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आगरा : उत्तर प्रदेश के आगरा से जुड़े एक वैवाहिक विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न की एफआईआर रद्द कर दी है। शादी के लगभग ढाई महीने बाद पत्नी अलग रहने लगी थी। पति ने तलाक की अर्जी दाखिल की और इसके बाद दहेज उत्पीड़न, मारपीट तथा गला दबाकर हत्या की कोशिश जैसे आरोपों में मुकदमा दर्ज हुआ। अदालत ने मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए कहा कि हर असफल या तनावपूर्ण शादी को नियमित रूप से आपराधिक मुकदमे में बदलना उचित नहीं है।
न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने गौरव जैन तथा उनके परिवार के सदस्यों की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। मामला आगरा के हरीपर्वत थाने में दर्ज एफआईआर से संबंधित था। अदालत ने आठ अक्टूबर के निर्णय में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ एफआईआर और उससे उत्पन्न कार्यवाही रद्द की। साथ ही स्पष्ट किया कि यह आदेश पति-पत्नी के बीच लंबित वैवाहिक मामले के गुण-दोष पर कोई निर्णय नहीं है।
मामले में सामने आए घटनाक्रम के अनुसार, विवाह 12 नवंबर 2024 को हुआ था। पत्नी तीन फरवरी 2025 को ससुराल से अलग हो गई। दोनों लगभग ढाई महीने साथ रहे थे। इसके बाद पति ने तीन मई 2025 को विवाह विच्छेद की याचिका दाखिल की। दहेज उत्पीड़न और अन्य आरोपों से जुड़ी एफआईआर 30 जून 2025 को दर्ज हुई। पति और परिवार ने इसी घटनाक्रम के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी। उनका दावा था कि तलाक की कार्यवाही शुरू होने के बाद मुकदमा दर्ज कराया गया।
शिकायत में ससुराल पक्ष पर अतिरिक्त रकम मांगने, प्रताड़ित करने, भोजन नहीं देने, धमकाने और स्त्रीधन वापस नहीं करने के आरोप लगाए गए थे। मारपीट और गला दबाकर जान लेने की कोशिश का आरोप भी शामिल था। पति तथा उसके परिवार ने इन आरोपों का विरोध किया। उनकी ओर से कहा गया कि शिकायत में परिवार के सदस्यों को सामूहिक रूप से आरोपित किया गया है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका पर्याप्त स्पष्टता से नहीं बताई गई।
दूसरी ओर, शिकायतकर्ता पक्ष ने अदालत में एफआईआर रद्द करने का विरोध किया। उसका कहना था कि आरोप जांच योग्य हैं और शिकायत करने में देरी का कारण वैवाहिक संबंध बचाए रखने की उम्मीद थी। इस पक्ष ने उपचार से संबंधित दस्तावेजों तथा अन्य सामग्री का भी हवाला दिया। उसने दलील दी कि आरोपों की सत्यता और दस्तावेजों का मूल्यांकन जांच के दौरान होना चाहिए। अदालत के सामने इस प्रकार दोनों पक्षों की अलग-अलग दलीलें रखी गई थीं।
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपों में आवश्यक विशिष्ट विवरण का अभाव था। अदालत ने रकम का उल्लेख होने और किसी व्यक्ति के आचरण का स्पष्ट विवरण होने के बीच अंतर बताया। उसके अनुसार, यह स्पष्ट होना आवश्यक था कि संबंधित मांग किसने की, किस अवसर पर की और कथित उत्पीड़न का उससे क्या संबंध था। परिवार के कई लोगों के खिलाफ एक साथ सामान्य आरोप लगाने से प्रत्येक आरोपी की भूमिका अपने आप स्थापित नहीं हो जाती।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि साथ रहने की अवधि के दौरान कथित घटनाओं से संबंधित घरेलू हिंसा की शिकायत, पुलिस कंट्रोल रूम को कॉल या तत्काल पुलिस हस्तक्षेप का विवरण रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया था। हालांकि, कोर्ट ने केवल ऐसी शिकायत के अभाव को एफआईआर रद्द करने का पर्याप्त कारण नहीं माना। उसने कम अवधि तक साथ रहने, जल्दी अलग होने, पहले तलाक की याचिका दाखिल होने और आरोपों में पर्याप्त विवरण नहीं होने जैसी परिस्थितियों को संयुक्त रूप से देखा।
वैवाहिक विवादों पर टिप्पणी करते हुए खंडपीठ ने कहा कि रिश्ते में असहमति या विवाह का टूटना अपने आप आपराधिक कृत्य नहीं बन जाता। आपराधिक कार्यवाही को वैवाहिक अदालत में होने वाले विवाद के निपटारे का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने चेताया कि हर टूटे रिश्ते को आपराधिक कानून की प्रक्रिया में डालने से विवाह संस्था प्रभावित हो सकती है। व्यापक आरोप विवाद को और गहरा कर सकते हैं तथा समझौते या सौहार्दपूर्ण अलगाव की बची हुई संभावना भी समाप्त कर सकते हैं।
इसके साथ ही अदालत ने महिलाओं को दहेज से जुड़ी हिंसा और घरेलू क्रूरता से सुरक्षा देने की जरूरत को भी स्वीकार किया। उसने कहा कि यह वैधानिक और संवैधानिक दायित्व है। लेकिन कानून के संभावित दुरुपयोग को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। फैसले में वास्तविक आपराधिक उत्पीड़न और अस्पष्ट, सामूहिक आरोपों के बीच अंतर करने पर जोर दिया गया। अदालत ने कथित घटनाओं को असंभव घोषित करने के बजाय इस एफआईआर में उपलब्ध विवरण की पर्याप्तता पर निर्णय दिया।
एफआईआर रद्द होने के बावजूद दोनों पक्ष सक्षम वैवाहिक अदालत में अपने अधिकारों और दावों के लिए कार्यवाही जारी रख सकते हैं। शिकायतकर्ता के लिए किसी अलग कारण से उपलब्ध स्वतंत्र कानूनी उपाय अपनाने का रास्ता भी संबंधित कानूनी शर्तों के अधीन खुला है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि उसकी टिप्पणियां इस एफआईआर से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही तक सीमित हैं। इन्हें पति-पत्नी के बीच अन्य लंबित मामलों के अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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