
रामनगर (उत्तराखंड)। तराई पश्चिमी वन प्रभाग के फाटो रेंज से गंभीर हालत में रेस्क्यू किए गए नर बाघ भोला की उपचार के दौरान मौत हो गई। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के ढेला स्थित वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर में पशु चिकित्सकों की टीम ने बाघ को बचाने के लिए काफी प्रयास किए, लेकिन उसकी हालत में सुधार नहीं हो सका और आखिरकार उसने दम तोड़ दिया।
जानकारी के अनुसार, भोला नाम के इस नर बाघ को 25 जून को तराई पश्चिमी वन प्रभाग के फाटो रेंज से रेस्क्यू किया गया था। रेस्क्यू के समय बाघ की शारीरिक स्थिति बेहद खराब थी। उसके शरीर पर कई गहरे जख्म पाए गए थे, जिसके कारण उसे तत्काल उपचार के लिए ढेला वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर लाया गया था।
रेस्क्यू टीम ने बाघ की हालत को देखते हुए उसे सुरक्षित तरीके से सेंटर तक पहुंचाया था। वहां पहुंचने के बाद पशु चिकित्सकों ने उसका इलाज शुरू किया। बाघ की निगरानी के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी और लगातार उसकी स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखी जा रही थी।
बाघ का इलाज पशु चिकित्सक दुष्यंत शर्मा की निगरानी में किया जा रहा था। डॉक्टरों की टीम ने बाघ को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए। उसे जरूरी दवाएं और उपचार उपलब्ध कराया गया, लेकिन गंभीर चोटों और कमजोर शारीरिक स्थिति के कारण उसकी हालत में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, रेस्क्यू के समय ही बाघ की स्थिति काफी चिंताजनक थी। शरीर पर मौजूद गहरे घावों के कारण उसे काफी परेशानी हो रही थी। उपचार के बावजूद उसकी हालत लगातार गंभीर बनी रही और आखिरकार उसने दम तोड़ दिया।
भोला बाघ की मौत की खबर के बाद वन्यजीव प्रेमियों में भी निराशा है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि बाघों का संरक्षण बेहद जरूरी है और इस तरह की घटनाएं चिंता का विषय हैं। उन्होंने वन क्षेत्रों में बाघों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत बताई।
वन विभाग अब बाघ की मौत के कारणों का पता लगाने में जुटा है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की गाइडलाइंस के अनुसार बाघ के शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि बाघ की मौत किस कारण से हुई।
अधिकारियों के मुताबिक, पोस्टमार्टम प्रक्रिया पूरी तरह निर्धारित नियमों के अनुसार की जाएगी। इसमें विशेषज्ञ चिकित्सकों की मौजूदगी रहेगी, ताकि मौत के वास्तविक कारणों की जानकारी मिल सके।
तराई पश्चिमी वन प्रभाग और कॉर्बेट क्षेत्र में बाघों की मौजूदगी के कारण वन विभाग लगातार उनकी निगरानी करता है। घायल या बीमार वन्यजीवों को समय-समय पर रेस्क्यू कर उपचार दिया जाता है।
वन अधिकारियों का कहना है कि घायल वन्यजीवों को समय पर उपचार उपलब्ध कराना विभाग की प्राथमिकता है। भोला बाघ को भी गंभीर स्थिति में बचाने का प्रयास किया गया, लेकिन उसकी हालत इतनी खराब थी कि उसे बचाया नहीं जा सका।
वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, जंगलों में बाघों के बीच क्षेत्रीय संघर्ष, आपसी लड़ाई, उम्र बढ़ने या अन्य कारणों से कई बार वे घायल हो जाते हैं। ऐसे मामलों में समय पर उपचार मिलने से कई वन्यजीवों की जान बचाई जा सकती है।
भोला बाघ की मौत ने एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण और घायल जानवरों के लिए बेहतर चिकित्सा व्यवस्था की जरूरत को सामने ला दिया है। हालांकि वन विभाग की टीम ने उसे बचाने का पूरा प्रयास किया, लेकिन गंभीर चोटों के कारण उसकी जान नहीं बच सकी।
फिलहाल वन विभाग पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है। रिपोर्ट आने के बाद ही बाघ की मौत के पीछे की वास्तविक वजह सामने आएगी।





