
देहरादून। उत्तराखंड में धराली जैसी प्राकृतिक आपदाओं की पुनरावृत्ति रोकने और भविष्य में मलबे के तेज बहाव से होने वाली तबाही को कम करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान शुरू कर दी है। इसी क्रम में सीमांत पर्वतीय जिलों में मलबे के बहाव के खतरे का आकलन करने के लिए एक विशेष अध्ययन कराया गया। जियो स्पेशियल मैपिंग और मैदानी आकलन के आधार पर उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों में कुल 49 ऐसे स्थान चिह्नित किए गए हैं, जहां भविष्य में मलबे का तेज बहाव भारी तबाही मचा सकता है।
अध्ययन में चिन्हित 49 संवेदनशील स्थानों में से 11 को हाई रिस्क जोन के तौर पर चिह्नित किया गया है। इन क्षेत्रों में मलबे के बहाव का खतरा अपेक्षाकृत अधिक माना गया है। ऐसे में इन स्थानों पर भविष्य में होने वाली प्राकृतिक घटनाओं से संभावित नुकसान को कम करने के लिए विशेष निगरानी और आपदा प्रबंधन की तैयारियों को मजबूत करने की जरूरत होगी।
जियो स्पेशियल मैपिंग से हुई संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान
राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से किए गए अध्ययन में आधुनिक तकनीक के साथ-साथ मैदानी स्तर पर आकलन को भी शामिल किया गया। जियो स्पेशियल मैपिंग के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति, ढलान, जल निकासी और मलबे के संभावित बहाव वाले रास्तों का अध्ययन किया गया। इसके बाद मैदानी स्तर पर भी स्थिति का आकलन किया गया।
इस प्रक्रिया के आधार पर ऐसे स्थानों की पहचान की गई जहां प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण भविष्य में मलबे का तेज बहाव होने की आशंका है। पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक भारी बारिश या बादल फटने जैसी घटनाओं के दौरान बड़ी मात्रा में पानी के साथ मिट्टी, पत्थर और अन्य मलबा नीचे की ओर बह सकता है। यदि इसका बहाव आबादी या बुनियादी ढांचे की ओर होता है तो बड़े पैमाने पर नुकसान की स्थिति पैदा हो सकती है।
उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ पर विशेष नजर
अध्ययन के दायरे में उत्तराखंड के तीन सीमांत पर्वतीय जिलों—उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़—को शामिल किया गया है। ये जिले भौगोलिक रूप से संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में आते हैं और यहां कई स्थानों पर तीखी ढलान, नदी-नालों और पहाड़ी भूगोल के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना रहता है।
तीनों जिलों में कुल 49 संवेदनशील स्थानों की पहचान की गई है। इनमें 11 स्थानों को हाई रिस्क जोन के रूप में चिन्हित किया गया है। इन क्षेत्रों में मलबे के तेज बहाव की स्थिति में नुकसान की आशंका अधिक है। ऐसे स्थानों पर समय रहते चेतावनी और राहत-बचाव की व्यवस्था मजबूत करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
धराली जैसी घटनाओं से सबक
उत्तराखंड में हाल के वर्षों में अचानक भारी बारिश, बादल फटने, भूस्खलन और मलबे के बहाव जैसी घटनाओं ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया है। धराली जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारियों और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान की आवश्यकता को और बढ़ा दिया है।
अचानक आने वाले मलबे के बहाव की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसमें लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के लिए बहुत कम समय मिल सकता है। ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों की पहले से पहचान होने पर प्रशासन स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन की योजनाएं तैयार कर सकता है।
हाई रिस्क जोन में बढ़ानी होगी निगरानी
11 हाई रिस्क जोन की पहचान के बाद इन क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता होगी। संभावित मलबे के बहाव वाले मार्गों पर नियमित निरीक्षण, मौसम की निगरानी और स्थानीय स्तर पर चेतावनी तंत्र को मजबूत किया जा सकता है।
इसके अलावा संवेदनशील स्थानों पर रहने वाले लोगों को भी आपदा की स्थिति में अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों की जानकारी देना महत्वपूर्ण होगा। स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमों के बीच बेहतर समन्वय से किसी भी आपात स्थिति में राहत और बचाव अभियान को तेजी से संचालित किया जा सकता है।
स्थानीय स्तर पर तैयारी जरूरी
पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन बेहतर तैयारी के जरिए इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए संवेदनशील इलाकों की पहचान, लगातार निगरानी, समय पर चेतावनी और त्वरित राहत-बचाव व्यवस्था अहम भूमिका निभाती है।
49 संवेदनशील स्थानों की पहचान के बाद अब प्रशासन के सामने इन क्षेत्रों में जोखिम कम करने की कार्ययोजना तैयार करने की चुनौती होगी। खासकर 11 हाई रिस्क जोन में प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षा उपाय किए जाने की जरूरत होगी।
अध्ययन के जरिए सामने आए आंकड़े उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। जियो स्पेशियल मैपिंग और मैदानी आकलन से चिन्हित किए गए संवेदनशील क्षेत्रों के आधार पर भविष्य की आपदा प्रबंधन रणनीति को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
कुल मिलाकर, उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ में 49 संवेदनशील स्थानों और 11 हाई रिस्क जोन की पहचान राज्य के आपदा प्रबंधन तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। धराली जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए यदि इन क्षेत्रों में समय रहते निगरानी, चेतावनी और राहत-बचाव की व्यवस्था मजबूत की जाती है तो भविष्य में मलबे के तेज बहाव से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। अब इस अध्ययन के आधार पर आगे की कार्रवाई और सुरक्षा उपायों को जमीन पर उतारना सबसे अहम होगा।





