उत्तराखंड
Dehradun: पर्यावरणविद सुन्दर लाल की पत्नी का निधन, सीएम धामी ने जताया दुख
Tara Tandi
14 Feb 2025 1:08 PM IST

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Dehradun देहरादून: पर्यावरणविद स्वर्गीय सुन्दर लाल बहुगुणा की पत्नी बिमला बहुगुणा का निधन हो गया है. 93 साल की उम्र में बिमला बहुगुणा ने आखिरी सांस ली. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है.
सामाजिक उत्थान के प्रति आजीवन समर्पित, पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाली, स्व. सुंदर लाल बहुगुणा जी की पत्नी बिमला बहुगुणा जी के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद है।
— Pushkar Singh Dhami (@pushkardhami) February 14, 2025
ईश्वर पुण्यात्मा को श्री चरणों में स्थान एवं शोकाकुल परिजनों को यह असीम दुःख सहन करने की…
पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा की पत्नी बिमला का निधन
14 फरवरी को तड़के 2 बजकर 10 मिनट पर बिमला बहुगुणा ने अपने शास्त्री नगर स्थित आवास पर आखिरी सांस ली. स्वर्गीय सुन्दर लाल बहुगुणा के बेटे राजीव नयन बहुगुणा ने अपनी मां के निधन की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की है. राजीव नयन ने सोशल मीडिया पर लिखा महिला शिक्षा एवं ग्रामीण भारत में सर्वोदय के विचार को दृष्टिगत रख, दिसंबर 1946 में कौसानी में लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की गई. इस आश्रम की प्रारम्भ से ही देखरेख महात्मा गांधी की नजदीकी शिष्या सरला बेन (बहन) द्वारा संपादित की गई. आश्रम के प्रति अल्मोड़ा जनपद का रवैय्या उत्साहजनक नहीं था. लेकिन पौड़ी और टिहरी से प्रारंभ से ही कुछ छात्राओं ने आकर आश्रम को मजबूती प्रदान की.
कम समय में ही आश्रम की प्रिय छात्रा बन गई थी बिमला
टिहरी से एक साथ 5 छात्राओं ने आश्रम में दाखिला लिया उनमें ही एक थी “बिमला नौटियाल” अपनी साफ समझ, कड़ी मेहनत और समर्पण की भावना ने बिमला नौटियाल को छोटे समय में ही आश्रम की सबसे प्रिय छात्रा बना दिया. आश्रम से बाहर की सामाजिक गतिविधियों में बिमला का आश्रम द्वारा सर्वाधिक उपयोग किया जाता था. जब विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में आश्रम के प्रतिनिधित्व की बात सामने आई तो, इसके लिए भी बिमला नौटियाल का ही नाम चुना गया था.
विनोबाजी के मंत्री ने बिमला को दी “वन- देवी” की उपाधि
बिमला ने अपने समर्पण और नेतृत्व क्षमता से भूदान आंदोलन में बहुत विलक्षण काम किया, विनोबाजी के मंत्री दामोदर ने बिमला को “वन- देवी” की उपाधि देते हुए कहा कि ऐसी लड़की उन्होंने पहले कभी नहीं देखी, जो बहुत आसानी और मजबूती से नौजवानों का सही मार्गदर्शन करती हैं. भूदान आंदोलन से वापस लौट कर आश्रम के उद्देश्य का ग्रामीण क्षेत्रों में आश्रम की छात्राओं द्वारा अवकाश के दिनों में प्रचार का कार्यक्रम तय किया गया था, यह 1954 की बात थी, जब सरला बहन बिमला नौटियाल को लेकर आश्रम की गतिविधियों के लिए टिहरी को रवाना हुई. सरला बहन किसी काम के लिए नैनीताल होकर जब लौटी तो बिमला काठगोदाम रेलवे स्टेशन में इंतजार कर रहीं थीं.
सुंदरलाल बहुगुणा को भाई की तरह मानती थी बिमला बहुगुणा
सरला बेन के स्टेशन पहुंचते ही बिमला नौटियाल ने पिता नारायण दत्त का लिखा पत्र सरला बहन को दिखाया. जिसमें अंतिम रूप से आदेशित था कि अमुक दिनांक, अमुक माह में उनका विवाह सुंदर लाल के साथ तय कर दिया गया है. विवाह की तिथि में कुछ ही दिन शेष थे. उन्हें जल्दी घर बुलाया है. सरला बहन ने विमला से पूछा कि तुम क्या सोचती हो. उन्होंने उत्तर दिया “मैंने हमेशा सुंदरलाल को भाई की तरह माना है मैं एकदम उस दृष्टि को नहीं बदल सकती, दूसरी तरफ यदि मैं इनकार करूंगी तो गुस्सा होकर पिताजी मेरी छोटी बहनो की शिक्षा रोककर जल्दी में उनकी शादी कराएंगे, फिर पहाड़ में कोई अन्य व्यक्ति नहीं है जिससे मेरे विचार मिल सकें, मैदान में भी विजातीय विवाह के लिए पिताजी तैयार नहीं होंगे, मुझे निर्णय करने और मन को तैयार करने में कम से कम एक वर्ष का समय चाहिए”.
