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लोक अदालत में बहिष्कार को लेकर हंगामा कुछ वकीलों से नोकझोंक

कानपुर। राष्ट्रीय लोक अदालत के दौरान शनिवार को अधिवक्ताओं के बहिष्कार को लेकर न्यायालय परिसर में हंगामे की स्थिति बन गई। बार एसोसिएशन और लायर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों के नेतृत्व में पहुंचे अधिवक्ताओं ने नारेबाजी की और अदालतों में काम कर रहे कुछ वकीलों को बाहर आने के लिए कहा। इस दौरान कुछ अधिवक्ताओं के साथ नोकझोंक भी हुई। घटनाक्रम से पहले दोनों संगठनों के संयुक्त प्रांतीय सम्मेलन में राष्ट्रीय लोक अदालत के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया गया था। शनिवार को उसी निर्णय के समर्थन में अधिवक्ता न्यायालय भवन पहुंचे।
गुरुवार और शुक्रवार को बार एसोसिएशन तथा लायर्स एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय प्रांतीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। सम्मेलन के अंतिम दिन राष्ट्रीय लोक अदालत का बहिष्कार करने का प्रस्ताव पारित किया गया। इस निर्णय के बाद शनिवार को प्रस्ताव लागू कराने की कोशिश दिखाई दी। हालांकि, उपलब्ध विवरण में बहिष्कार की मांग के पीछे के सभी कारण और सम्मेलन में पारित अन्य प्रस्तावों की जानकारी नहीं है। इसलिए आंदोलन की पृष्ठभूमि को किसी विशेष मांग या विवाद से जोड़कर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
शनिवार सुबह राष्ट्रीय लोक अदालत की कार्यवाही शुरू हुई। दोपहर लगभग 12 बजे बार एसोसिएशन के महामंत्री बिनय मिश्रा और लायर्स एसोसिएशन के महामंत्री राजीव यादव के नेतृत्व में अधिवक्ताओं का समूह न्यायालय भवन पहुंचा। वहां ‘अधिवक्ता एकता जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए। इसके बाद समूह में शामिल अधिवक्ता उन अदालतों की ओर गए, जहां कुछ वकील काम कर रहे थे। उन्होंने वहां मौजूद अधिवक्ताओं को बहिष्कार के प्रस्ताव की जानकारी देकर बाहर आने के लिए समझाया।
उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार, कुछ अधिवक्ताओं को समझाकर अदालतों से बाहर निकाला गया। इसी बीच कुछ वकीलों से नोकझोंक हुई। हालांकि, विवाद के दौरान इस्तेमाल किए गए शब्दों और दोनों पक्षों के विस्तृत कथन की जानकारी सामने नहीं आई है। मारपीट, किसी के घायल होने या संपत्ति को नुकसान पहुंचने की पुष्टि भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए घटनाक्रम को नारेबाजी और कहासुनी से आगे किसी हिंसक टकराव के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
बहिष्कार का प्रस्ताव होने के बावजूद कुछ अधिवक्ताओं का काम करते मिलना इस घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोपहर में समूह के पहुंचने तक कम से कम कुछ अदालतों में अधिवक्ता मौजूद थे। हालांकि, इससे उनके बहिष्कार के निर्णय पर औपचारिक रुख का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह जानकारी उपलब्ध नहीं है कि वे किस मामले में पहुंचे थे, उन्हें प्रस्ताव की जानकारी थी या नहीं और बाहर आने के लिए कहे जाने पर उन्होंने क्या पक्ष रखा।
इस विरोध का लोक अदालत के कामकाज पर कितना असर पड़ा, उसका आधिकारिक विवरण अभी उपलब्ध नहीं है। कितने मामलों में समझौता हुआ, कितनी कार्यवाहियां प्रभावित हुईं और किन अदालतों में काम जारी रहा, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए पूरे आयोजन को ठप या रद्द घोषित नहीं किया जा सकता। कुछ अधिवक्ताओं को बाहर बुलाने और नारेबाजी का घटनाक्रम सामने आया है, लेकिन उसका व्यापक प्रभाव संबंधित संस्थाओं के आंकड़ों से ही स्पष्ट होगा।
लोक अदालत का उद्देश्य पक्षों के बीच समझौते से विवादों का समाधान कराना है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की जानकारी के अनुसार, लोक अदालत में कोई शुल्क नहीं देना होता और पक्षों के लिए अधिवक्ता नियुक्त करना अनिवार्य नहीं है। इस व्यवस्था का मकसद लोगों को विवाद सुलझाने का सुलभ अवसर देना है। ऐसे आयोजनों में अधिवक्ताओं की भागीदारी समझौते की शर्तें समझने और संबंधित पक्षों के बीच संवाद में सहायता कर सकती है।
राष्ट्रीय लोक अदालत में सामान्यतः लंबित और मुकदमा दायर होने से पहले के पात्र मामलों के समाधान का अवसर रहता है। विधिक सेवा संस्थाओं की जानकारी के अनुसार, दीवानी और समझौता योग्य आपराधिक मामलों को इस व्यवस्था में लिया जाता है। हालांकि, शनिवार के संबंधित आयोजन में किन श्रेणियों के मामले सूचीबद्ध थे, इसका स्थानीय विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए किसी विशेष श्रेणी के मामलों या पक्षकारों के प्रभावित होने का दावा नहीं किया जा सकता।
बहिष्कार का समर्थन करने वाले संगठनों और न्यायिक कामकाज से जुड़ी संस्थाओं का विस्तृत पक्ष घटनाक्रम को समझने के लिए महत्वपूर्ण होगा। पदाधिकारियों ने प्रस्ताव के समर्थन में अदालत भवन पहुंचकर अधिवक्ताओं से बाहर आने को कहा, लेकिन आगे की रणनीति का विवरण उपलब्ध नहीं है। इसी तरह न्यायालय प्रशासन की प्रतिक्रिया, किसी शिकायत या अतिरिक्त व्यवस्था की जानकारी भी सामने नहीं आई है। घटनास्थल पर मौजूद अन्य लोगों के बयान मिलने से नोकझोंक की परिस्थितियां स्पष्ट हो सकती हैं।
फिलहाल राष्ट्रीय लोक अदालत के दौरान नारेबाजी और कुछ अधिवक्ताओं से कहासुनी का घटनाक्रम सामने आया है। इसकी पृष्ठभूमि दो दिवसीय प्रांतीय सम्मेलन में पारित बहिष्कार का प्रस्ताव है। आगे आयोजकों की प्रतिक्रिया और लोक अदालत के आधिकारिक परिणामों से स्पष्ट होगा कि विरोध ने कार्यवाही को किस हद तक प्रभावित किया। अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर पूरे आयोजन के परिणाम या बहिष्कार की सफलता का अंतिम आकलन नहीं किया जा सकता।





