उत्तर प्रदेश

यूपी के 30 गांवों में बाघ और तेंदुए की दहशत, 25 हजार लोगों की जान पर मंडराया खतरा

Kavita2
27 Oct 2026 6:02 PM IST
यूपी के 30 गांवों में बाघ और तेंदुए की दहशत, 25 हजार लोगों की जान पर मंडराया खतरा
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सीतापुर । उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में जंगल से सटे गांवों में इन दिनों बाघ और तेंदुए की मौजूदगी से भय का माहौल है। मधवापुर जंगल के आसपास बसे करीब 30 गांवों और मजरों की 25 हजार से अधिक आबादी वन्यजीवों की गतिविधियों को लेकर चिंतित है। हालात ऐसे हैं कि ग्रामीण अपने बच्चों को घर से बाहर भेजने से पहले कई बार सोच रहे हैं। वहीं, किसान खेतों में काम करने जाने से कतरा रहे हैं। बाघ की पहले से मौजूदगी के बीच गोविंदपुर गांव में रविवार को तेंदुए की आमद की सूचना ने लोगों की चिंता और बढ़ा दी है।

गोविंदपुर की रहने वाली जगरानी अपने परिवार के बच्चों को लेकर बेहद चिंतित हैं। स्थानीय बोली में वह कहती हैं, "अरे सुरेश, देखव अमनवा नहीं देखाति...। बताइ देहन है कि लरिकन पर खास निगाह राखव, बाघ और तेंदुआ दोनों घूमि रहे हैं..." जगरानी की यह चिंता अकेले उनके परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के गांवों में रहने वाले अनेक अभिभावकों की भी यही स्थिति है।

10 किलोमीटर के दायरे में बाघ और तेंदुए की मौजूदगी से दहशत

मधवापुर जंगल के आसपास लगभग 10 किलोमीटर के क्षेत्र में जंगली जानवरों की गतिविधियों ने ग्रामीणों की दिनचर्या प्रभावित कर दी है। खासकर जंगल के किनारे बसे गांवों में रहने वाले परिवार ज्यादा सतर्क हो गए हैं।

ग्रामीणों के मुताबिक, बाघ की मौजूदगी से पहले ही लोग परेशान थे। अब तेंदुए के दिखाई देने की सूचना ने उनकी चिंता दोगुनी कर दी है। ग्रामीणों को डर है कि जंगल से निकलकर ये जानवर खेतों और आबादी वाले इलाकों में पहुंच सकते हैं।

कई परिवारों ने बच्चों को अकेले घर से बाहर नहीं जाने देने का फैसला किया है। खेतों और जंगल से होकर गुजरने वाले रास्तों पर भी लोग अतिरिक्त सावधानी बरत रहे हैं।

15 जुलाई को बाघ के हमले में किसान की हुई थी मौत

इस इलाके में वन्यजीवों को लेकर डर की बड़ी वजह 15 जुलाई 2026 की घटना है। उस दिन मधवापुर ग्राम पंचायत के रसुलवा गांव में बाघ के हमले में 52 वर्षीय किसान कमल किशोर की मौत हो गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, कमल किशोर गन्ने के खेत में घास काटने गए थे। उसी दौरान बाघ ने उन पर हमला कर दिया। घटना के बाद वन विभाग ने बाघ की तलाश शुरू की थी। पिंजरे और ट्रैप कैमरों के साथ निगरानी की व्यवस्था भी की गई थी।

इस घटना ने ग्रामीणों के मन में गहरा भय पैदा कर दिया। इसके बाद से खेतों में काम करने वाले लोगों की चिंता लगातार बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक जंगली जानवरों की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं होता, तब तक सामान्य दिनचर्या में लौटना मुश्किल है।

गोविंदपुर में तेंदुए की आमद ने बढ़ाई मुश्किल

बाघ की मौजूदगी से परेशान ग्रामीणों के लिए रविवार को गोविंदपुर गांव में तेंदुए के आने की सूचना नई चिंता लेकर आई। एक ही क्षेत्र में दो बड़े शिकारी वन्यजीवों की मौजूदगी से लोगों में असुरक्षा की भावना बढ़ गई है।

गोविंदपुर के अलावा आसपास के गांवों में भी लोग बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर सतर्क हैं। ग्रामीणों को आशंका है कि तेंदुआ भोजन की तलाश में खेतों या आबादी के नजदीक आ सकता है।

