- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- दो शिक्षिकाओं के...
दो शिक्षिकाओं के नवाचार को राज्य स्तर पर मिली पहचान, SCERT के उद्गम पोर्टल पर हुआ चयन

आजमगढ़। जिले के परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की पढ़ाई को रोचक और प्रभावी बनाने के लिए किए जा रहे नवाचारी प्रयासों को राज्य स्तर पर पहचान मिली है। जिले की दो सहायक अध्यापिकाओं के शैक्षणिक नवाचारों का चयन राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) के उद्गम पोर्टल पर किया गया है। चयनित शिक्षिकाओं में कंपोजिट विद्यालय देवारा तुर्कचारा, विकासखंड महाराजगंज की सहायक अध्यापिका डॉ. अर्चना सिंह और कंपोजिट विद्यालय जहानियापुर, विकासखंड मोहम्मदपुर की सहायक अध्यापिका भावना वर्मा शामिल हैं।
दोनों शिक्षिकाएं कक्षा में पारंपरिक शिक्षण पद्धति के साथ नए प्रयोग कर बच्चों को गतिविधियों के माध्यम से सीखने के लिए प्रेरित कर रही हैं। इनके प्रयासों का उद्देश्य विद्यार्थियों की रचनात्मक क्षमता बढ़ाने के साथ पढ़ाई को उनके दैनिक जीवन, संस्कृति और आसपास के परिवेश से जोड़ना है।
‘रंगों से संस्कृति तक’ को मिली पहचान
कंपोजिट विद्यालय देवारा तुर्कचारा की सहायक अध्यापिका डॉ. अर्चना सिंह के नवाचार का नाम ‘रंगों से संस्कृति तक’ है। इसके माध्यम से ग्रामीण परिवेश में पढ़ने वाले बच्चों को भारत की समृद्ध लोक एवं पारंपरिक चित्रकला से परिचित कराया जा रहा है।
नवाचार के तहत विद्यार्थियों को केवल चित्रकलाओं के बारे में जानकारी नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें स्वयं चित्र बनाने का अवसर भी मिलता है। बच्चों को अलग-अलग भारतीय कला शैलियों की विशेषताओं के बारे में समझाने के बाद व्यावहारिक गतिविधियां कराई जाती हैं। इससे विद्यार्थी किताबों से बाहर निकलकर कला को प्रत्यक्ष रूप से समझते हैं।
मधुबनी से गोंड कला तक सीख रहे बच्चे
‘रंगों से संस्कृति तक’ कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों को मधुबनी, मंडला, वारली, गोंड और कोहबर जैसी प्रसिद्ध भारतीय लोक एवं पारंपरिक चित्रकलाओं से परिचित कराया जा रहा है। प्रत्येक कला शैली की अपनी विशेष पहचान, रंगों का इस्तेमाल और चित्र बनाने की अलग पद्धति होती है।
विद्यार्थियों को इन कलाओं की बुनियादी जानकारी देने के बाद उन्हें स्वयं चित्र बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इससे बच्चों में रंगों की समझ विकसित होने के साथ उनकी कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता को भी बढ़ावा मिल रहा है।
ग्रामीण विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह गतिविधि विशेष रूप से उपयोगी मानी जा रही है, क्योंकि इसके माध्यम से उन्हें देश के अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक विरासत को जानने का अवसर मिलता है।
पढ़ाई के साथ संस्कृति से जुड़ाव
डॉ. अर्चना सिंह के इस नवाचार का उद्देश्य कला को केवल एक गतिविधि तक सीमित नहीं रखना है। इसके माध्यम से बच्चों को भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं और अलग-अलग क्षेत्रों की कला से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
मधुबनी चित्रकला हो या वारली कला, विद्यार्थियों को इनके स्वरूप और विशेषताओं को समझने का अवसर मिलता है। इसी तरह गोंड और कोहबर जैसी कलाओं के जरिए बच्चे पारंपरिक अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों से परिचित होते हैं।
