उत्तर प्रदेश

जायस में सिंघाड़े की खेती बनी कमाई का जरिया, एक बीघे में 20 क्विंटल तक उत्पादन

Kavita2
31 Oct 2026 3:32 PM IST
जायस में सिंघाड़े की खेती बनी कमाई का जरिया, एक बीघे में 20 क्विंटल तक उत्पादन
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अमेठी। जब शहर के ज्यादातर लोग गहरी नींद में होते हैं, उस समय उत्तर प्रदेश के जायस क्षेत्र में किसानों की दिनचर्या शुरू हो जाती है। अंधेरे में तालाबों में उतरकर किसान सिंघाड़े की फसल तोड़ने में जुट जाते हैं। घंटों की मेहनत के बाद ताजा सिंघाड़ा लेकर वे सुबह करीब चार बजे मंडी पहुंचते हैं। इसके बाद शुरू होता है खरीद-फरोख्त का सिलसिला, जो सुबह साढ़े छह बजे तक चलता है। जायस की यह मंडी अब जिले में सिंघाड़े के कारोबार के प्रमुख केंद्र के रूप में पहचान बना चुकी है। यहां हर दिन बड़ी संख्या में किसान और व्यापारी पहुंचते हैं। इस वर्ष सिंघाड़े को मिल रहे अच्छे दामों ने किसानों के चेहरे पर राहत और खुशी ला दी है। खास बात यह है कि कई किसान अब धान की तुलना में सिंघाड़े की खेती को ज्यादा लाभकारी मानने लगे हैं।

रात तीन बजे तालाबों में शुरू होती है किसानों की मेहनत

जायस क्षेत्र में सिंघाड़े की खेती करने वाले किसानों की दिनचर्या दूसरे किसानों से काफी अलग है। यहां सुबह होने से पहले ही खेतों और तालाबों में काम शुरू हो जाता है। किसान रात करीब तीन बजे तालाबों में उतरकर पानी के भीतर फैली सिंघाड़े की बेलों से फल तोड़ते हैं।

सिंघाड़ा पानी में उगने वाली फसल है। इसकी खेती के लिए तालाबों और जलभराव वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। किसानों को पानी के भीतर काफी समय तक मेहनत करनी पड़ती है। फसल तोड़ने के बाद उसे एकत्र किया जाता है और फिर मंडी तक पहुंचाने की तैयारी होती है।

सुबह चार बजे तक किसान अपनी उपज लेकर जायस मंडी पहुंचने लगते हैं। यहां व्यापारी पहले से खरीदारी के लिए मौजूद रहते हैं। सुबह साढ़े छह बजे तक मंडी में अच्छी खासी चहल-पहल रहती है। कम समय में बड़ी मात्रा में सिंघाड़े की खरीद-फरोख्त होने के कारण यह मंडी स्थानीय किसानों के लिए महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गई है।

जुलाई में रोपाई, अक्टूबर के अंत तक तैयार हो जाती है फसल

सिंघाड़े की खेती का मौसम जुलाई से शुरू होता है। किसान बारिश के मौसम में तालाबों में इसकी रोपाई करते हैं। इसके बाद पानी और अनुकूल मौसम में पौधे तेजी से विकसित होते हैं। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक फसल तैयार होने लगती है और किसान इसकी तुड़ाई शुरू कर देते हैं।

किसानों के मुताबिक, एक बीघे के तालाब में लगभग 20 क्विंटल तक सिंघाड़े का उत्पादन हो सकता है। हालांकि, वास्तविक उत्पादन तालाब के आकार, पानी की उपलब्धता, मौसम और खेती की देखभाल पर निर्भर करता है।

कम लागत में अच्छी पैदावार मिलने की संभावना ने किसानों को इस फसल की ओर आकर्षित किया है। धान की खेती के मुकाबले सिंघाड़े में बेहतर आमदनी मिलने से कई किसान इसे अतिरिक्त कमाई के अवसर के रूप में भी अपना रहे हैं।