इससे पहले अक्टूबर के शुरुआती दिनों में भी सीतापुर के मिश्रिख वन रेंज में बाघिन के पगचिह्न मिलने और गाजीपुर गांव के आसपास तेंदुए की मौजूदगी की खबरें सामने आई थीं।

हालांकि, गोविंदपुर में रविवार की बताई जा रही नई घटना की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है।

बच्चों को स्कूल भेजने में डर रहे अभिभावक

बाघ और तेंदुए की मौजूदगी का सबसे ज्यादा असर स्कूली बच्चों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है। जंगल और खेतों के आसपास से होकर गुजरने वाले रास्तों पर बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभिभावक चिंतित हैं।

कई ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे पैदल स्कूल जाते हैं। ऐसे में रास्ते में वन्यजीवों के मिलने की आशंका परिवारों की परेशानी बढ़ा रही है।

गोविंदपुर की जगरानी जैसी महिलाओं की चिंता यह है कि बच्चे खेलते समय घर से दूर न निकल जाएं। ग्रामीण बच्चों को अकेले सुनसान रास्तों, खेतों और झाड़ियों के आसपास नहीं जाने की हिदायत दे रहे हैं।

ग्रामीणों की चिंता को देखते हुए स्कूल आने-जाने के रास्तों पर विशेष निगरानी और बच्चों को समूह में सुरक्षित आवाजाही की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है।

बाघ के डर से खेती-किसानी पर पड़ रहा असर

वन्यजीवों की मौजूदगी का असर खेती-किसानी पर भी दिखाई दे रहा है। खेतों में काम करने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या सुरक्षा की है।

किसानों को फसलों की देखरेख, सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों के लिए खेतों में जाना पड़ता है, लेकिन बाघ और तेंदुए के डर से वे अकेले जाने से बच रहे हैं।

जुलाई में भी रसुलवा और मधवापुर के आसपास बाघ की गतिविधियों के कारण धान की रोपाई प्रभावित होने की खबरें सामने आई थीं। उस दौरान कुछ मजदूरों ने खेतों में काम करने से इनकार कर दिया था।

ग्रामीणों के लिए खेती आजीविका का प्रमुख साधन है। ऐसे में लंबे समय तक खेतों तक सुरक्षित पहुंच न होने से कृषि कार्य प्रभावित होने और आर्थिक नुकसान की आशंका बनी रहती है।

वन विभाग के सामने सुरक्षा और निगरानी की चुनौती

मधवापुर जंगल के आसपास बाघ की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए वन विभाग पहले भी अभियान चला चुका है। जुलाई में रसुलवा के आसपास पिंजरे, ट्रैप कैमरे और कमांड सेंटर की व्यवस्था की गई थी। बाघ की लोकेशन का पता लगाने के लिए विशेषज्ञों और विभिन्न वन रेंजों की टीमें भी लगाई गई थीं।

अब ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए वन्यजीवों की मौजूदा लोकेशन की पुष्टि, संवेदनशील रास्तों की निगरानी और स्थानीय लोगों को समय पर सूचना देना महत्वपूर्ण है।

वन्यजीव विशेषज्ञों की सामान्य सलाह के अनुसार, बाघ या तेंदुआ दिखाई देने पर उसके पास नहीं जाना चाहिए। जानवर को घेरने, भगाने के लिए भीड़ जुटाने या उसके साथ फोटो लेने का प्रयास खतरनाक हो सकता है। ऐसी स्थिति में सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए वन विभाग को तत्काल जानकारी देनी चाहिए।

ग्रामीणों को सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम की उम्मीद

करीब 25 हजार से अधिक आबादी वाले इस क्षेत्र में ग्रामीणों की सबसे बड़ी प्राथमिकता परिवारों की सुरक्षा है। बच्चों की पढ़ाई, किसानों की आजीविका और रोजमर्रा के काम प्रभावित न हों, इसके लिए वन विभाग की सतत निगरानी जरूरी है।

ग्रामीण चाहते हैं कि वन विभाग जंगली जानवरों की गतिविधियों पर प्रभावी नजर रखे और आबादी वाले इलाकों में खतरे की आशंका होने पर समय रहते लोगों को सतर्क करे।

फिलहाल मधवापुर, रसुलवा, गोविंदपुर और आसपास के गांवों में बाघ तथा तेंदुए की मौजूदगी को लेकर चिंता बनी हुई है। लोगों को उम्मीद है कि संबंधित विभाग प्रभावी कदम उठाकर उन्हें भय के माहौल से राहत दिलाएगा।

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