उत्तराखंड

हल्द्वानी शुद्धीकरण विवाद से गरमाई सियासत 2027 चुनाव में अहम हुआ दलित फैक्टर

Kavita2
3 Sept 2026 9:31 AM IST
हल्द्वानी शुद्धीकरण विवाद से गरमाई सियासत 2027 चुनाव में अहम हुआ दलित फैक्टर
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देहरादून। उत्तराखंड के हल्द्वानी में कथित शुद्धीकरण हवन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप लेता दिखाई दे रहा है। कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को दलित समाज के अपमान से जोड़ते हुए भारतीय जनता पार्टी को घेरना शुरू कर दिया है। वहीं भाजपा भी कांग्रेस के आरोपों पर आक्रामक रुख अपना रही है। वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह विवाद उत्तराखंड के साथ उत्तर प्रदेश और पंजाब की राजनीति में भी दलित मतदाताओं को लेकर नई राजनीतिक खींचतान की वजह बन सकता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब में अनुसूचित जाति के मतदाताओं का चुनावी प्रभाव काफी महत्वपूर्ण है। तीनों राज्यों को मिलाकर बड़ी संख्या में विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। राजनीतिक आकलन के मुताबिक यह आंकड़ा करीब 156 सीटों का है। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल इस वर्ग से जुड़े किसी मुद्दे पर राजनीतिक नुकसान उठाने की स्थिति में नहीं हैं।

हल्द्वानी में हुए कथित शुद्धीकरण हवन को कांग्रेस लगातार दलित सम्मान से जोड़ रही है। पार्टी की कोशिश इस घटनाक्रम को केवल स्थानीय विवाद तक सीमित नहीं रहने देने की दिखाई दे रही है। कांग्रेस नेताओं की ओर से इसे सामाजिक सम्मान और बराबरी के सवाल के रूप में उठाया जा रहा है। पार्टी इस मुद्दे के जरिए अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर सकती है।

दूसरी तरफ भाजपा ने भी इस मुद्दे पर रक्षात्मक रहने के बजाय आक्रामक रणनीति अपनाई है। पार्टी कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए उसके राजनीतिक इतिहास और दलित समाज को लेकर उसकी नीतियों पर सवाल उठा सकती है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले दिनों में हल्द्वानी का विवाद दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का बड़ा विषय बना रह सकता है।

उत्तराखंड की राजनीति में अनुसूचित जाति के मतदाता कई विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव परिणाम प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। राज्य में आरक्षित सीटों के अलावा कई सामान्य सीटों पर भी दलित मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका निभाती है। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों इस वर्ग को अपने साथ बनाए रखने के लिए लगातार राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करती रही हैं।

उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का प्रभाव इससे भी व्यापक है। प्रदेश की राजनीति में अनुसूचित जाति के मतदाता लंबे समय से एक मजबूत चुनावी ताकत माने जाते हैं। यहां दलित मतदाताओं को लेकर भाजपा और कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की रणनीति भी महत्वपूर्ण रहती है। ऐसे में उत्तराखंड में शुरू हुआ कोई सामाजिक विवाद यदि व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनता है तो उसका असर पड़ोसी उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी दिखाई दे सकता है।

पंजाब में भी अनुसूचित जाति की आबादी का चुनावी महत्व काफी अधिक है। यहां बड़ी संख्या में विधानसभा सीटों पर दलित मतदाताओं का प्रभाव है। राज्य में एससी मतदाताओं को साधने के लिए राजनीतिक दल लंबे समय से अलग-अलग रणनीतियां अपनाते रहे हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक सम्मान से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक दल बेहद सावधानी से संभालने की कोशिश करेंगे।

तीनों राज्यों में वर्ष 2027 में चुनावी मुकाबला राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण होगा। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखना चाहेगी, जबकि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की कोशिश करेगी। पंजाब में भी राजनीतिक समीकरण अलग हैं, लेकिन अनुसूचित जाति मतदाताओं की भूमिका वहां भी बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।

यही कारण है कि हल्द्वानी विवाद के बाद दलित फैक्टर अचानक राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस इसे सामाजिक न्याय और सम्मान से जोड़कर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। वहीं भाजपा कांग्रेस को इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ लेने से रोकने के लिए जवाबी रणनीति तैयार करती दिखाई दे रही है।

चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दल सामाजिक समीकरणों को अभी से साधने में जुटे हुए हैं। किसी भी वर्ग से जुड़ा विवाद यदि लंबे समय तक चर्चा में बना रहता है तो उसका असर मतदाताओं के राजनीतिक रुख पर पड़ सकता है। खासकर अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार तक इस तरह के मुद्दों की भूमिका बढ़ सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार केवल आरक्षित सीटों की संख्या देखकर दलित मतदाताओं के प्रभाव का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। कई सामान्य विधानसभा क्षेत्रों में भी एससी मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए यह वोट बैंक आरक्षित सीटों से कहीं आगे तक महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस की कोशिश हल्द्वानी प्रकरण को दलित सम्मान के व्यापक मुद्दे के रूप में स्थापित करने की है तो भाजपा भी अपने दलित जनाधार को लेकर सतर्क दिखाई दे रही है। दोनों दलों के बीच आने वाले दिनों में बयानबाजी और तेज होने की संभावना है। स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ विवाद यदि राष्ट्रीय या अंतरराज्यीय राजनीतिक मुद्दा बनता है तो उत्तराखंड के बाहर भी इसकी गूंज सुनाई दे सकती है।

हालांकि कथित शुद्धीकरण हवन से जुड़े पूरे घटनाक्रम और विभिन्न पक्षों के दावों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। ऐसे में विवाद के तथ्यों और राजनीतिक व्याख्याओं के बीच अंतर रखना भी महत्वपूर्ण होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राजनीतिक दल इस मामले को 2027 के चुनावी समीकरणों से जोड़कर देख रहे हैं।

उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश और पंजाब तक अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित करीब 156 सीटों के राजनीतिक महत्व को देखते हुए भाजपा और कांग्रेस किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहेंगी। हल्द्वानी से शुरू हुआ विवाद आने वाले समय में कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है, यह राजनीतिक दलों की रणनीति और मतदाताओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

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