
बनबसा। आर्मी के मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस यानी एमईएस में नौकरी दिलाने के नाम पर बेरोजगार युवाओं से लाखों रुपये की कथित ठगी करने वाले गिरोह का बनबसा पुलिस और एसओजी ने पर्दाफाश किया है। पुलिस ने मामले में मुख्य आरोपी धीरज सक्सेना निवासी भजनपुर, बनबसा और उसके सहयोगी गणेश बहादुर निवासी धारचूला को गिरफ्तार किया है। दोनों के कब्जे से बड़ी संख्या में फर्जी नियुक्ति पत्र और कूटरचित दस्तावेज बरामद किए गए हैं।
पुलिस के अनुसार आरोपियों के पास से 46 फर्जी नियुक्ति पत्र, एमईएस की कथित फर्जी मोहर, स्टांप पैड, अभ्यर्थियों के फोटो, मेडिकल प्रमाण पत्र, दो मोबाइल फोन और एक स्कूटी बरामद हुई है। इन दस्तावेजों और सामान की जांच की जा रही है।
मामले का खुलासा 28 सितंबर को हुआ। पुलिस के मुताबिक मिलिट्री इंटेलिजेंस बनबसा, मुख्यालय लखनऊ से मिली सूचना के आधार पर टनकपुर निवासी गुरु शरण सिंह ने थाना बनबसा में धीरज सक्सेना और गणेश बहादुर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि दोनों ने मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस में नौकरी लगवाने का भरोसा देकर उससे पैसे लिए थे। शुरुआत में पांच हजार रुपये नकद लिए गए और बाद में 1.40 लाख रुपये यूपीआई के जरिए ट्रांसफर करवाए गए।
पुलिस के अनुसार पीड़ित को भरोसा दिलाया गया था कि उसे एमईएस में नौकरी मिल जाएगी और जल्द नियुक्ति पत्र भी दे दिया जाएगा। इसी कथित प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के नाम पर लगातार संपर्क रखा गया।
28 सितंबर को धीरज सक्सेना ने गुरु शरण सिंह को कथित नियुक्ति पत्र देने और बायोमेट्रिक प्रक्रिया पूरी कराने के लिए कमल पथ आर्मी एरिया बनबसा के पास बुलाया था।
इसी सूचना के आधार पर पुलिस और एसओजी पहले से सतर्क थी। टीम ने पूरे मामले पर नजर रखी और आरोपियों को पकड़ने की कार्रवाई की।
गिरफ्तारी के बाद जब आरोपियों और उनके सामान की तलाशी ली गई तो पुलिस को बड़ी संख्या में ऐसे दस्तावेज मिले, जिन्हें कथित तौर पर नौकरी दिलाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया जाता था।
46 फर्जी नियुक्ति पत्रों की बरामदगी के बाद पुलिस को आशंका है कि आरोपियों ने केवल एक व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि कई बेरोजगार युवाओं को अपना निशाना बनाया हो सकता है। अब पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन नियुक्ति पत्रों पर किन लोगों के नाम दर्ज थे और उनसे कितनी रकम ली गई।
बरामद अभ्यर्थियों के फोटो और मेडिकल प्रमाण पत्र भी जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इनके आधार पर संभावित पीड़ितों की पहचान की जा सकती है।
पुलिस आरोपियों के मोबाइल फोन की भी जांच कर रही है। कॉल रिकॉर्ड, मैसेज और यूपीआई लेन-देन से यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि आरोपियों ने किन-किन लोगों से संपर्क किया और कितनी रकम ली।
पुलिस यह भी जांच रही है कि आरोपी एमईएस का नाम इस्तेमाल कर बेरोजगार युवाओं को किस तरीके से विश्वास में लेते थे। क्या वे खुद को किसी अधिकारी या संपर्क वाले व्यक्ति के रूप में पेश करते थे, यह भी जांच का हिस्सा है।
एमईएस की कथित फर्जी मोहर और कूटरचित दस्तावेज मिलने से यह आशंका और मजबूत हुई है कि नौकरी के नाम पर पूरे तरीके से नकली भर्ती प्रक्रिया तैयार की गई थी।
पीड़ितों को नियुक्ति पत्र, मेडिकल और बायोमेट्रिक जैसी प्रक्रियाओं का झांसा देकर भरोसा दिलाया जाता था कि उनकी नौकरी लगभग तय हो चुकी है।
पुलिस अब यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस गिरोह में इन दोनों के अलावा कोई और व्यक्ति शामिल था या नहीं। यदि अन्य लोगों की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।
मिलिट्री इंटेलिजेंस की सूचना इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण साबित हुई। सूचना मिलने के बाद पुलिस ने शिकायत दर्ज कर कार्रवाई आगे बढ़ाई।
मुख्य आरोपी धीरज सक्सेना के बारे में पुलिस यह जानने की कोशिश कर रही है कि उसने अब तक कितने लोगों से संपर्क किया और किस अवधि से यह कथित नेटवर्क चला रहा था।
वहीं गणेश बहादुर की भूमिका की भी अलग से जांच की जा रही है। पुलिस यह स्पष्ट करना चाहती है कि वह अभ्यर्थियों को जोड़ने, पैसे लेने या दस्तावेज तैयार करने में किस स्तर तक शामिल था।
यूपीआई के जरिए ली गई 1.40 लाख रुपये की रकम का डिजिटल रिकॉर्ड भी पुलिस के पास महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकता है। संबंधित बैंक खातों और ट्रांजैक्शन की जानकारी जुटाई जा रही है।
पुलिस आरोपियों के कब्जे से बरामद स्कूटी के इस्तेमाल की भी जांच कर रही है। यह पता लगाया जा सकता है कि नौकरी से जुड़े कथित दस्तावेज देने या अभ्यर्थियों से मिलने के लिए इसका इस्तेमाल किया गया था या नहीं।
फर्जी नियुक्ति पत्रों पर मौजूद हस्ताक्षर, मोहर और अन्य विवरणों की भी जांच की जाएगी। इससे यह साफ होगा कि दस्तावेज किस तरह तैयार किए जाते थे।
पुलिस का फोकस अब संभावित अन्य पीड़ितों तक पहुंचने पर है। बरामद दस्तावेजों में दर्ज नामों के आधार पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।
यदि अन्य युवाओं से भी नौकरी के नाम पर रुपये लेने की पुष्टि होती है तो मामले का दायरा और बढ़ सकता है।
बेरोजगार युवाओं को सरकारी या सैन्य संस्थानों में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी के मामलों में आरोपी अक्सर नियुक्ति पत्र और मेडिकल प्रक्रिया जैसे दस्तावेजों का सहारा लेते हैं। इस मामले में भी पुलिस को इसी तरह की सामग्री मिलने का दावा है।
फिलहाल दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और उनसे पूछताछ जारी है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कुल कितने लोगों से ठगी की गई और कितनी रकम वसूली गई।
मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जा रही है। बरामद मोबाइल फोन, कूटरचित दस्तावेज और कथित फर्जी मोहर को जांच के लिए सुरक्षित रखा गया है।
बनबसा पुलिस और एसओजी की इस कार्रवाई के बाद अब पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने पर जोर है। पुलिस को उम्मीद है कि पूछताछ और डिजिटल साक्ष्यों से अन्य संभावित पीड़ितों तथा सहयोगियों की जानकारी सामने आ सकती है।
फिलहाल धीरज सक्सेना और गणेश बहादुर पर लगे आरोपों की जांच जारी है। दोनों के खिलाफ दर्ज मामले में आगे की कार्रवाई साक्ष्यों और पूछताछ के आधार पर की जाएगी।