कच्चे से ज्यादा मिल रहा उबले सिंघाड़े का भाव

जायस मंडी में शुक्रवार को सिंघाड़े की कीमतों ने किसानों को राहत दी। बाजार में कच्चा सिंघाड़ा 120 रुपये प्रति पसेरी और उबला सिंघाड़ा 510 रुपये प्रति पसेरी के भाव से बिका।

दोनों किस्मों की कीमत में बड़ा अंतर होने के कारण किसान अपनी उपज को उबालकर बेचने के विकल्प पर भी विचार करते हैं। हालांकि, उबालने की प्रक्रिया में श्रम, ईंधन और समय का खर्च भी शामिल होता है।

त्योहारी सीजन और सर्दियों की शुरुआत के साथ सिंघाड़े की मांग बढ़ने से किसानों को अच्छे भाव मिलने की उम्मीद रहती है। खासकर उबले सिंघाड़े की मांग बाजार में अधिक देखी जाती है। इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने का अवसर मिलता है।

धान की खेती से ज्यादा लाभकारी मान रहे किसान

जायस क्षेत्र के कई किसानों का कहना है कि धान की खेती में खाद, बीज, सिंचाई और मजदूरी पर अच्छा खासा खर्च करना पड़ता है। इसके बाद भी मौसम और बाजार भाव के कारण मुनाफा प्रभावित हो सकता है।

इसके मुकाबले तालाबों में सिंघाड़े की खेती से बेहतर आमदनी की संभावना दिखाई दे रही है। किसानों को स्थानीय मंडी में ही खरीदार मिल जाते हैं, जिससे उपज बेचने के लिए दूर जाने की जरूरत कम पड़ती है।

सिंघाड़े की खेती से जुड़े कारोबार में किसानों के अलावा व्यापारी, परिवहन करने वाले और स्थानीय छोटे कारोबारी भी लाभ उठा रहे हैं। इस तरह यह फसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने में भी योगदान कर रही है।

सुबह साढ़े छह बजे तक चलता है कारोबार

जायस की सिंघाड़ा मंडी की सबसे खास बात इसका सीमित लेकिन व्यस्त समय है। जहां सामान्य मंडियों में दिनभर खरीद-बिक्री होती है, वहीं यहां सुबह चार बजे से साढ़े छह बजे तक प्रमुख कारोबार होता है।

इस दौरान किसान तालाबों से ताजा सिंघाड़ा लेकर पहुंचते हैं और व्यापारी अपनी जरूरत के अनुसार खरीदारी करते हैं। जल्दी खरीदारी होने से किसानों को उसी दिन अपनी उपज का भुगतान और आगे की बिक्री की तैयारी करने का अवसर मिलता है।

मंडी में रोजाना जुटने वाली भीड़ यह बताती है कि क्षेत्र में सिंघाड़े का कारोबार तेजी से अपनी पहचान बना रहा है।

सिंघाड़े की खेती से बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था

जायस के किसानों के लिए सिंघाड़ा केवल मौसमी फसल नहीं, बल्कि आमदनी का एक मजबूत विकल्प बनता जा रहा है। तालाबों का उपयोग खेती के लिए होने से जल संसाधनों का आर्थिक इस्तेमाल भी संभव हो रहा है।

हालांकि, इस खेती की सफलता के लिए तालाबों में पर्याप्त पानी, अच्छी गुणवत्ता वाले पौधे और बाजार तक उचित पहुंच जरूरी है। किसानों को यदि उचित बाजार व्यवस्था और भंडारण की सुविधा मिले तो इस कारोबार को और बढ़ाया जा सकता है।

रात तीन बजे से शुरू होकर सुबह साढ़े छह बजे तक चलने वाली जायस की यह मंडी किसानों की मेहनत और ग्रामीण व्यापार की एक अलग तस्वीर पेश करती है। अच्छे भाव और बेहतर उत्पादन की उम्मीद के बीच क्षेत्र के किसान सिंघाड़े की खेती को अपनी आमदनी बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बना रहे हैं।

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