उत्तर प्रदेश

डाक विभाग में बड़ा फर्जीवाड़ा, 22 डाक सेवक बर्खास्त

Rajeshwari Nishad
4 Nov 2026 3:35 PM IST
डाक विभाग में बड़ा फर्जीवाड़ा, 22 डाक सेवक बर्खास्त
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गोंडा। उत्तर प्रदेश के गोंडा और बलरामपुर से जुड़े डाक विभाग में ग्रामीण डाक सेवकों की भर्ती में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। वर्ष 2024-25 में हुई भर्ती के दौरान चयनित 42 अभ्यर्थियों के शैक्षिक प्रमाणपत्र सत्यापन में फर्जी पाए गए हैं। मामले का खुलासा होने के बाद डाक विभाग ने सख्त कार्रवाई करते हुए नौकरी कर रहे 22 ग्रामीण डाक सेवकों की सेवाएं समाप्त कर दी हैं। वहीं, 16 ऐसे चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्तियां निरस्त मानी गई हैं, जिन्होंने चयन होने के बावजूद कार्यभार ग्रहण नहीं किया था। चार अन्य अभ्यर्थियों के खिलाफ पहले ही कार्रवाई की जा चुकी थी। इस खुलासे के बाद डाक विभाग की भर्ती प्रक्रिया और दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
मिली जानकारी के अनुसार, डाक विभाग में ग्रामीण डाक सेवक पदों के लिए वर्ष 2024-25 में भर्ती प्रक्रिया आयोजित की गई थी। इसमें बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थियों की शैक्षिक योग्यता और प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्तियां की गई थीं। हालांकि, बाद में जब संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया, तो कई अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र संदिग्ध पाए गए। विभागीय जांच में कुल 42 अभ्यर्थियों के शैक्षिक अभिलेख फर्जी होने की पुष्टि हुई।
बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के प्रमाणपत्रों से हुआ खुलासा
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई है कि संबंधित 42 अभ्यर्थियों ने बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के हाईस्कूल समकक्ष प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे। भर्ती प्रक्रिया के बाद इन प्रमाणपत्रों की वास्तविकता जांचने के लिए विभाग ने संबंधित बोर्ड से सत्यापन कराया।बोर्ड से प्राप्त रिपोर्ट में इन अभ्यर्थियों के शैक्षिक दस्तावेज फर्जी पाए गए। इसके बाद डाक विभाग ने संबंधित अभ्यर्थियों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की।ग्रामीण डाक सेवक भर्ती में शैक्षिक योग्यता महत्वपूर्ण आधार होती है। ऐसे में फर्जी प्रमाणपत्रों के माध्यम से चयन होने का मामला भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर विषय है।
22 ग्रामीण डाक सेवकों की सेवा समाप्त
डाक विभाग ने सत्यापन रिपोर्ट के आधार पर सबसे बड़ी कार्रवाई उन अभ्यर्थियों के खिलाफ की, जो नियुक्ति प्राप्त करने के बाद विभाग में कार्यरत थे।जानकारी के मुताबिक, 42 मामलों में से 22 ग्रामीण डाक सेवक नौकरी कर रहे थे। प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बाद सोमवार को इन सभी 22 कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं।यह कार्रवाई विभाग की ओर से शैक्षिक अभिलेखों के सत्यापन के बाद की गई है। संबंधित कर्मचारियों की नियुक्तियों का आधार बने दस्तावेज सही नहीं पाए जाने के कारण उन्हें पद से हटाया गयाविभागीय कार्रवाई के बाद अब इन मामलों में आगे की कानूनी प्रक्रिया को लेकर भी विचार किया जा रहा है।
16 चयनित अभ्यर्थियों ने नहीं किया था कार्यभार ग्रहण
इस पूरे मामले में 16 ऐसे अभ्यर्थियों के नाम भी सामने आए हैं, जिनका चयन तो हो गया था, लेकिन उन्होंने विभाग में कार्यभार ग्रहण नहीं किया था।इन अभ्यर्थियों के शैक्षिक प्रमाणपत्र भी सत्यापन में फर्जी पाए गए हैं। ऐसे में उनकी नियुक्ति आगे नहीं बढ़ाई गई।अधिकारियों के अनुसार, चार अन्य अभ्यर्थियों के खिलाफ पहले ही कार्रवाई की जा चुकी थी। इस प्रकार कुल 42 मामलों में विभागीय स्तर पर कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट हुई है।इन आंकड़ों के अनुसार, 22 कार्यरत डाक सेवकों को पद से हटाया गया, 16 चयनित अभ्यर्थियों ने नौकरी ज्वाइन नहीं की थी और चार अन्य मामलों में पहले ही कार्रवाई हो चुकी थी।
डाक अधीक्षक ने दी कार्रवाई की जानकारी
डाक अधीक्षक एसपी राय के अनुसार, वर्ष 2024-25 में ग्रामीण डाक सेवकों की भर्ती के बाद चयनित अभ्यर्थियों के शैक्षिक अभिलेख सत्यापन के लिए संबंधित बोर्ड को भेजे गए थे।सत्यापन रिपोर्ट मिलने पर 42 अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्र फर्जी पाए गए। इसके बाद विभाग ने संबंधित मामलों में कार्रवाई शुरू की।डाक अधीक्षक ने बताया कि सोमवार को 22 ग्रामीण डाक सेवकों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा से निष्कासन के बाद आगे की विधिक कार्रवाई के संबंध में उच्चाधिकारियों से प्राप्त निर्देशों का पालन किया जाएगा।
भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे सवाल
ग्रामीण डाक सेवकों की भर्ती में फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों का मामला सामने आने से भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेज सत्यापन के महत्व पर एक बार फिर ध्यान गया है।डाक विभाग में ग्रामीण डाक सेवकों के पदों पर चयन के लिए निर्धारित शैक्षिक योग्यता और अन्य पात्रता शर्तों का पालन करना आवश्यक होता है।यदि कोई अभ्यर्थी गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करके चयन प्राप्त करता है, तो इससे पात्र अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।विशेषज्ञों के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया में प्रमाणपत्रों का समय पर सत्यापन बेहद जरूरी है। इससे गलत दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियां होने की आशंका कम की जा सकती है।इस मामले में विभाग ने संबंधित शिक्षा बोर्ड से प्रमाणपत्रों की जांच कराई, जिसके बाद फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ।
योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों से जुड़ा मामला
सरकारी और सार्वजनिक सेवाओं में भर्ती के दौरान पारदर्शिता बनाए रखना बेहद आवश्यक है। जब कोई अभ्यर्थी फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर चयन प्राप्त करता है, तो इससे उन उम्मीदवारों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने सही दस्तावेजों के साथ आवेदन किया था।ग्रामीण डाक सेवक भर्ती में चयनित अभ्यर्थियों के शैक्षिक अंकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में प्रमाणपत्रों में गड़बड़ी का सीधा असर चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर पड़ सकता है।इस मामले में 42 अभ्यर्थियों के दस्तावेज फर्जी मिलने से सवाल उठता है कि नियुक्ति के प्रारंभिक चरण में इन प्रमाणपत्रों की वास्तविकता का पता क्यों नहीं चल पाया।हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि संबंधित अभ्यर्थियों ने दस्तावेज स्वयं तैयार किए थे या किसी अन्य व्यक्ति अथवा गिरोह की सहायता ली थी। इस संबंध में बिना आधिकारिक निष्कर्ष के किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता का दावा करना उचित नहीं होगा।
फर्जी दस्तावेज देने वालों पर हो सकती है कानूनी कार्रवाई
डाक विभाग की कार्रवाई केवल नौकरी से हटाने तक सीमित नहीं रह सकती। फर्जी दस्तावेज प्रस्तुत करके नियुक्ति प्राप्त करने के मामलों में संबंधित नियमों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर कानूनी कार्रवाई भी संभव है।डाक विभाग ने सितंबर 2026 में ग्रामीण डाक सेवक भर्ती में पहचान और पात्रता संबंधी धोखाधड़ी रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए थे।इन प्रावधानों के तहत जानबूझकर फर्जी प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने या पात्रता संबंधी जानकारी में हेरफेर करने के मामलों में उम्मीदवारी निरस्त करने, सेवा समाप्ति, प्राथमिकी दर्ज कराने तथा भविष्य की भर्ती से प्रतिबंधित करने जैसी कार्रवाई का प्रावधान है।हालांकि, गोंडा और बलरामपुर से जुड़े इन 42 मामलों में आगे क्या कानूनी कदम उठाए जाएंगे, यह उच्चाधिकारियों के निर्देश और संबंधित प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत
इस मामले ने शैक्षिक प्रमाणपत्रों की जांच और भर्ती प्रक्रिया की निगरानी को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं।यदि भर्ती के शुरुआती चरण में ही दस्तावेजों का प्रभावी सत्यापन किया जाए, तो फर्जी प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने वाले अभ्यर्थियों की पहचान समय रहते हो सकती है।इसके लिए संबंधित शिक्षा बोर्ड और भर्ती करने वाले विभागों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। डिजिटल प्रमाणपत्र सत्यापन और दस्तावेजों के रिकॉर्ड की जांच जैसी प्रक्रियाएं भी उपयोगी साबित हो सकती हैं।गोंडा और बलरामपुर से जुड़े डाक विभाग के इस मामले में 42 प्रमाणपत्र फर्जी मिलने और 22 कर्मचारियों की सेवा समाप्त होने के बाद अब आगे की विधिक कार्रवाई पर नजर रहेगी।
विभाग की इस कार्रवाई को भर्ती प्रक्रिया में गलत दस्तावेज प्रस्तुत करने वालों के लिए कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही यह मामला दर्शाता है कि सरकारी सेवाओं में निष्पक्ष चयन सुनिश्चित करने के लिए दस्तावेजों का प्रभावी सत्यापन कितना आवश्यक है।
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