उत्तर प्रदेश

देवरिया के छात्रों का कमाल बनाया 'वायुपुत्र ड्यूल' ड्रोन मॉडल

Kavita2
6 Nov 2026 2:24 PM IST
देवरिया के छात्रों का कमाल बनाया वायुपुत्र ड्यूल ड्रोन मॉडल
x

देवरिया। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के विद्यार्थियों ने तकनीकी नवाचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। छात्रों ने ऐसा विशेष ड्रोन मॉडल तैयार किया है, जिसका उपयोग भविष्य में आपदा प्रबंधन के साथ-साथ आधुनिक खेती में भी किया जा सकेगा। इस अनोखे मॉडल को 'वायुपुत्र ड्यूल' नाम दिया गया है। विद्यार्थियों का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जो बाढ़, भूकंप, भूस्खलन और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान फंसे लोगों की तलाश करने में मदद करे। इसके साथ ही किसानों को फसलों की निगरानी और कृषि कार्यों में तकनीकी सहायता प्रदान की जा सके। इस परियोजना को प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में भी सराहना मिली है।

जानकारी के अनुसार, राजकीय पॉलिटेक्निक देवरिया के विद्यार्थियों ने इस ड्रोन मॉडल को दोहरी उपयोगिता की अवधारणा पर तैयार किया है। इसका पहला उद्देश्य प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत और बचाव कार्यों को अधिक प्रभावी बनाना है, जबकि दूसरा उद्देश्य खेती में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना है।

प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित क्षेत्रों तक समय पर पहुंचने की होती है। बाढ़ आने पर सड़कें पानी में डूब जाती हैं। भूस्खलन से रास्ते बंद हो जाते हैं और भूकंप के बाद इमारतों के मलबे में लोगों के फंसे होने की आशंका रहती है।

कई बार बिजली आपूर्ति और मोबाइल नेटवर्क भी बाधित हो जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में राहत एवं बचाव दल के लिए प्रभावित लोगों की सही स्थिति का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। विद्यार्थियों ने इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इस तकनीकी मॉडल की परिकल्पना की है।

'वायुपुत्र ड्यूल' के माध्यम से आपदा प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करने की योजना बनाई गई है। इसके जरिए ऊंचाई से प्रभावित स्थानों की तस्वीरें और वीडियो प्राप्त किए जा सकेंगे। इससे बचाव दल को यह समझने में सहायता मिल सकती है कि किन क्षेत्रों में अधिक नुकसान हुआ है और किन स्थानों पर लोगों के फंसे होने की आशंका है।

विद्यार्थियों ने मॉडल में लाइव वीडियो और जरूरी आंकड़ों के संग्रह की व्यवस्था की परिकल्पना की है। इसका उद्देश्य राहत दल को स्थिति के अनुसार निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना है।

परियोजना के तकनीकी ढांचे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई, मोशन सेंसर और वाइडबैंड एंटीना ऐरे जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की योजना शामिल है। इनके माध्यम से प्रभावित क्षेत्र में लोगों की मौजूदगी और संभावित स्थान की पहचान करने की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।

इसके अलावा मॉडल में आरजीबी कैमरा, थर्मल कैमरा, लाइडार या रेंज सेंसर तथा जीएनएसएस और आरटीके आधारित पोजिशनिंग तकनीक शामिल करने की परिकल्पना की गई है। ये तकनीकें अलग-अलग परिस्थितियों में उपयोगी हो सकती हैं।

आरजीबी कैमरे की मदद से सामान्य दृश्य प्राप्त किए जा सकते हैं, जबकि थर्मल कैमरा तापमान के अंतर के आधार पर संभावित संकेत पहचानने में उपयोगी होता है। वहीं, दूरी मापने वाले सेंसर और पोजिशनिंग प्रणाली के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों का आकलन और स्थान संबंधी जानकारी जुटाई जा सकती है।

हालांकि, परियोजना अभी मॉडल और तकनीकी अवधारणा के स्तर पर है। इसलिए इसकी सभी प्रस्तावित क्षमताओं को वास्तविक आपदा परिस्थितियों में प्रमाणित मानना जल्दबाजी होगी। इसके लिए आगे विस्तृत परीक्षण और तकनीकी सत्यापन जरूरी होगा।

