उत्तराखंड

हिमालयी क्षेत्रों में बदल रहा भालुओं का व्यवहार

Kavita2
8 July 2026 9:59 AM IST
हिमालयी क्षेत्रों में बदल रहा भालुओं का व्यवहार
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शिमला: हिमालयी राज्यों में भालुओं का बदलता व्यवहार वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरण वैज्ञानिकों के लिए नई चिंता का विषय बन गया है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में हाल के वर्षों में भालुओं के इंसानी बस्तियों की ओर आने और लोगों पर हमलों की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक भोजन की कमी और जंगलों में बदलते पारिस्थितिक संतुलन के कारण भालुओं के व्यवहार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

हालिया शोधों के अनुसार, पहले जहां भालू सर्दियों के दौरान लंबे समय तक शीतनिद्रा (हाइबरनेशन) में चले जाते थे, वहीं अब कई क्षेत्रों में वे पूरी तरह शीतनिद्रा में नहीं जा रहे हैं। इसके कारण वे पूरे वर्ष भोजन की तलाश में सक्रिय रहते हैं और जंगलों से निकलकर खेतों, बागानों तथा आबादी वाले इलाकों तक पहुंच रहे हैं। यही वजह है कि पिछले वर्ष उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भालुओं द्वारा इंसानों पर हमलों के मामलों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई।

पारंपरिक भोजन की कमी बनी बड़ी वजह

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, भालुओं का प्राकृतिक भोजन लगातार कम होता जा रहा है। पहाड़ों में मिलने वाले बांज, काफल, हिंसालू, मेहल और अन्य जंगली फलों की उपलब्धता पहले की तुलना में काफी घट गई है। जलवायु परिवर्तन, जंगलों में बदलाव और वनस्पतियों के प्राकृतिक चक्र में आए परिवर्तन के कारण इन फलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है।

जब जंगलों में पर्याप्त भोजन नहीं मिलता, तो भालू अपनी जरूरत पूरी करने के लिए मानव बस्तियों की ओर रुख करने लगते हैं। वे सेब, आड़ू, नाशपाती, मक्का और अन्य कृषि फसलों वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं, जहां उन्हें आसानी से भोजन मिल जाता है।

बागवानी क्षेत्रों में बढ़ी आवाजाही

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में बागवानी तेजी से बढ़ी है। सेब, प्लम, आड़ू, खुबानी और अन्य फलों के बगीचे भालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। भोजन की तलाश में भालू रात के समय इन बागानों में पहुंचते हैं और कई बार किसानों या स्थानीय लोगों से आमना-सामना होने पर हमला कर देते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश मामलों में भालू जानबूझकर हमला नहीं करते, बल्कि खुद को खतरे में महसूस करने पर आक्रामक हो जाते हैं।

शीतनिद्रा में कमी का असर

सामान्य परिस्थितियों में भालू सर्दियों के दौरान कई सप्ताह या महीनों तक शीतनिद्रा में रहते हैं। इस दौरान उनकी गतिविधियां काफी कम हो जाती हैं और वे शरीर में जमा ऊर्जा के सहारे समय बिताते हैं।

लेकिन हाल के वर्षों में तापमान में वृद्धि और मौसम के पैटर्न में बदलाव के कारण कई क्षेत्रों में सर्दियां पहले जैसी कठोर नहीं रहीं। इसके चलते भालुओं की शीतनिद्रा का समय कम हो गया है या कुछ स्थानों पर वे पूरी तरह शीतनिद्रा में नहीं जा रहे हैं। परिणामस्वरूप उन्हें पूरे वर्ष भोजन की आवश्यकता रहती है और वे लगातार जंगल से बाहर निकलते रहते हैं।

इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ रहा संघर्ष

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष (ह्यूमन-वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट) पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। जंगलों के आसपास आबादी का विस्तार, कृषि गतिविधियों में वृद्धि और प्राकृतिक आवासों पर दबाव भी इसके प्रमुख कारण हैं।

भालुओं के अलावा तेंदुए, हाथी और बंदरों के साथ भी इंसानों का संघर्ष बढ़ा है। हालांकि भालुओं के मामले में भोजन की कमी और बदलती जलवायु को प्रमुख कारण माना जा रहा है।

विशेषज्ञों ने सुझाए समाधान

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल भालुओं को आबादी से दूर भगाने में नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और भोजन के स्रोतों को संरक्षित करने में है।

वे जंगलों में बांज, काफल, हिंसालू और अन्य स्थानीय प्रजातियों के पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण करने की सलाह दे रहे हैं, ताकि भालुओं को जंगल के भीतर ही पर्याप्त भोजन उपलब्ध हो सके। साथ ही जंगलों के संरक्षण और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

स्थानीय लोगों के लिए जागरूकता जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीणों और किसानों को भी वन्यजीवों के व्यवहार के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए। जंगलों के किनारे रहने वाले लोगों को रात के समय अकेले जाने से बचना चाहिए और यदि किसी क्षेत्र में भालू दिखाई दे तो तुरंत वन विभाग को सूचना देनी चाहिए।

इसके अलावा बागानों और खेतों में सुरक्षा उपायों को मजबूत करने तथा कचरे और खाद्य पदार्थों को खुले में न छोड़ने की भी सलाह दी गई है, क्योंकि इससे भालू मानव बस्तियों की ओर आकर्षित हो सकते हैं।

संरक्षण और सुरक्षा के बीच संतुलन की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। एक ओर जहां भालुओं और अन्य वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों का संरक्षण जरूरी है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलावों के बीच भालुओं के व्यवहार में आ रहे परिवर्तन इस बात का संकेत हैं कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से बदल रहा है। यदि समय रहते प्रभावी संरक्षण उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष और बढ़ सकता है।

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