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UP चुनाव 2027: पश्चिमी यूपी में BJP का बड़ा प्लान, जाट-किसान वोटों पर नजर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ और मजबूत करने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। प्रदेश की सत्ता तक पहुंचने में पश्चिमी यूपी की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए भाजपा इस क्षेत्र में जाट मतदाताओं, किसानों और ग्रामीण समुदायों के बीच अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के साथ गठबंधन को इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इसी राजनीतिक समीकरण के बीच गाजियाबाद में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पदयात्रा को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक अहमियत का अंदाजा पिछले दो विधानसभा चुनावों के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिमी यूपी के 24 जिलों की 126 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह पार्टी के लिए बड़ी सफलता थी। हालांकि, 2022 के चुनाव में भाजपा को इस क्षेत्र में 15 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और उसका आंकड़ा घटकर 85 सीटों पर पहुंच गया। इसके बावजूद भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी रही।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनौती दी थी। विशेष रूप से जाट और मुस्लिम मतदाताओं के समीकरण को लेकर काफी चर्चा हुई थी। उस चुनाव में रालोद ने अपनी सीटों की संख्या बढ़ाई थी। हालांकि, गठबंधन भाजपा को क्षेत्र में बहुमत हासिल करने से नहीं रोक पाया था। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और राष्ट्रीय लोकदल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा है।
भाजपा के लिए रालोद के साथ गठबंधन पश्चिमी यूपी में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसर माना जा रहा है। राष्ट्रीय लोकदल का प्रभाव विशेष रूप से जाट बहुल और किसान बहुल क्षेत्रों में रहा है। पार्टी के प्रमुख जयंत चौधरी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की राजनीतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही कारण है कि भाजपा और रालोद के बीच गठबंधन को केवल सीटों के तालमेल तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
गाजियाबाद में आयोजित भाजपा की 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' पदयात्रा को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पांच नवंबर को राजनगर एक्सटेंशन में आयोजित कार्यक्रम का नेतृत्व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किया। पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस आयोजन के माध्यम से कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एकजुट करने की कोशिश की। पदयात्रा से पहले भाजपा नेताओं ने कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी की उम्मीद जताई थी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस राजनीतिक अभियान में पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की विरासत और किसानों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह का नाम किसान राजनीति के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। ऐसे में उनके योगदान को याद करना जाट और किसान समुदाय के बीच राजनीतिक संवाद स्थापित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चौधरी चरण सिंह ने भारतीय राजनीति में किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों को प्रमुख स्थान दिलाया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज भी उनकी राजनीतिक विरासत का व्यापक प्रभाव है। राष्ट्रीय लोकदल इसी विरासत को अपनी राजनीतिक पहचान का आधार मानता है। भाजपा की ओर से किसान हितों और चौधरी चरण सिंह के योगदान को प्रमुखता देने को रालोद के पारंपरिक समर्थक वर्ग तक पहुंच बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाता कई विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। हालांकि, चुनाव परिणाम केवल जाट मतदाताओं के रुख से तय नहीं होते। इस क्षेत्र में मुस्लिम, गुर्जर, त्यागी, दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग और विभिन्न ग्रामीण समुदायों के मतदाता भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि भाजपा को केवल एक समुदाय पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक सामाजिक समर्थन तैयार करने की जरूरत है।
राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार, भाजपा की रणनीति में किसानों से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश गन्ना उत्पादन और कृषि गतिविधियों के लिए जाना जाता है। यहां किसानों के लिए गन्ना मूल्य, भुगतान, सिंचाई, बिजली, कृषि लागत और ग्रामीण सड़कों जैसे मुद्दे चुनावी बहस को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह किसानों के बीच अपनी नीतियों और उपलब्धियों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करे।
वहीं, समाजवादी पार्टी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखने की कोशिश करेगी। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने मिलकर भाजपा के सामने चुनौती पेश की थी। अब रालोद के एनडीए में शामिल होने से विपक्षी राजनीति का समीकरण बदल गया है। ऐसे में समाजवादी पार्टी को अपने संगठन और स्थानीय नेतृत्व के सहारे नए सामाजिक समीकरण तैयार करने पड़ सकते हैं।
भाजपा के लिए वर्ष 2027 का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। वर्ष 2017 और 2022 में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी थी। अब पार्टी के सामने पिछले चुनाव में कमजोर हुए क्षेत्रों में अपना प्रदर्शन सुधारने की चुनौती है।
गाजियाबाद की पदयात्रा के माध्यम से भाजपा ने चुनावी तैयारियों के साथ संगठनात्मक सक्रियता का भी संदेश देने का प्रयास किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कार्यकर्ताओं की भागीदारी, रालोद के साथ तालमेल और किसानों से संवाद को आगामी महीनों में और महत्व मिल सकता है।
हालांकि, गठबंधन का चुनावी लाभ किस हद तक भाजपा को मिलेगा, इसका आकलन अभी करना जल्दबाजी होगी। स्थानीय उम्मीदवारों की लोकप्रियता, जातीय समीकरण, किसानों की समस्याएं और विपक्ष की रणनीति चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 126 विधानसभा सीटें भाजपा की 2027 की चुनावी रणनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। पार्टी 2022 में हुए नुकसान की भरपाई के साथ रालोद के सहयोग से अपने समर्थन आधार का विस्तार करना चाहती है। अब देखना होगा कि जाट-किसान समीकरण और गठबंधन की ताकत भाजपा को अगले विधानसभा चुनाव में कितना राजनीतिक लाभ दिला पाती है।





