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UP : ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त, अब प्रशासक के रूप में जारी रहेगा दखल

Uttar Pradesh उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल आज यानी 25 मई को समाप्त हो गया है। कार्यकाल खत्म होने के बावजूद ग्राम पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह नए ढांचे में नहीं जाएगी, बल्कि मौजूदा ग्राम प्रधानों का ही दखल जारी रहेगा। राज्य सरकार ने पंचायत व्यवस्था में निरंतरता बनाए रखने के लिए बड़ा फैसला लिया है।
उत्तर प्रदेश पंचायती राज विभाग द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव के तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की भूमिका दी जाएगी। माना जा रहा है कि इस संबंध में आधिकारिक आदेश सोमवार शाम तक जारी कर दिया जाएगा।
इस निर्णय के बाद राज्य में पहली बार ग्राम पंचायतों में प्रशासक समिति का गठन किया जाएगा। हालांकि इस समिति का नेतृत्व और संचालन मुख्य रूप से मौजूदा ग्राम प्रधानों के हाथों में ही रहेगा, जिससे ग्रामीण प्रशासन में किसी तरह का अचानक बदलाव नहीं होगा और कामकाज सुचारू रूप से चलता रहेगा।
सूत्रों के अनुसार, कार्यकाल समाप्त होने के बाद पंचायतों में विकास कार्य, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक गतिविधियों में किसी तरह की रुकावट न आए, इसलिए यह व्यवस्था लागू की जा रही है। सरकार का मानना है कि यदि तुरंत नई पंचायतों का गठन नहीं होता है, तो इस अंतरिम व्यवस्था से प्रशासनिक स्थिरता बनी रहेगी।
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने के फैसले को एक अस्थायी व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है, जो नई पंचायतों के गठन तक प्रभावी रहेगी। इस दौरान ग्राम स्तर पर चल रही योजनाओं की निगरानी और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी इन्हीं प्रशासकों के पास होगी।
पंचायती राज विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में शासन को सुचारू बनाए रखने के लिए जरूरी थी, ताकि विकास कार्यों की गति पर कोई असर न पड़े। विशेष रूप से मनरेगा, स्वच्छता अभियान, सड़क निर्माण और अन्य ग्रामीण योजनाओं के संचालन में निरंतरता बनी रहेगी।
उत्तर प्रदेश में यह पहली बार है जब ग्राम पंचायतों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद इस तरह की प्रशासक समिति का गठन किया जा रहा है। इससे पहले आमतौर पर नई पंचायतों के गठन तक प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर अलग-अलग अंतरिम व्यवस्थाएं अपनाई जाती रही हैं, लेकिन इस बार सीधे ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी देने का निर्णय लिया गया है।
इस फैसले को लेकर ग्रामीण स्तर पर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे प्रशासनिक स्थिरता के लिए सही कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में देरी हो सकती है। हालांकि सरकार का स्पष्ट मानना है कि यह केवल एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है।
फिलहाल सभी की नजरें सोमवार शाम जारी होने वाले आधिकारिक आदेश पर टिकी हैं, जिसके बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि ग्राम पंचायतों की नई प्रशासनिक व्यवस्था किस तरह से लागू होगी और इसकी संरचना क्या होगी।





