उत्तर प्रदेश

बुंदेलखंड के गांवों में पीढ़ियों से कायम सेना में जाने की परंपरा

Ratna Netam
14 Aug 2026 6:43 PM IST
बुंदेलखंड के गांवों में पीढ़ियों से कायम सेना में जाने की परंपरा
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बांदा। बुंदेलखंड की वीरता और शौर्य की ऐतिहासिक परंपरा आज भी बांदा जिले के बेंदा और जौहरपुर गांवों में जीवंत दिखाई देती है। यमुना नदी के किनारे और फतेहपुर जिले की सीमा से सटे इन दोनों गांवों में सेना में भर्ती होना युवाओं का सबसे बड़ा सपना माना जाता है। बड़ी संख्या में यहां के युवा भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा बलों में सेवाएं दे रहे हैं। यही कारण है कि आसपास के लोग इन गांवों को सैनिक तैयार करने वाली नर्सरी भी कहते हैं।
बेंदा और जौहरपुर की आबादी करीब 15-15 हजार बताई जाती है। बेंदा ग्राम पंचायत के अंतर्गत 42 जबकि जौहरपुर में 28 मजरे हैं। इन मजरों में रहने वाले परिवारों का सेना से गहरा जुड़ाव है। ग्रामीणों के मुताबिक शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जिसका कोई सदस्य सेना में कार्यरत न हो या सेना भर्ती की तैयारी न कर रहा हो।
दोनों गांवों में दिन की शुरुआत सामान्य गांवों से कुछ अलग होती है। सूरज निकलने से पहले ही युवा सड़कों और खेल मैदानों की ओर निकल जाते हैं। कोई लंबी दौड़ का अभ्यास करता है तो कोई ऊंची कूद और लंबी कूद की तैयारी करता दिखाई देता है। इसके बाद पुशअप और अन्य शारीरिक अभ्यास किए जाते हैं। तैयारी कर रहे युवाओं का उद्देश्य सेना की भर्ती में शारीरिक दक्षता परीक्षा को सफलतापूर्वक पूरा करना होता है।
सेना भर्ती की तैयारी यहां केवल व्यक्तिगत प्रयास नहीं है। पहले से सेना में चयनित युवा छुट्टी पर गांव लौटने के बाद नए अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन करते हैं। वे शारीरिक अभ्यास के साथ लिखित परीक्षा और अनुशासन से संबंधित जानकारी भी देते हैं। गांव के बुजुर्ग युवाओं का उत्साह बढ़ाते हैं और उन्हें देश सेवा की परंपरा आगे ले जाने के लिए प्रेरित करते हैं।
हाल में बेंदा जौहरपुर और अमलीकौर क्षेत्र के करीब आधा दर्जन युवाओं का सेना में चयन हुआ है। चयनित युवाओं के घरों में खुशी और गर्व का माहौल है। उनकी सफलता से तैयारी कर रहे दूसरे युवाओं का भी आत्मविश्वास बढ़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि एक युवा के चयन के बाद आसपास के कई बच्चे सेना में जाने का संकल्प लेते हैं।
इन गांवों की नई पीढ़ी के लिए यहां के बलिदानी सैनिक सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच 1947-48 में हुए पहले युद्ध के दौरान बेंदा क्षेत्र के सैनिक केदार सिंह ने छह फरवरी 1948 को देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। उनकी वीरता की कहानी आज भी गांव के परिवारों में सुनाई जाती है।
वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जौहरपुर के सैनिक सूरज पाल सिंह ने भी देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया था। गांव के युवा केदार सिंह और सूरज पाल सिंह को अपना आदर्श मानते हैं। परिवारों में बच्चों को बचपन से ही इन बलिदानियों की गाथाएं सुनाई जाती हैं। इससे उनके मन में देश और सेना के प्रति सम्मान पैदा होता है।
ग्रामीणों का कहना है कि देश की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है। सेना में चयनित होने पर केवल एक परिवार नहीं बल्कि पूरा गांव खुशी मनाता है। जवान जब वर्दी पहनकर पहली बार गांव लौटता है तो बच्चे और युवा उसे गौरव से देखते हैं। कई परिवारों में एक पीढ़ी के सेवानिवृत्त होने के बाद दूसरी पीढ़ी सेना में जिम्मेदारी संभाल रही है।
बुंदेलखंड ऐतिहासिक रूप से वीरों और योद्धाओं की धरती रहा है। महाराजा छत्रसाल और आल्हा-ऊदल की वीरगाथाएं यहां की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी बांदा क्षेत्र ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बांदा के नवाब अली बहादुर द्वितीय ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का सहयोग किया था।
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