उत्तर प्रदेश

राया के सोनहलवा का स्वाद है बेमिसाल, 56 साल पुरानी मिठास आज भी बरकरार

Kavita2
24 Oct 2026 2:48 PM IST
राया के सोनहलवा का स्वाद है बेमिसाल, 56 साल पुरानी मिठास आज भी बरकरार
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मथुरा। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले का राया कस्बा अपनी अनोखी मिठाई सोनहलवा के लिए खास पहचान रखता है। यहां की गलियों से गुजरते समय देशी घी की खुशबू लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। कस्बे की पुरानी मिठाई की दुकान विजय मिष्ठान भंडार में आज भी पारंपरिक तरीके से सोनहलवा तैयार किया जाता है। इस मिठाई की खासियत इसका सुनहरा रंग, महीन रेशेदार बनावट और मुंह में घुल जाने वाला स्वाद है। दुकान के संचालक आनंद शर्मा अपने परिवार की चौथी पीढ़ी के रूप में इस पुश्तैनी कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके मुताबिक, सोनहलवा बनाने की शुरुआत उनके दादा राधेलाल हलवाई ने वर्ष 1970 के आसपास की थी।

करीब 56 साल पहले शुरू हुआ यह सफर आज भी जारी है। आनंद शर्मा बताते हैं कि उनके दादा ने लंबे अभ्यास और अपनी मेहनत से ऐसी मिठाई तैयार की, जो धीरे-धीरे राया की पहचान बन गई। समय बदला, ग्राहकों की पसंद बदली और बाजार में तरह-तरह की मिठाइयां आईं, लेकिन परिवार ने सोनहलवा बनाने की परंपरा को बनाए रखा है।

देशी घी की खुशबू से महकती है दुकान

राया कस्बे में स्थित विजय मिष्ठान भंडार की खासियत यहां तैयार होने वाला पारंपरिक सोनहलवा है।

दुकान के आसपास देशी घी की खुशबू और सुनहरे रंग की मिठाई लोगों का ध्यान खींचती है। सोनहलवा देखने में जितना आकर्षक लगता है, उसकी बनावट भी उतनी ही अलग है।

मिठाई में दिखाई देने वाले महीन सुनहरे रेशे इसकी पहचान हैं। यही वजह है कि इसे बनाने के लिए साधारण मिठाई की तुलना में अधिक अभ्यास और कारीगरी की जरूरत होती है।

आनंद शर्मा के अनुसार, उनके परिवार ने इस स्वाद को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है।

1970 में राधेलाल हलवाई ने की थी शुरुआत

आनंद शर्मा बताते हैं कि उनके दादा राधेलाल हलवाई ने लगभग 1970 में राया में सोनहलवा तैयार करना शुरू किया था।

उस समय मिठाई बनाने का काम मुख्य रूप से पारंपरिक हुनर और हाथों के अभ्यास पर निर्भर था।

राधेलाल ने अपने अनुभव और लगातार प्रयोग से सोनहलवा की विशेष बनावट तैयार की।

धीरे-धीरे लोगों को इसका स्वाद पसंद आने लगा और दुकान की पहचान बढ़ती गई।

आनंद के मुताबिक, उनके दादा का उद्देश्य केवल मिठाई बेचना नहीं था, बल्कि लोगों को ऐसा स्वाद देना था जिसे वे लंबे समय तक याद रखें।

आज भी परिवार उसी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।

चार पीढ़ियों से संभाली जा रही विरासत

विजय मिष्ठान भंडार की कहानी केवल एक दुकान की नहीं, बल्कि एक परिवार की पारंपरिक कारीगरी की कहानी है।

आनंद शर्मा परिवार की चौथी पीढ़ी के रूप में इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।

उनका कहना है कि वर्षों के अनुभव से प्राप्त हुनर को आगे बढ़ाना बड़ी जिम्मेदारी है।

पारंपरिक मिठाइयों का स्वाद बनाए रखने के लिए सामग्री के साथ बनाने की प्रक्रिया पर भी विशेष ध्यान देना पड़ता है।

किसी मिठाई की पहचान केवल उसकी रेसिपी से नहीं होती, बल्कि उसे तैयार करने वाले कारीगर की दक्षता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

आनंद शर्मा इसी कारीगरी को अपने पुश्तैनी व्यवसाय की सबसे बड़ी पूंजी मानते हैं।

सोनहलवा की बनावट बनाती है खास

सोनहलवा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी महीन, रेशेदार बनावट है।

इस मिठाई को तैयार करते समय सामग्री के मिश्रण, तापमान और उसकी संरचना का विशेष ध्यान रखना होता है।

हलवे को सही रूप देने के लिए अनुभव की जरूरत होती है। मिश्रण में थोड़ा भी असंतुलन आने से उसकी बनावट प्रभावित हो सकती है।