सरला बेन ने सुंदरलाल बहुगुणा से साझा की परेशानी
सरला बेन के आगे यह बड़ी दुविधा थी. इससे पहले भी आश्रम की एक अन्य छात्रा राधा भट्ट विवाह को लेकर अपने पिता से विद्रोह कर चुकी थीं. वह अब इसकी पुनरावृति नहीं चाहती थी. बस से टिहरी को जाते हुए एक अजीब उधेडबुन थी. टिहरी से खबर आ रही थी नारायण दत्त गांव से टिहरी आ गए हैं. सामान खरीद रहे हैं, बड़े शान से लोगों को निमंत्रण दे रहे हैं. अब रास्ता सुंदर लाल के माध्यम से ही निकल सकता था. टिहरी शिविर में पहुंचकर सबसे पहले यह दुविधा सुंदरलाल से साझा की गई. उन्होंने कहा ” यदि बिमला राजी है, तो उन्हें बेहद खुशी होगी, लेकिन अपनी तरह से कोई जबरदस्ती नहीं, निर्णय के लिए उन्हें समय चाहिए तो वह ले लें” किसी तरह शिविर का समापन हुआ, आंखरी रोज अब बिमला के घर नौटियाल परिवार का सामना होना था. सारे गांव में हलचल थी, क्या बिमला शादी के लिए मान जाएंगी.
बिमला नौटियाल के भाई ने नहीं दिया था उनका साथ
गंभीर लेकिन आक्रामक मुद्रा में बैठे नारायण दत्त नौटियाल से सरला बहन ने कहा “कम से कम आपको कुछ समय देना चाहिए था”. कड़क आवाज में नारायण दत्त ने कहा मैंने बहुत समय दिया, मैंने पत्र लिखा, कुछ लोग तो तार से ही बुला लेते हैं. सरला बहन ने कहां आपको इतनी जल्दी क्या है, सुंदरलाल समय देने को तैयार हैं”. नारायण दत्त आग बबूला होकर बोले कौन सुंदरलाल ?सुंदरलाल बिमला नौटियाल के भाई भी थे. उम्मीद थी बिमला के भाई कामरेड विद्या सागर नौटियाल सरला बहन के साथ खडे होंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बिमला ने अभी शादी को हां नहीं भरी थी, गांव वाले चाहते थे सरला बहन दबाव देकर उसे राजी कर लें. रात ऐसे ही बीत गई, सुबह अंधेरे में ही स्टेशन पर सुंदर लाल के भाई गोविंद प्रसाद इंतजार कर रहे थे. उन्होंने कहा कि हमारा परिवार इस विवाह के लिए लालायित है. आप बिमला को राजी कर लें.
बिमला नौटियाल ने इस शर्त पर की थी सुंदर लाल बहुगुणा से शादी
आखिर तैयारी के लिए पूरे एक साल का वक्त मिला, बिमला नौटियाल शादी के लिए इस शर्त के साथ तैयार हुई कि सुंदरलाल राजनीतिक कामों को छोड़कर एक आश्रम की स्थापना करें. सुंदरलाल इसके लिए तैयार हुए और तब सड़क से मीलों दूर सिलयारा आश्रम की शुरुआत की गई, विवाह तो नए बने, ठक्कर बाबा आश्रम के तीन चार कमरों में ही संपन्न हुआ. 1955 का साल था . राजनीतिक समझ और सरोकारों से संपन्न एक सक्रिय राजनेता जो जिला कांग्रेस कमेटी के महासचिव थे, जिनकी उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से नजदीकी संबंध रखते थे. उन्होंने हमेशा -हमेशा के लिए राजनीति से अलविदा कर दिया. गांधी के दर्शन को विनोबा भावे के बाद न केवल गहराई से समझा बल्कि उसका विस्तार अंतरराष्ट्रीय पटल तक किया. प्रकृति को बचाने और गांधी विचार के क्रियान्वयन में उनका योगदान सर्वविदित है.
सीएम धामी ने जताया दुख
बिमला बहुगुणा के निधन पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी दुख व्यक्त किया है. सीएम धामी ने लिखा कि ईश्वर पवित्र आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें. साथ ही उनके परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें.
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