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उत्तर प्रदेश
UP में ओवैसी का बढ़ता असर सपा कांग्रेस के लिए क्यों खतरे की घंटी
Ratna Netam
11 Aug 2026 7:36 PM IST

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उत्तर प्रदेश : 2027 के विधानसभा चुनावों में अभी काफी समय बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी क्रम में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपना आधार मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है। पिछले करीब डेढ़ महीने में ओवैसी ने बहराइच, बिजनौर, सहारनपुर और मुरादाबाद में बड़ी रैलियां की हैं। इन इलाकों को समाजवादी पार्टी के मजबूत राजनीतिक क्षेत्रों में गिना जाता है। ओवैसी की लगातार रैलियों और उनमें जुटने वाली भीड़ ने सपा और कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है।
AIMIM की सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से करीब 97 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। पार्टी को कुल करीब 0.49 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि राज्य स्तर पर यह आंकड़ा छोटा दिखाई देता है, लेकिन कुछ सीटों पर AIMIM उम्मीदवारों ने हजारों वोट हासिल किए थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों को 5 हजार से लेकर 25 हजार तक वोट मिले। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक कम से कम 7 से 8 ऐसी सीटें थीं, जहां सपा या उसके गठबंधन उम्मीदवारों की हार का अंतर AIMIM प्रत्याशी को मिले वोटों से कम था। ऐसे में मुस्लिम वोटों के बंटवारे ने कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित किया।
इसी पुराने चुनावी अनुभव को देखते हुए सपा और कांग्रेस इस बार AIMIM की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दोनों दल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में AIMIM के प्रभावशाली नेताओं और संगठन से जुड़े पदाधिकारियों को अपने साथ लाने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। AIMIM के राष्ट्रीय प्रवक्ता असीम वकार का नाम भी इस राजनीतिक चर्चा में सामने आ रहा है। हाल के दिनों में उनके बयानों में इंडिया गठबंधन और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख दिखाई देने का दावा किया गया है। हालांकि उन्होंने किसी दल में शामिल होने को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में AIMIM के स्थानीय नेताओं के बयानों ने भी राजनीतिक अटकलों को हवा दी है। मुरादाबाद के जिला संगठन से जुड़े नेताओं ने कहा है कि राजनीति किस दिशा में जाएगी, अभी कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। रामपुर और सहारनपुर में भी पार्टी संगठन से जुड़े कुछ नेताओं के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा चल रही है। यही वजह है कि सपा और कांग्रेस की नजर AIMIM के स्थानीय संगठन पर भी बनी हुई है।
ओवैसी की हालिया रैलियों का चुनावी भूगोल भी काफी रणनीतिक माना जा रहा है। बहराइच के मटेरा क्षेत्र में AIMIM ने शौकत अली को उम्मीदवार घोषित करने की घोषणा की है। बिजनौर के नजीबाबाद में आयोजित 'पैगाम-ए-इत्तेहाद' कार्यक्रम में ओवैसी ने सपा, बसपा और कांग्रेस पर निशाना साधा। सहारनपुर में उन्होंने मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आजम खान और जौहर यूनिवर्सिटी जैसे मुद्दों को उठाया। वहीं मुरादाबाद में उन्होंने सपा के सामने गठबंधन का विकल्प रखते हुए बीजेपी को रोकने के लिए साथ आने की अपील की।
ओवैसी की रणनीति में एक खास बात यह भी दिखाई दे रही है कि उनकी शुरुआती गतिविधियां उन क्षेत्रों में केंद्रित हैं, जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण है और सपा के मुस्लिम विधायक मौजूद हैं। इससे साफ है कि AIMIM पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक पहचान को केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि संगठन को भी मजबूत करना चाहती है।
सपा की ओर से कहा गया है कि संविधान, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए पार्टी के दरवाजे खुले हैं। कांग्रेस की ओर से भी संकेत दिए गए हैं कि अगर AIMIM से जुड़े कोई प्रमुख नेता पार्टी में आने की इच्छा जताते हैं तो केंद्रीय नेतृत्व उनके बारे में फैसला कर सकता है।
AIMIM के लिए उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना है। 2017 में पार्टी का वोट शेयर करीब 0.24 फीसदी था, जो 2022 में बढ़कर लगभग 0.49 फीसदी हुआ। निकाय चुनावों में भी पार्टी ने कुछ क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। मेरठ मेयर चुनाव में AIMIM के दूसरे स्थान पर रहने को पार्टी के बढ़ते प्रभाव के संकेत के तौर पर देखा गया था।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी की रैलियों ने पश्चिमी यूपी की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है। AIMIM अगर अपने संगठन और वोट बैंक को मजबूत करने में सफल रहती है तो सपा और कांग्रेस के चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। वहीं, अगर विपक्षी दल समय रहते मुस्लिम मतों के संभावित बंटवारे को रोकने के लिए रणनीति तैयार कर लेते हैं, तो चुनावी तस्वीर अलग हो सकती है। फिलहाल ओवैसी की सक्रियता ने उत्तर प्रदेश की आगामी सियासत में एक नए राजनीतिक मुकाबले की जमीन तैयार कर दी है।
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