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Uttarakhand उत्तराखंड: राजधानी दिल्ली स्थित प्राचीन और प्रसिद्ध कालकाजी मंदिर को लेकर एक नई बहस और चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। मंदिर को ‘वेदिशाला’ यानी प्राचीन खगोलीय वेधशाला मानने की बात सामने आने के बाद धार्मिक और वैज्ञानिक हलकों में इसे एक गंभीर और महत्वपूर्ण विषय माना जा रहा है। इस मुद्दे पर श्री कालकाजी मंदिर के सचिव सिद्धार्थ भारद्वाज ने कहा कि यदि किसी पूर्व निदेशक द्वारा इसे वेदिशाला बताया गया है, तो यह विषय अपने आप में बेहद अहम हो जाता है।
सिद्धार्थ भारद्वाज ने कहा कि इस तरह का दावा केवल आस्था से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह सत्य और विज्ञान के मार्ग की ओर संकेत करता है। उन्होंने कहा, “अगर इसे वेदिशाला के रूप में देखा जा रहा है, तो हमें इसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि यह एक वैज्ञानिक और सत्यपरक दृष्टिकोण को दर्शाता है।”
उन्होंने आगे कहा कि यह पूरी तरह संभव है कि इस धारणा में कहीं न कहीं सच्चाई छिपी हो। मंदिर की संरचना और उसका स्वरूप इस बात की ओर इशारा करता है कि यह केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि प्राचीन काल में सूर्य और खगोलीय गणनाओं से जुड़ा एक मॉडल हो सकता है। भारद्वाज के अनुसार, मंदिर की बनावट एक ‘सोलर पिलर’ यानी सूर्य स्तंभ के मॉडल से मेल खाती प्रतीत होती है।
इस बयान के बाद इतिहासकारों, पुरातत्व विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के बीच भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। भारत में पहले भी कई ऐसे मंदिर और संरचनाएं सामने आई हैं, जिन्हें खगोलीय गणनाओं और वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर बनाया गया था। कोणार्क सूर्य मंदिर, जंतर-मंतर और उज्जैन की वेधशालाएं इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
धार्मिक जानकारों का कहना है कि प्राचीन भारत में विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे से अलग नहीं थे। वेदों और शास्त्रों में खगोल विज्ञान, गणित और प्रकृति के नियमों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। ऐसे में कालकाजी मंदिर को वेदिशाला मानने की परिकल्पना भारतीय ज्ञान परंपरा को और मजबूती देती है।
सिद्धार्थ भारद्वाज ने यह भी कहा कि इस विषय पर गहन और निष्पक्ष शोध की आवश्यकता है। उन्होंने अपील की कि सरकार, पुरातत्व विभाग और वैज्ञानिक संस्थान मिलकर मंदिर की संरचना, दिशा, सूर्य की किरणों के प्रभाव और अन्य पहलुओं का वैज्ञानिक अध्ययन करें, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला किसी विवाद को जन्म देने के लिए नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत को समझने और स्वीकार करने का अवसर है। यदि शोध में यह सिद्ध होता है कि कालकाजी मंदिर वास्तव में एक वेदिशाला के रूप में उपयोग होता था, तो यह भारत के प्राचीन विज्ञान और ज्ञान परंपरा के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी।
फिलहाल, कालकाजी मंदिर को वेदिशाला मानने की यह चर्चा लोगों के बीच जिज्ञासा और गौरव दोनों का विषय बन गई है। आने वाले समय में इस पर होने वाला शोध यह तय करेगा कि आस्था और विज्ञान का यह संगम इतिहास में किस रूप में दर्ज होगा।
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