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भारतीय नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण की होगी एकरूप निगरानी, वैज्ञानिकों ने तैयार किया नया प्रोटोकाल

वाराणसी। भारतीय नदियों में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी और उसके प्रभाव का आकलन अब वैज्ञानिक और एकरूप तरीके से किया जा सकेगा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के रसायन विज्ञान विभाग के डा. कृपा राम समेत देशभर के वैज्ञानिकों ने नदियों में मैक्रोप्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी के लिए एक विस्तृत प्रोटोकाल तैयार किया है। यह प्रोटोकाल राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के तहत विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य नदियों में मौजूद प्लास्टिक प्रदूषण के स्रोतों, हॉटस्पॉट और नदी के प्रवाह के साथ प्लास्टिक के फैलाव के रास्तों की पहचान करना है।
प्लास्टिक प्रदूषण आज नदियों के लिए बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में शामिल हो गया है। नदियों में पहुंचने वाला प्लास्टिक केवल सतह पर दिखाई देने वाले कचरे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समय के साथ टूटकर छोटे-छोटे कणों में बदल जाता है। इनमें मैक्रोप्लास्टिक के साथ माइक्रोप्लास्टिक भी शामिल होता है। छोटे आकार के इन कणों का पता लगाना और उनकी मात्रा का आकलन करना सामान्य आंख से संभव नहीं होता। ऐसे में वैज्ञानिक पद्धति से नमूना लेने, जांच करने और आंकड़े तैयार करने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
नए प्रोटोकाल का उद्देश्य इसी आवश्यकता को पूरा करना है। इसके तहत अलग-अलग नदियों और नदी क्षेत्रों में प्लास्टिक प्रदूषण की जांच एक समान वैज्ञानिक पद्धति से की जा सकेगी। इससे विभिन्न नदियों से प्राप्त आंकड़ों की आपस में तुलना करना आसान होगा। वैज्ञानिक और संबंधित एजेंसियां यह समझ सकेंगी कि किस नदी या नदी क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण की मात्रा कितनी है और समय के साथ इसमें क्या बदलाव हो रहा है।
प्रोटोकाल में प्लास्टिक प्रदूषण के अलग-अलग रूपों की पहचान और उनका वर्गीकरण करने पर भी जोर दिया गया है। मैक्रोप्लास्टिक में अपेक्षाकृत बड़े आकार के प्लास्टिक कचरे को शामिल किया जाता है, जैसे बोतल, पैकेजिंग सामग्री, प्लास्टिक के कंटेनर और अन्य ठोस प्लास्टिक वस्तुएं। वहीं माइक्रोप्लास्टिक बहुत छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार बेहद कम हो सकता है और जिन्हें पहचानने के लिए प्रयोगशाला आधारित तकनीकों की आवश्यकता पड़ती है।
वैज्ञानिकों की ओर से तैयार प्रक्रिया में नदी के पानी, तलछट और अन्य संबंधित हिस्सों से नमूने लेने की वैज्ञानिक व्यवस्था पर भी ध्यान दिया गया है। नमूनों के संग्रहण, संरक्षण, परिवहन और प्रयोगशाला में विश्लेषण के लिए एक मानकीकृत तरीका अपनाने से परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ सकती है। इससे अलग-अलग संस्थानों द्वारा किए जाने वाले अध्ययनों के बीच अंतर कम करने में मदद मिलेगी।
इस प्रोटोकाल का एक अहम उद्देश्य प्लास्टिक प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करना भी है। नदी में प्लास्टिक कहां से आ रहा है, किन क्षेत्रों से ज्यादा मात्रा में पहुंच रहा है और किस तरह के मानव गतिविधि वाले स्थान इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं, इसका पता लगाने में मानकीकृत निगरानी मददगार हो सकती है। इसके आधार पर प्रदूषण रोकने के लिए लक्षित उपाय तैयार किए जा सकते हैं।
इसके अलावा प्रोटोकाल के माध्यम से नदी में प्लास्टिक हॉटस्पॉट चिन्हित किए जा सकेंगे। हॉटस्पॉट उन स्थानों को कहा जा सकता है जहां किसी वजह से प्लास्टिक कचरे का जमाव सामान्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक हो। ऐसे स्थानों की पहचान होने के बाद वहां सफाई, निगरानी और कचरा प्रबंधन के विशेष उपाय किए जा सकते हैं।
नदी का बहाव भी प्लास्टिक प्रदूषण के फैलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नदी में प्रवेश करने के बाद प्लास्टिक एक स्थान पर स्थिर नहीं रहता। पानी के साथ बहते हुए यह दूसरे क्षेत्रों तक पहुंच सकता है और कुछ हिस्सा नदी की तलछट में भी जमा हो सकता है। ऐसे में नए प्रोटोकाल के जरिए प्लास्टिक के बहाव के रास्तों को समझने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत तैयार यह प्रोटोकाल केवल गंगा नदी तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसके जरिए देश की विभिन्न नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी के लिए एक व्यापक आधार तैयार किया जा सकता है। इससे नदी प्रदूषण की समस्या को अलग-अलग मानकों से देखने के बजाय एक समान वैज्ञानिक ढांचे में समझने का अवसर मिलेगा।
