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देहरादून: उत्तराखंड में व्यावसायिक मुर्गी पालन को बढ़ावा देने के लिए कुक्कुट विकास नीति-2025 के तहत पात्र इकाइयों को अधिकतम 63 लाख रुपये तक अनुदान देने का प्रावधान है। सहायता की राशि फार्म के प्रकार, पक्षियों की क्षमता और परियोजना के मैदानी अथवा पर्वतीय क्षेत्र में स्थापित होने पर निर्भर करेगी। इसलिए हर आवेदक को 63 लाख रुपये मिलने की गारंटी नहीं है। अधिकतम सहायता निर्धारित क्षमता वाले मैदानी क्षेत्र के ब्रायलर पैरेंट फार्म के लिए है। आवेदन की मंजूरी पात्रता, दस्तावेजों और बजट की उपलब्धता के अधीन होगी।
नीति में व्यावसायिक लेयर फार्म और ब्रायलर पैरेंट फार्म की स्थापना को प्रोत्साहित किया गया है। लेयर फार्म मुख्य रूप से अंडा उत्पादन से जुड़ा होता है, जबकि पैरेंट फार्म प्रजनन और आगे चूजा उत्पादन की शृंखला का हिस्सा है। दोनों प्रकार की इकाइयों के लिए अलग मानक परियोजनाएं निर्धारित की गई हैं। उद्यमी को आवेदन से पहले यह स्पष्ट करना होगा कि वह किस श्रेणी की इकाई स्थापित करना चाहता है और उसके लिए आवश्यक निवेश की व्यवस्था कैसे करेगा।
मैदानी क्षेत्र में 30 हजार पक्षियों की क्षमता वाले व्यावसायिक लेयर फार्म की मानक परियोजना लागत 1.80 करोड़ रुपये रखी गई है। इस पर 30 प्रतिशत की दर से अधिकतम 54 लाख रुपये सहायता का प्रावधान है। पर्वतीय क्षेत्र में 15 हजार पक्षियों की क्षमता वाले लेयर फार्म की मानक लागत 1.20 करोड़ रुपये है। यहां 40 प्रतिशत की दर से अधिकतम 48 लाख रुपये अनुदान निर्धारित है। क्षेत्र और क्षमता का यह अंतर आवेदन की श्रेणी तय करने में महत्वपूर्ण है।
ब्रायलर पैरेंट फार्म के मामले में मैदानी क्षेत्र की 10 हजार पक्षियों वाली इकाई की मानक परियोजना लागत 2.10 करोड़ रुपये है। इस पर अधिकतम 63 लाख रुपये अनुदान मिल सकता है। पर्वतीय क्षेत्र में पांच हजार पक्षियों की क्षमता वाली इकाई की मानक लागत 1.40 करोड़ रुपये और अधिकतम सहायता 56 लाख रुपये है। ये नीति में निर्धारित मॉडल आंकड़े हैं। किसी उद्यमी के वास्तविक प्रस्ताव की स्वीकार्य लागत और सहायता संबंधित स्वीकृति के अनुसार तय होगी।
आवेदन के लिए उत्तराखंड में उपयुक्त भूमि होना आवश्यक है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, आवेदक के पास जमीन का स्वामित्व अथवा कम से कम 10 वर्ष का पंजीकृत पट्टा होना चाहिए। भूमि विवादग्रस्त नहीं होनी चाहिए। बैंक का सहमति पत्र भी आवेदन के साथ देना होगा। केवल जमीन उपलब्ध होने से अनुदान स्वीकृत नहीं हो जाता; प्रस्तावित इकाई को नीति की अन्य शर्तों पर भी खरा उतरना होगा। परियोजना के वित्तीय और तकनीकी पहलुओं की जांच स्वीकृति प्रक्रिया का हिस्सा होगी।
नीति के तहत अधिवास की बाध्यता नहीं रखी गई है। पात्रता के अनुसार व्यक्ति, साझेदारी फर्म, समूह, कंपनियां और स्टार्टअप आवेदन कर सकते हैं। प्रवासी भारतीयों तथा विदेशों के उद्यमियों के लिए भी प्रावधान बताए गए हैं। आवेदन ‘अपुणि सरकार’ पोर्टल के माध्यम से किए जाने और विभिन्न समितियों के स्तर पर परीक्षण की व्यवस्था का उल्लेख है। इच्छुक उद्यमी वर्तमान आवेदन प्रक्रिया और अपनी श्रेणी की पात्रता के लिए जिला पशुपालन कार्यालय से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
योजना के पांच वर्षीय लक्ष्य में कुल 54 इकाइयां शामिल हैं। इनमें मैदानी क्षेत्रों की 26 और पर्वतीय क्षेत्रों की 28 इकाइयां प्रस्तावित हैं। श्रेणीवार देखें तो 35 व्यावसायिक लेयर फार्म और 19 ब्रायलर पैरेंट फार्म का लक्ष्य बताया गया है। यह निर्धारित लक्ष्य है, स्थापित हो चुकी इकाइयों की संख्या नहीं। विभाग की ओर से तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और परियोजना स्थापित करने में सहायता की व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया है।
आधिकारिक नीति में अनुदान सीधे परियोजना के ऋण बैंक खाते में तीन किस्तों में देने का प्रावधान है। पहली 50 प्रतिशत किस्त आधारभूत ढांचा पूरा होने पर, दूसरी 40 प्रतिशत किस्त निर्धारित पक्षियों के साथ उत्पादन शुरू होने के बाद और अंतिम 10 प्रतिशत किस्त दो वर्ष के अंत में संचालन तथा जैव सुरक्षा अनुपालन के आकलन पर देय है। इसका अर्थ है कि सहायता पूरी राशि के रूप में शुरुआत में हाथ में मिलने वाली रकम नहीं है।
निर्धारित समय में परियोजना शुरू करना और संचालन की शर्तों का पालन करना जरूरी है। आधिकारिक नीति में समयसीमा तथा जैव सुरक्षा या उत्पादन संबंधी शर्तों के उल्लंघन पर अनुदान की वैधता समाप्त होने और निर्धारित परिस्थितियों में ब्याज सहित वसूली का प्रावधान है। कुछ परिस्थितियों में समय विस्तार पर विचार की व्यवस्था भी है। इसलिए उद्यमी को स्वीकृति पत्र, भुगतान की शर्तें और संचालन संबंधी दायित्व समझकर ही परियोजना आगे बढ़ानी चाहिए।
आवेदन से पहले पशुपालन विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध नीति, मानक संचालन प्रक्रिया और मॉडल परियोजनाएं देखना उपयोगी होगा। वहां संबंधित दस्तावेज अलग-अलग प्रकाशित हैं। परियोजना बनाते समय भूमि, निर्माण, उपकरण, पक्षियों और संचालन के लिए धन की जरूरत स्पष्ट रखनी होगी। सब्सिडी पूंजीगत सहायता है; इससे कारोबार का पूरा खर्च समाप्त नहीं होता। वर्तमान बजट, आवेदन की उपलब्धता और स्वीकृत लागत की जानकारी मिलने के बाद ही उद्यमी अपने प्रस्ताव का वास्तविक वित्तीय स्वरूप तय कर सकेगा।
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