उत्तराखंड

पिरूल प्लांट देखने पहुंचा अरुणाचल का दल

Kavita2
22 Aug 2026 2:57 PM IST
पिरूल प्लांट देखने पहुंचा अरुणाचल का दल
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चंपावत। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में जंगलों के लिए चुनौती माने जाने वाले पिरूल को उपयोगी संसाधन में बदलने की पहल अब दूसरे राज्यों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन रही है। पाटी ब्लॉक के भिंगराड़ा में स्थापित पाइन नीडल ब्रिकेटिंग प्लांट का अरुणाचल प्रदेश स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. टागे टाकी और श्री टागे तागयो ने दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने प्लांट की कार्यप्रणाली को समझने के साथ पिरूल से ऊर्जा उत्पादन की संभावनाओं की जानकारी ली।

दौरे के दौरान अधिकारियों ने पाइन नीडल यानी चीड़ की सूखी पत्तियों को एकत्र करने से लेकर उन्हें प्रसंस्कृत कर ब्रिकेट तैयार करने तक की पूरी प्रक्रिया का अवलोकन किया। प्रतिनिधिमंडल ने इस तकनीक के पर्यावरणीय और आर्थिक लाभों को भी समझा। दूसरे राज्य के प्रतिनिधियों के दौरे को उत्तराखंड में पिरूल प्रबंधन की इस पहल की उपयोगिता और संभावनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पिरूल को समस्या के बजाय संसाधन बनाने की पहल

उत्तराखंड के जंगलों में बड़ी मात्रा में चीड़ के पेड़ पाए जाते हैं। गर्मियों में इनसे गिरने वाली सूखी पत्तियां यानी पिरूल लंबे समय से वनाग्नि के जोखिम को बढ़ाने वाली प्रमुख वजहों में शामिल रही हैं। जमीन पर जमा पिरूल बेहद ज्वलनशील होता है और आग लगने की स्थिति में जंगलों में आग तेजी से फैल सकती है।

ऐसे में पिरूल को जंगलों से हटाकर उसका उपयोग ऊर्जा उत्पादन में करने की पहल को पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी उपयोगी माना जा रहा है। भिंगराड़ा में स्थापित ब्रिकेटिंग प्लांट इसी सोच पर आधारित है। यहां पाइन नीडल को उपयोगी ईंधन में बदलने का प्रयास किया जा रहा है।

पिरूल से तैयार होते हैं ब्रिकेट

प्लांट में एकत्र किए गए पिरूल को निर्धारित प्रक्रिया के तहत तैयार कर ब्रिकेट का रूप दिया जाता है। ब्रिकेट ठोस ईंधन का एक रूप है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न ऊर्जा जरूरतों में किया जा सकता है।

दौरे के दौरान डॉ. टागे टाकी ने पाइन नीडल से ब्रिकेट तैयार करने की प्रक्रिया को बारीकी से समझा। उन्होंने प्लांट में उपलब्ध तकनीक, उत्पादन प्रक्रिया और इससे मिलने वाले संभावित लाभों के बारे में जानकारी ली।

इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य पिरूल को जंगलों में बेकार पड़े रहने देने के बजाय उसे स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधि से जोड़ना है। इससे एक ओर वन क्षेत्रों में पिरूल का दबाव कम किया जा सकता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर विकसित हो सकते हैं।

यूकोस्ट के वित्त पोषण से स्थापित हुआ प्लांट

भिंगराड़ा का पाइन नीडल ब्रिकेटिंग प्लांट उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकोस्ट) के वित्त पोषण से स्थापित किया गया है। इसे सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून की ओर से स्थापित किया गया है।

परियोजना के पीछे वैज्ञानिक तकनीक के माध्यम से पिरूल के उपयोग को बढ़ावा देने की सोच है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन को स्थानीय जरूरतों और ऊर्जा उत्पादन से जोड़ने की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं।

प्रतिनिधिमंडल ने परियोजना के तकनीकी पक्षों को समझने के साथ यह भी जाना कि पिरूल संग्रहण और ब्रिकेट उत्पादन की प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर किस तरह संचालित की जा सकती है।

पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार

पिरूल से ब्रिकेट बनाने की परियोजना को पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जंगलों में सूखी पत्तियों की मात्रा कम होने से वनाग्नि के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, वनाग्नि रोकने के लिए केवल पिरूल हटाना ही पर्याप्त नहीं है, लेकिन इसका व्यवस्थित उपयोग आग के खतरे को कम करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा बन सकता है।

इसके अलावा पाइन नीडल को ईंधन में बदलने से स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक ऊर्जा संसाधन उपलब्ध कराने की संभावना भी बनती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध जैविक सामग्री का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।

आर्थिक लाभ की संभावनाएं

पिरूल आधारित ब्रिकेटिंग मॉडल में आर्थिक गतिविधियों की भी संभावनाएं हैं। पिरूल का संग्रहण, परिवहन, प्रसंस्करण और ब्रिकेट निर्माण जैसी गतिविधियों में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

दौरे के दौरान डॉ. टागे टाकी ने परियोजना के पर्यावरणीय और आर्थिक पहलुओं की जानकारी ली। अरुणाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्य में भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसी तकनीक के उपयोग की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।

दूसरे राज्यों के लिए बन सकता है मॉडल

भिंगराड़ा प्लांट का दौरा इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि पिरूल जैसी स्थानीय समस्या के समाधान के लिए विकसित मॉडल अब दूसरे राज्यों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। पर्वतीय राज्यों में वन क्षेत्र, प्राकृतिक संसाधन और स्थानीय परिस्थितियां कई मामलों में समान हैं। ऐसे में एक राज्य में विकसित तकनीक और अनुभव दूसरे राज्य के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

अरुणाचल प्रदेश के प्रतिनिधिमंडल के दौरे से यह संकेत मिलता है कि पिरूल प्रबंधन और उससे ऊर्जा उत्पादन की तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है।

भिंगराड़ा में चल रही यह पहल फिलहाल पिरूल को एक चुनौती के बजाय उपयोगी संसाधन के रूप में देखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि तकनीक, बाजार और स्थानीय भागीदारी के बीच बेहतर तालमेल बनाया जाता है, तो इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है। यही वजह है कि उत्तराखंड के इस छोटे से क्षेत्र में शुरू हुआ प्रयोग अब दूसरे राज्यों के लिए भी अध्ययन और संभावित अनुकरण का विषय बन रहा है।

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