बीएचयू के वैज्ञानिकों की भागीदारी इस पहल को विशेष महत्व देती है। डा. कृपा राम और उनके साथ जुड़े वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान और पर्यावरणीय विश्लेषण से संबंधित विशेषज्ञता का इस्तेमाल करते हुए निगरानी व्यवस्था तैयार करने में योगदान दिया है। विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों और विशेषज्ञों की सहभागिता से तैयार प्रोटोकाल का उद्देश्य क्षेत्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय और उपयोगी बनाना है।
माइक्रोप्लास्टिक को लेकर चिंता इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि इसके सूक्ष्म कण जल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बन सकते हैं। ये कण जलीय जीवों तक पहुंच सकते हैं और खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करने की संभावना भी रहती है। हालांकि इसके व्यापक स्वास्थ्य प्रभावों को समझने के लिए लगातार वैज्ञानिक शोध जारी हैं, लेकिन पर्यावरणीय स्तर पर माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी को महत्वपूर्ण चिंता माना जा रहा है।
नए प्रोटोकाल से लंबे समय में नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण के रुझानों का अध्ययन करने में भी मदद मिल सकती है। यदि किसी नदी के अलग-अलग हिस्सों से नियमित अंतराल पर समान तरीके से नमूने लिए जाएं तो यह पता लगाया जा सकता है कि प्रदूषण बढ़ रहा है, घट रहा है या किसी विशेष क्षेत्र में स्थिर है। ऐसी जानकारी नीति निर्माण और नदी संरक्षण योजनाओं के लिए उपयोगी हो सकती है।
प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए सिर्फ नदी की सफाई करना पर्याप्त नहीं है। प्रदूषण के स्रोत तक पहुंचना और वहां से प्लास्टिक के नदी में प्रवेश को रोकना भी जरूरी है। यही वजह है कि स्रोत की पहचान और हॉटस्पॉट का निर्धारण नए प्रोटोकाल के महत्वपूर्ण हिस्सों में माना जा रहा है। इससे नगर निकायों, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों और नदी संरक्षण से जुड़े विभागों को अपनी कार्रवाई का क्षेत्र तय करने में सहायता मिल सकती है।
एकरूप वैज्ञानिक निगरानी का एक बड़ा लाभ यह होगा कि भविष्य में तैयार किए गए आंकड़े अलग-अलग राज्यों, नदियों और क्षेत्रों के बीच तुलनात्मक अध्ययन के लिए इस्तेमाल किए जा सकेंगे। इससे राष्ट्रीय स्तर पर प्लास्टिक प्रदूषण की वास्तविक स्थिति की बेहतर तस्वीर सामने आ सकती है।
नदी के किनारे बसे शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और आबादी वाले स्थानों में प्लास्टिक कचरे के निस्तारण की व्यवस्था भी इस निगरानी का महत्वपूर्ण पहलू बनेगी। यदि किसी क्षेत्र में नदी तक पहुंचने वाले प्लास्टिक की मात्रा अधिक मिलती है तो वहां कचरा प्रबंधन, सीवेज और ठोस अपशिष्ट व्यवस्था की समीक्षा की जा सकती है।
वैज्ञानिकों की यह पहल नदी संरक्षण के लिए डेटा आधारित दृष्टिकोण को मजबूत कर सकती है। अब तक अलग-अलग स्थानों पर प्लास्टिक प्रदूषण से संबंधित अध्ययन हुए हैं, लेकिन एक समान प्रोटोकाल के अभाव में उनके आंकड़ों की तुलना करना हमेशा आसान नहीं होता था। नई व्यवस्था इस कमी को दूर करने की दिशा में कदम है।
देश में नदियों को साफ और प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कई स्तर पर अभियान चलाए जा रहे हैं। इसके बावजूद प्लास्टिक कचरा लगातार चुनौती बना हुआ है। खासकर एकल उपयोग वाले प्लास्टिक, पैकेजिंग सामग्री और शहरी कचरे के नदी तक पहुंचने से समस्या बढ़ती है। ऐसे में प्रदूषण के स्रोत और स्वरूप की वैज्ञानिक पहचान रोकथाम की रणनीति बनाने में महत्वपूर्ण होगी।
नए प्रोटोकाल के लागू होने के बाद नदी प्रदूषण से संबंधित निगरानी और शोध कार्यों को एक साझा वैज्ञानिक आधार मिल सकता है। इससे सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और पर्यावरण से जुड़े संगठनों के बीच डेटा साझा करने और संयुक्त कार्रवाई की संभावना भी मजबूत होगी।
कुल मिलाकर बीएचयू समेत देशभर के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार यह प्रोटोकाल भारतीय नदियों में मैक्रो और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। प्लास्टिक के स्रोत, हॉटस्पॉट और बहाव के रास्तों की पहचान से भविष्य में प्रदूषण नियंत्रण के लिए अधिक लक्षित और वैज्ञानिक कदम उठाने में मदद मिल सकती है।





