उत्तर प्रदेश

राम मंदिर में बदली आरती की परंपरा, अब 51 की जगह नौ बत्तियों से होगी आरती

Kavita2
2 Oct 2026 9:20 AM IST
राम मंदिर में बदली आरती की परंपरा, अब 51 की जगह नौ बत्तियों से होगी आरती
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अयोध्या। राम मंदिर में गर्भगृह के बाहर शुरू की गई आरती की नई परंपरा में बदलाव किया गया है। पहले यहां 51-51 बत्तियों की चार आरतियां की जा रही थीं, लेकिन अब इन्हें नौ-नौ बत्तियों की आरती में बदल दिया गया है। यह फैसला मंदिर परिसर में लगातार बढ़ते धुएं और उससे पत्थरों पर पड़ रही कालिख की परतों को देखते हुए लिया गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर की स्वच्छता और पत्थरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह परिवर्तन किया है।

जानकारी के अनुसार गर्भगृह के बाहर चार स्थानों पर 51-51 बत्तियों की आरती की व्यवस्था शुरू की गई थी। बड़ी संख्या में बत्तियों के एक साथ जलने से मंदिर के भीतर काफी मात्रा में धुआं उठ रहा था। लगातार आरती होने के कारण मंदिर में लगे पत्थरों पर कालिख की परत दिखाई देने लगी थी। इसे देखते हुए ट्रस्ट ने आरती की बत्तियों की संख्या कम करने का निर्णय लिया।

अब चारों आरतियों में 51 के स्थान पर केवल नौ-नौ बत्तियों का उपयोग किया जाएगा। इससे धार्मिक परंपरा भी जारी रहेगी और मंदिर परिसर में धुएं की मात्रा भी कम होगी। ट्रस्ट का मानना है कि इससे मंदिर की दीवारों, स्तंभों और अन्य पत्थर संरचनाओं को धुएं और कालिख से होने वाले प्रभाव से बचाने में मदद मिलेगी।

गर्भगृह के बाहर इस विशेष आरती की शुरुआत श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पर्व से की गई थी। इस व्यवस्था के तहत मां सरयू की आरती करने वाले चार अतिरिक्त पुजारियों को मंदिर में नियुक्त किया गया है। इन पुजारियों को गर्भगृह के बाहर होने वाली आरती की जिम्मेदारी दी गई है।

नई आरती व्यवस्था श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के नए महासचिव गोविंद देव गिरि के निर्देश पर शुरू की गई थी। योजना के मुताबिक इस आरती के लिए कुल छह पुजारियों को तैनात किया जाना था। हालांकि दो अतिरिक्त पुजारियों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो पाने के कारण शुरुआत चार पुजारियों के साथ ही की गई।

चार पुजारियों की मौजूदगी में गर्भगृह के बाहर नियमित रूप से आरती शुरू कर दी गई थी। इसमें पहले 51-51 बत्तियों वाले बड़े दीपों का इस्तेमाल किया जा रहा था। इन दीपों से निकलने वाले धुएं का असर धीरे-धीरे मंदिर की पत्थर संरचनाओं पर दिखाई देने लगा। इसके बाद व्यवस्था की समीक्षा की गई और बत्तियों की संख्या घटाने का फैसला किया गया।

राम मंदिर के निर्माण में बड़ी मात्रा में विशेष पत्थरों का उपयोग किया गया है। ऐसे में मंदिर प्रशासन और ट्रस्ट के सामने धार्मिक अनुष्ठानों को जारी रखते हुए संरचना की सुरक्षा और स्वच्छता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। दीपक और घी से होने वाली आरती धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन बड़ी संख्या में दीप जलने से निकलने वाला धुआं बंद या सीमित परिसर में पत्थरों पर असर डाल सकता है।

इसी कारण आरती को बंद करने के बजाय उसका स्वरूप बदला गया है। नौ बत्तियों की आरती से पूजा की परंपरा भी बनी रहेगी और धुएं की मात्रा भी काफी कम हो जाएगी। ट्रस्ट का यह फैसला धार्मिक परंपरा और मंदिर संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।

मंदिर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में गर्भगृह और उसके आसपास स्वच्छता बनाए रखना भी प्राथमिकता में शामिल है। आरती के दौरान निकलने वाले धुएं से केवल पत्थरों पर ही कालिख नहीं जमती, बल्कि समय के साथ सफाई और रखरखाव की चुनौती भी बढ़ सकती है। इसे ध्यान में रखते हुए आरती के प्रारूप में बदलाव किया गया है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से शुरू हुई इस व्यवस्था को लेकर शुरुआत में श्रद्धालुओं में भी उत्साह देखने को मिला था। गर्भगृह के बाहर एक साथ चार आरतियों का दृश्य विशेष आकर्षण का केंद्र बना था। अब आरतियां पहले की तरह चार स्थानों पर ही होंगी, लेकिन प्रत्येक आरती में बत्तियों की संख्या 51 से घटाकर नौ कर दी गई है।

बताया गया है कि आरती की जिम्मेदारी संभाल रहे चार पुजारी नियमित रूप से इस धार्मिक अनुष्ठान को संपन्न करा रहे हैं। भविष्य में दो और अतिरिक्त पुजारियों की उपलब्धता सुनिश्चित होने पर पुजारियों की संख्या बढ़ाई जा सकती है। फिलहाल चार पुजारियों के माध्यम से व्यवस्था संचालित की जा रही है।

राम मंदिर में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्थाओं को समय-समय पर जरूरत के अनुसार बदला जा रहा है। ट्रस्ट की कोशिश है कि मंदिर की धार्मिक गरिमा बनाए रखने के साथ इसकी भव्यता और संरचना को भी सुरक्षित रखा जाए।

अब गर्भगृह के बाहर होने वाली आरती नौ-नौ बत्तियों से संपन्न होगी। इससे मंदिर में धुएं और कालिख की समस्या कम होने की उम्मीद है। साथ ही श्रद्धालुओं के लिए आरती की परंपरा भी पहले की तरह जारी रहेगी।

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