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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) जैसी गंभीर और दुर्लभ बीमारी से पीड़ित मरीजों के महंगे इलाज को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को अदालत ने कहा कि जीवन बचाने वाली चिकित्सा सुविधाओं तक मरीजों की पहुंच कभी-कभार मिलने वाले दान या सरकार की ओर से दी जाने वाली एकमुश्त आर्थिक सहायता पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। इसके लिए एक स्थायी और नियमित वित्तीय सहायता प्रणाली विकसित करने की जरूरत है, ताकि मरीजों को इलाज के दौरान लगातार आर्थिक सहयोग मिल सके।भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल रहे। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक सूची में भी इन तीनों न्यायाधीशों की पीठ का उल्लेख है।सुनवाई के दौरान अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र अपराजिता सिंह से एक समर्पित फंड तैयार करने के संबंध में विस्तृत प्रस्ताव पेश करने को कहा।अदालत का जोर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर रहा, जिसके माध्यम से नियमित रूप से आर्थिक योगदान प्राप्त हो सके और जरूरतमंद मरीजों को बिना रुकावट वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
स्थायी आर्थिक सहायता प्रणाली की जरूरत
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था नियमित और स्थायी होनी चाहिए। उन्होंने कहा, "हमें एक नियमित माध्यम, एक स्थायी व्यवस्था की जरूरत है।"मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी से स्पष्ट होता है कि अदालत इलाज के लिए ऐसी व्यवस्था चाहती है, जो किसी विशेष अवसर पर मिलने वाली सहायता तक सीमित न रहे। इसके बजाय आर्थिक मदद पहुंचाने की प्रक्रिया लगातार चलती रहे।सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि महंगे इलाज की आवश्यकता वाले मरीजों के सामने आर्थिक संसाधनों की कमी बड़ी चुनौती बन सकती है। ऐसे में एक समर्पित फंड के माध्यम से चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने की संभावनाओं पर विचार करने की जरूरत बताई गई।
न्यायमित्र अपराजिता सिंह को प्रस्ताव तैयार करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र अपराजिता सिंह को समर्पित कोष के लिए एक व्यापक प्रस्ताव तैयार करने को कहा है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ऐसी वित्तीय सहायता प्रणाली की रूपरेखा सामने लाना है, जिसमें नियमित योगदान प्राप्त हो और मरीजों की आर्थिक जरूरतों को लगातार पूरा किया जा सके।अदालत की टिप्पणी का मुख्य केंद्र स्थायी फंडिंग व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता रही। हालांकि, प्रस्तावित कोष में कौन-कौन योगदान देगा, उसके संचालन की प्रक्रिया क्या होगी और सहायता किस आधार पर वितरित की जाएगी, इन विषयों पर अंतिम व्यवस्था की जानकारी सामने नहीं आई है।फिलहाल अदालत ने विस्तृत प्रस्ताव तैयार करने के लिए कहा है। इसलिए इसे किसी नई वित्तीय सहायता योजना की औपचारिक शुरुआत या फंड की स्थापना का अंतिम आदेश नहीं माना जा सकता।
क्या है स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी बीमारी?
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी यानी SMA एक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी है, जो शरीर की मांसपेशियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाली मोटर न्यूरॉन कोशिकाओं को प्रभावित करती है। इस बीमारी के कारण मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं और मरीज को शारीरिक गतिविधियां करने में परेशानी हो सकती है।बीमारी की गंभीरता अलग-अलग मरीजों में अलग हो सकती है। कुछ बच्चों में इसके लक्षण जन्म के शुरुआती महीनों में दिखाई देते हैं, जबकि कुछ मरीजों में बाद की उम्र में समस्या सामने आती है।गंभीर मामलों में बैठने, चलने, निगलने और सांस लेने जैसी गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। मरीज की स्थिति और बीमारी के प्रकार के अनुसार विशेषज्ञ चिकित्सक उपचार तय करते हैं।इस बीमारी के उपचार में कुछ विशेष दवाओं और जीन आधारित चिकित्सा पद्धतियों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इनका खर्च काफी अधिक हो सकता है। इसके अतिरिक्त मरीजों को नियमित चिकित्सकीय निगरानी, फिजियोथेरेपी और दूसरी सहायक स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता भी पड़ सकती है।
महंगे इलाज के कारण आर्थिक सहायता का सवाल अहम
SMA जैसी दुर्लभ बीमारियों के उपचार में होने वाला अत्यधिक खर्च मरीजों और उनके परिवारों के लिए गंभीर आर्थिक चुनौती पैदा कर सकता है। कई मामलों में उपचार की लागत इतनी अधिक होती है कि सामान्य पारिवारिक आय से उसका भुगतान करना कठिन हो जाता है।यही वजह है कि ऐसे मरीजों के लिए आर्थिक सहायता की उपलब्धता विशेष महत्व रखती है। यदि मदद केवल दान या एकमुश्त अनुदान तक सीमित रहे, तो इलाज के अगले चरणों के लिए धन उपलब्ध होने को लेकर अनिश्चितता बनी रह सकती है।सुप्रीम कोर्ट ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए नियमित आर्थिक योगदान वाले स्थायी कोष की आवश्यकता पर जोर दिया है।अदालत की टिप्पणी में केवल आर्थिक सहायता जुटाने की बात नहीं है, बल्कि मरीजों तक सहायता लगातार पहुंचाने के लिए व्यवस्थित माध्यम विकसित करने की जरूरत भी शामिल है।
एकमुश्त अनुदान के बजाय नियमित मदद पर जोर
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में यह महत्वपूर्ण सवाल सामने आया कि जीवनरक्षक उपचार के लिए मरीजों को ऐसी व्यवस्था कैसे मिले, जिससे उन्हें बार-बार आर्थिक मदद की तलाश न करनी पड़े।अदालत ने स्थायी और निरंतर चलने वाली प्रणाली पर जोर देकर यह संकेत दिया कि वित्तीय सहायता का स्वरूप अधिक व्यवस्थित होना चाहिए।इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य मरीजों को समय पर जरूरी इलाज उपलब्ध कराने के लिए आर्थिक सहयोग सुनिश्चित करना है। नियमित योगदान वाला समर्पित कोष इस दिशा में एक संभावित उपाय हो सकता है।
अब विस्तृत प्रस्ताव पर रहेगी नजर
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब न्यायमित्र अपराजिता सिंह द्वारा तैयार किए जाने वाले विस्तृत प्रस्ताव का महत्व बढ़ गया है। प्रस्ताव में स्थायी वित्तीय सहायता प्रणाली का स्वरूप किस प्रकार निर्धारित किया जाएगा, यह आगे की प्रक्रिया में स्पष्ट हो सकेगा।अदालत ने फिलहाल स्थायी आर्थिक सहयोग की आवश्यकता को प्रमुखता से उठाया है। किसी विशेष धनराशि, फंड के आकार या उसके क्रियान्वयन की निश्चित तारीख की जानकारी उपलब्ध नहीं है।सुप्रीम कोर्ट की यह पहल दुर्लभ बीमारियों के इलाज में आर्थिक सहायता की निरंतरता से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल को सामने लाती है। अब देखना होगा कि प्रस्तावित व्यवस्था किस स्वरूप में सामने आती है और SMA से पीड़ित मरीजों के लिए स्थायी वित्तीय सहयोग का रास्ता कैसे तैयार होता है।
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