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- मोबाइल की किस्त के लिए...

लखनऊ। राजधानी लखनऊ के निगोहां क्षेत्र से मोबाइल फोन की किस्त वसूलने के नाम पर एक युवक को कथित रूप से अगवा करने, बंधक बनाकर पीटने और उसका खून निकलवाने का गंभीर मामला सामने आया है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि फाइनेंस कंपनी से जुड़े रिकवरी एजेंट युवक को एक ब्लड बैंक ले गए, जहां उसका एक यूनिट खून निकलवाकर बेच दिया गया। इसके बाद परिवार को धमकाकर मोबाइल फोन की बकाया किस्त के 2,799 रुपये खाते में मंगवाए गए। सभी आरोप पीड़ित पक्ष के दावे पर आधारित हैं और इनकी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।
जानकारी के मुताबिक, पीड़ित युवक निगोहां थाना क्षेत्र के राजाराम खेड़ा पुरहिया गांव का निवासी है। उसने किस्तों पर एक मोबाइल फोन खरीदा था। कथित रूप से एक महीने की किस्त जमा नहीं होने पर फाइनेंस कंपनी के रिकवरी एजेंट उससे रुपये मांग रहे थे। आरोप है कि इसी किस्त की वसूली के लिए एजेंटों ने युवक को जबरन अपने साथ ले लिया। उसे कहां से और किस समय ले जाया गया, इस संबंध में उपलब्ध जानकारी स्पष्ट नहीं है।
परिवार का आरोप है कि युवक को अपने साथ ले जाने के बाद रिकवरी एजेंट उसे एक ब्लड बैंक लेकर पहुंचे। वहां कथित रूप से युवक का एक यूनिट खून निकलवाया गया और उसे बेच दिया गया। हालांकि, घटना किस ब्लड बैंक में हुई, खून निकालने से पहले युवक की सहमति ली गई थी या नहीं और इस प्रक्रिया के लिए किन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। संबंधित ब्लड बैंक का पक्ष भी उपलब्ध नहीं है।
पीड़ित पक्ष के अनुसार, खून निकलवाने के बाद भी युवक को छोड़ा नहीं गया। उसे कथित रूप से एक स्थान पर बंधक बनाकर रखा गया और उसके साथ मारपीट की गई। आरोप है कि उससे किस्त की रकम चुकाने का दबाव बनाया जाता रहा। इस दौरान युवक को कितने समय तक बंधक रखा गया और उसे किस स्थान पर रखा गया, इस बारे में भी आधिकारिक विवरण सामने नहीं आया है।
आरोप है कि रिकवरी एजेंटों ने युवक के घरवालों से भी फोन पर संपर्क किया। उन्होंने परिवार को धमकाते हुए बकाया किस्त तुरंत जमा करने के लिए कहा। परिवार का दावा है कि रुपये नहीं देने पर युवक को जान से मारने की धमकी दी गई। युवक की सुरक्षा को लेकर डरे परिवार ने आरोपियों की ओर से बताए गए खाते में 2,799 रुपये भेज दिए। यह रकम मोबाइल फोन की एक महीने की कथित बकाया किस्त बताई जा रही है।
परिवार की ओर से रुपये खाते में भेजे जाने के बाद युवक को कब और किस हालत में छोड़ा गया, इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है। मारपीट में उसे कितनी चोट आई और उसका चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया या नहीं, इसकी भी पुष्टि नहीं हुई है। मामले में चिकित्सा रिपोर्ट सामने आने पर ही युवक के शरीर पर लगी चोटों और खून निकाले जाने से संबंधित दावों की स्वतंत्र पुष्टि हो सकेगी।
यह मामला सामने आने के बाद निजी फाइनेंस कंपनियों के लिए काम करने वाले रिकवरी एजेंटों के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। किसी किस्त का भुगतान रुकने पर संबंधित व्यक्ति को अगवा करने, बंधक बनाने, मारपीट करने या जान से मारने की धमकी देने का किसी को अधिकार नहीं है। बकाया रकम की वसूली निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है। हालांकि, इस मामले में फाइनेंस कंपनी और उसके कथित रिकवरी एजेंटों की भूमिका की आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
घटना में ब्लड बैंक की कथित भूमिका भी जांच का महत्वपूर्ण विषय हो सकती है। सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति से रक्त लेने से पहले उसकी पहचान, स्वास्थ्य और सहमति से संबंधित प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं। पीड़ित पक्ष के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह पता करना जरूरी होगा कि युवक को ब्लड बैंक कौन लेकर गया था, किसके नाम पर रक्तदान दर्ज किया गया और वहां मौजूद कर्मचारियों ने क्या प्रक्रिया अपनाई थी। फिलहाल इन सवालों का कोई प्रमाणित जवाब सामने नहीं आया है।
खाते में भेजे गए 2,799 रुपये का लेनदेन भी मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकता है। जिस बैंक खाते में रकम भेजी गई, वह खाता किस व्यक्ति या संस्था के नाम पर है और रकम किस उद्देश्य से ली गई, इसकी जानकारी सामने आने के बाद घटनाक्रम की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है। परिवार को किए गए फोन कॉल और धमकी से जुड़े कॉल रिकॉर्ड की पुष्टि भी जरूरी होगी।
मामले में शिकायत दर्ज कराई गई है या नहीं, प्राथमिकी की धाराएं क्या हैं और किसी को हिरासत में लिया गया है या नहीं, इसकी जानकारी दिए गए समाचार विवरण में उपलब्ध नहीं है। फाइनेंस कंपनी, संबंधित ब्लड बैंक और आरोपों में घिरे रिकवरी एजेंटों का पक्ष भी सामने नहीं आया है। ऐसे में खबर प्रकाशित करते समय घटना को पीड़ित परिवार के आरोप के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।