मिठाई के सुनहरे रेशे इसे दूसरी सामान्य मिठाइयों से अलग पहचान देते हैं।

यही कारण है कि सोनहलवा को केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि पारंपरिक हलवाई कारीगरी के उदाहरण के रूप में भी देखा जा सकता है।

हालांकि, विजय मिष्ठान भंडार में इस्तेमाल होने वाली सटीक सामग्री, मात्रा और विधि का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।

राया की स्थानीय पहचान से जुड़ा स्वाद

मथुरा का नाम आते ही भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि, मंदिरों और ब्रज की सांस्कृतिक परंपराओं का ध्यान आता है।

ब्रज क्षेत्र अपनी धार्मिक विरासत के साथ-साथ पारंपरिक खानपान के लिए भी जाना जाता है।

मथुरा के पेड़े की तरह राया के सोनहलवा की भी अपनी स्थानीय पहचान है।

किसी कस्बे की खास मिठाई वहां की संस्कृति और लोगों की यादों से जुड़ जाती है।

त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और परिचितों से मिलने के अवसर पर स्थानीय मिठाइयों का विशेष महत्व रहता है।

सोनहलवा भी राया की ऐसी ही पारंपरिक मिठास का प्रतिनिधित्व करता है।

आधुनिक मिठाइयों के बीच पारंपरिक स्वाद

आज के समय में मिठाई का कारोबार तेजी से बदल रहा है। बाजार में नई पैकेजिंग, आधुनिक मशीनें और कई प्रकार की मिठाइयां उपलब्ध हैं।

इसके बावजूद पारंपरिक तरीके से तैयार मिठाइयों की अपनी अलग पहचान बनी हुई है।

पुरानी मिठाई की दुकानों की सबसे बड़ी ताकत उनका वर्षों से स्थापित स्वाद और ग्राहकों का विश्वास होता है।

विजय मिष्ठान भंडार का सोनहलवा भी इसी परंपरा का हिस्सा है।

आनंद शर्मा का प्रयास है कि परिवार के बुजुर्गों से मिली कारीगरी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे।

स्थानीय कारोबार के लिए भी महत्वपूर्ण

किसी क्षेत्र की खास मिठाई वहां के छोटे कारोबार और पारंपरिक कारीगरों को पहचान दिलाने में मदद करती है।

ऐसी दुकानों से केवल मिठाई बेचने वाले परिवार ही नहीं, बल्कि सामग्री उपलब्ध कराने वाले छोटे व्यापारी भी जुड़े होते हैं।

देशी घी, दूध से बने उत्पाद और अन्य खाद्य सामग्री की मांग स्थानीय व्यापार को सहारा दे सकती है।

इसके अलावा पारंपरिक मिठाइयां किसी कस्बे को खानपान के पर्यटन मानचित्र पर भी पहचान दिला सकती हैं।

राया के सोनहलवा जैसे स्थानीय उत्पादों को बेहतर प्रचार और गुणवत्ता के माध्यम से व्यापक बाजार तक पहुंचाने की संभावनाएं भी मौजूद हैं।

बुजुर्गों की सीख को आगे बढ़ा रहे आनंद शर्मा

आनंद शर्मा के लिए सोनहलवा बनाना केवल आजीविका का माध्यम नहीं, बल्कि परिवार की पहचान से जुड़ा काम है।

उनके दादा राधेलाल हलवाई ने जिस हुनर की शुरुआत की थी, उसे आगे बढ़ाना वह अपनी जिम्मेदारी मानते हैं।

वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में परिवार का अनुभव और मेहनत शामिल है।

सोनहलवा का स्वाद उन लोगों के लिए भी खास हो सकता है, जिन्होंने कभी राया में इसे चखा हो और अब दूसरे शहरों में रहते हों।

ऐसी पारंपरिक मिठाइयां अक्सर अपने साथ किसी स्थान और उससे जुड़ी यादों का स्वाद भी लेकर चलती हैं।

56 साल बाद भी बरकरार है मिठास

राया के विजय मिष्ठान भंडार की कहानी बताती है कि पुराने हुनर और पारिवारिक परंपराओं की अपनी अलग अहमियत होती है।

लगभग 1970 में राधेलाल हलवाई के प्रयासों से शुरू हुआ सोनहलवा बनाने का सिलसिला आज आनंद शर्मा तक पहुंच चुका है।

करीब 56 वर्षों की इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण बात पारंपरिक स्वाद को बनाए रखने का प्रयास है।

आज भी सुनहरे रेशों वाला सोनहलवा राया की स्थानीय खानपान विरासत का हिस्सा बना हुआ है।

देशी घी की सुगंध, वर्षों पुरानी कारीगरी और परिवार की चार पीढ़ियों के जुड़ाव ने राया के सोनहलवा को मिठाई के साथ-साथ एक दिलचस्प विरासत की पहचान भी दी है।

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