जब बच्चे स्वयं चित्र तैयार करते हैं तो उनके लिए सीखने की प्रक्रिया अधिक रोचक हो जाती है। इसके साथ ही उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है। अपनी बनाई कलाकृति को कक्षा में प्रदर्शित करने का अवसर मिलने से बच्चों में आगे और बेहतर काम करने की उत्सुकता पैदा होती है।
भावना वर्मा के प्रयास का भी चयन
कंपोजिट विद्यालय जहानियापुर, विकासखंड मोहम्मदपुर की सहायक अध्यापिका भावना वर्मा के शैक्षणिक नवाचार को भी SCERT के उद्गम पोर्टल पर स्थान मिला है। उनके कक्षा आधारित नवाचारी प्रयास को राज्य स्तर पर चयनित किए जाने से विद्यालय के साथ जिले के शिक्षा विभाग में भी खुशी का माहौल है।
शिक्षण में नवाचार का उद्देश्य बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तक आधारित जानकारी देना नहीं, बल्कि उनमें विषय को समझने, प्रश्न पूछने, गतिविधियों में हिस्सा लेने और स्वयं सीखने की क्षमता विकसित करना है।
दो अलग-अलग विद्यालयों की शिक्षिकाओं के प्रयासों को राज्य स्तर पर स्थान मिलने से जिले के अन्य शिक्षकों को भी कक्षा में नए प्रयोग करने की प्रेरणा मिलने की उम्मीद है।
क्या है SCERT का उद्गम पोर्टल?
SCERT के उद्गम पोर्टल के माध्यम से शिक्षकों द्वारा विद्यालयों और कक्षाओं में किए जा रहे उपयोगी शैक्षणिक नवाचारों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है। अलग-अलग जिलों के शिक्षक अपने नवाचार और बेहतर शिक्षण पद्धतियों को साझा कर सकते हैं, जिससे सफल प्रयोगों की जानकारी दूसरे विद्यालयों और शिक्षकों तक भी पहुंच सके।
ऐसे प्लेटफॉर्म का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर किए जा रहे अच्छे प्रयोगों को पहचान देना और उन्हें व्यापक स्तर पर साझा करना है। किसी शिक्षक का नवाचार दूसरे विद्यालय की परिस्थितियों के अनुकूल होने पर वहां भी उपयोग किया जा सकता है।
इससे शिक्षक एक-दूसरे के अनुभवों से सीख सकते हैं और विद्यार्थियों के लिए कक्षा शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
गतिविधि आधारित शिक्षा पर जोर
स्कूलों में गतिविधि आधारित शिक्षा पर लगातार जोर दिया जा रहा है। विशेष रूप से प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर बच्चों को केवल किताब पढ़ाकर विषय समझाने के बजाय खेल, कला, मॉडल, स्थानीय संसाधनों और व्यावहारिक गतिविधियों की मदद से पढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
इस तरह की पद्धति में बच्चे केवल सुनने वाले विद्यार्थी नहीं रहते, बल्कि सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते हैं। कला से संबंधित गतिविधियां बच्चों के मानसिक और रचनात्मक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
डॉ. अर्चना सिंह का ‘रंगों से संस्कृति तक’ नवाचार इसी अवधारणा को भारतीय पारंपरिक कलाओं से जोड़ता है। इसमें शिक्षा के साथ संस्कृति और रचनात्मकता को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया है।
जिले के लिए उपलब्धि
दोनों शिक्षिकाओं के नवाचारों का SCERT के उद्गम पोर्टल पर चयन होना जिले के सरकारी विद्यालयों में किए जा रहे प्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे यह संदेश भी मिलता है कि सीमित संसाधनों के बीच शिक्षक अपनी रचनात्मकता के जरिए कक्षा के माहौल को अधिक आकर्षक और उपयोगी बना सकते हैं।
अब इन नवाचारों को राज्य स्तर पर दूसरे शिक्षकों तक पहुंचने का अवसर मिलेगा। इससे अन्य विद्यालय भी इन प्रयोगों से प्रेरणा लेकर अपने विद्यार्थियों की जरूरत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नई गतिविधियां विकसित कर सकते हैं। वहीं दोनों शिक्षिकाओं के प्रयासों ने यह दिखाया है कि नवाचार के जरिए बच्चों को पढ़ाई के साथ अपनी संस्कृति और रचनात्मकता से भी जोड़ा जा सकता है।





