उत्तराखंड

Gopeshwar: चढ़ावा विवाद के बाद देवस्थानम बोर्ड पर सियासत गरमाई

Admindelhi1
11 July 2026 9:52 AM IST
Gopeshwar: चढ़ावा विवाद के बाद देवस्थानम बोर्ड पर सियासत गरमाई
x
बदरीनाथ विवाद से देवस्थानम बोर्ड का मुद्दा फिर उभरा

गोपेश्वर: बदरीनाथ धाम में चढ़ावे से जुड़े कथित गबन प्रकरण के बाद उत्तराखंड में चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड की आवश्यकता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि चारधामों की व्यवस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्या देवस्थानम बोर्ड जैसी व्यवस्था दोबारा लागू की जानी चाहिए।

हाल के दिनों में बदरीनाथ धाम में चढ़ावे की कथित अनियमितता,वीआईपी दर्शन में धन वसूली के आरोप,एसबीआई की ओर से उपलब्ध कराए गए लैपटॉप के गायब होने और दान में मिली दो एंबुलेंस और एक टेंपो ट्रैवलर के उपयोग को लेकर उठे सवालों के बाद बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हुए हैं।

हरिद्वार के सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने चढ़ावा प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए देवस्थानम बोर्ड की आवश्यकता पर फिर जोर दिया है। वहीं मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की जांच के लिए गढ़वाल आयुक्त की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की है। संबंधित कर्मचारी को निलंबित किया जा चुका है और मामले में प्राथमिकी भी दर्ज की गई है।

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने दिसंबर 2019 में बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री सहित 51 मंदिरों के प्रबंधन के लिए उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड का गठन किया था। हालांकि तीर्थ पुरोहितों, हक-हकूकधारियों और धार्मिक संगठनों के विरोध के बाद बाद में इस व्यवस्था को समाप्त कर चारधामों का प्रबंधन पुनः मंदिर समितियों को सौंप दिया गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा विवाद ने चारधामों के प्रशासनिक ढांचे और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर नए सिरे से चर्चा शुरू कर दी है। समर्थकों का कहना है कि जवाबदेह और आधुनिक प्रबंधन व्यवस्था से दान, संपत्तियों और यात्रा प्रबंधन में अधिक पारदर्शिता लाई जा सकती है, जबकि विरोधी पक्ष का मानना है कि किसी भी नई व्यवस्था में पारंपरिक धार्मिक अधिकारों और हक-हकूकधारियों के हितों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

इस बीच बीकेटीसी ने भी अपने ढांचे में बदलाव का प्रस्ताव शासन को भेजा है। इसमें समिति का नाम बदलकर 'बदरी-केदार प्रबंधन बोर्ड' करने, कार्यकाल तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष करने तथा सदस्यों की संख्या 10 से बढ़ाकर 15 करने का सुझाव दिया गया है। फिलहाल चढ़ावा प्रकरण की जांच जारी है, लेकिन इस घटनाक्रम ने उत्तराखंड में चारधामों के प्रबंधन की व्यवस्था को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है।

Next Story