानों की सुविधा को देखते हुए हल्द्वानी में आयोजन किया गया। इस तरह घर की रस्मों से लेकर सात फेरों तक विवाह पारंपरिक ढंग से आगे बढ़ा।
समारोह में मोराया कुमाऊनी दुल्हन के रूप में नजर आईं। उन्होंने पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण धारण किए। सिर पर मुकुट, नथ और मांग टीके के साथ उनका दुल्हन वाला स्वरूप स्थानीय विवाह परंपरा से जुड़ा था। मोराया के लिए ये रीति-रिवाज नए थे। इसके बावजूद उन्होंने रस्मों को समझकर उनमें भाग लिया। शादी में केवल पारंपरिक पहनावे का ही महत्व नहीं रहा, बल्कि रस्मों के अर्थ समझने पर भी ध्यान दिया गया।
भाषा के अंतर को दूर करने के लिए अंग्रेजी अनुवादक की मदद ली गई। इसके जरिए मोराया को विवाह की रस्में समझाई गईं, ताकि वह जान सकें कि किस परंपरा का क्या महत्व है। अनुवादक की मौजूदगी ने पुरोहित की बताई बातों और विवाह की प्रक्रिया को समझने में सहायता की। इससे वह पूरे समारोह में सक्रिय रूप से शामिल हो सकीं। दो अलग सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों वाले इस विवाह में संवाद की यह व्यवस्था खास रही।
मोराया के भाई और भाभी भी शादी में शामिल होने थाईलैंड से पहुंचे थे। उन्होंने कुमाऊनी परंपरा के अनुसार कन्यादान की रस्म निभाई। उनकी भागीदारी से विवाह समारोह में दोनों परिवारों की उपस्थिति रही। नवीन के पिता ने बेटे की पसंद और इस रिश्ते को लेकर खुशी जताई। उन्होंने बताया कि परिवार मोराया को अपनी संस्कृति और परंपराओं से परिचित कराना चाहता है। विवाह के बाद नवीन के पिता ने बेटे और बहू को पैतृक गांव ले जाने की योजना बताई थी। वहां मोराया को परिवार के अन्य सदस्यों, स्थानीय रहन-सहन और कुमाऊनी संस्कृति से परिचित कराया जाना था। हालांकि, उपलब्ध विवरण में गांव पहुंचने के बाद के कार्यक्रमों की अलग जानकारी नहीं है। फिलहाल दुबई में शुरू हुई उनकी प्रेम कहानी हल्द्वानी में विवाह के साथ नए चरण में पहुंच गई है।
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