इस परियोजना की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि विद्यार्थियों ने मोबाइल नेटवर्क बाधित होने जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखा है। आपदाओं के दौरान संचार व्यवस्था ठप होने से राहत कार्य प्रभावित होते हैं।

विद्यार्थियों ने ऐसी व्यवस्था की कल्पना की है, जिससे हवाई सर्वेक्षण के दौरान जुटाई गई सूचनाएं बचाव दल तक पहुंचाने में सहायता मिल सके। हालांकि, नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने पर संचार की वास्तविक क्षमता संबंधित उपकरणों और तकनीकी परीक्षणों पर निर्भर करेगी।

आपदा प्रबंधन के अतिरिक्त 'वायुपुत्र ड्यूल' को कृषि क्षेत्र के लिए भी उपयोगी बनाने की योजना है। इसके जरिए धान, गेहूं, गन्ना और अन्य फसलों की निगरानी करने की संभावनाएं प्रस्तुत की गई हैं।

कृषि कार्यों में ड्रोन का उपयोग तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। खेतों में फसल की स्थिति का आकलन करने, बड़े क्षेत्र की निगरानी करने और कुछ परिस्थितियों में उर्वरक या कीटनाशक छिड़काव करने के लिए ड्रोन तकनीक उपयोगी हो सकती है।

विद्यार्थियों की योजना है कि भविष्य में इस मॉडल में मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग, थर्मल इमेजिंग और एआई आधारित विश्लेषण जैसी सुविधाएं विकसित की जाएं। इससे फसलों में रोग, कीटों के प्रभाव और पोषक तत्वों की कमी के शुरुआती संकेतों की पहचान करने में सहायता मिल सकती है।

ऐसी तकनीक विकसित होने पर किसानों को फसल की स्थिति के बारे में अधिक व्यवस्थित जानकारी मिल सकेगी। विशेष रूप से बड़े कृषि क्षेत्रों में निगरानी के लिए ड्रोन का उपयोग समय बचाने में मदद कर सकता है।

इस परियोजना को तैयार करने वाली टीम में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग के तृतीय वर्ष के छात्र संचित श्रीवास्तव और खुशी तिवारी शामिल हैं। इनके साथ द्वितीय वर्ष की छात्राएं नंदनी गुप्ता, अंजली प्रजापति और शीतल सिंह ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

विद्यार्थियों ने संस्थान के सेवायोजन अधिकारी एवं प्रवक्ता नरेंद्र मोहन मिश्र के मार्गदर्शन में मॉडल तैयार किया। टीम ने तकनीकी समस्याओं का अध्ययन करते हुए ऐसा समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया, जिसका सामाजिक और कृषि क्षेत्र में उपयोग हो सके।

इस परियोजना को 27 और 28 अक्टूबर को लखनऊ में आविष्कार फाउंडेशन की ओर से आयोजित प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में प्रस्तुत किया गया था। प्रतियोगिता में उत्तर प्रदेश के 40 से अधिक जिलों के विद्यार्थियों ने अपने तकनीकी मॉडल और नवाचार प्रस्तुत किए।

इस दौरान राजकीय पॉलिटेक्निक देवरिया के विद्यार्थियों के 'वायुपुत्र ड्यूल' मॉडल की उपयोगिता और अवधारणा की सराहना की गई। इससे पहले जिला स्तरीय प्रतियोगिता में आठ कॉलेजों के बीच इस परियोजना को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था।

यह उपलब्धि विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि उन्होंने ऐसी समस्या पर काम किया है, जिसका संबंध आपदा के समय मानव जीवन की सुरक्षा और किसानों की जरूरतों से है।

गौरतलब है कि राजकीय पॉलिटेक्निक देवरिया के विद्यार्थियों ने इससे पहले भी कृषि उपयोग के लिए ड्रोन विकसित करने की दिशा में काम किया था। दिसंबर 2024 में संस्थान के वर्तमान और पूर्व विद्यार्थियों द्वारा बनाए गए लगभग 10 किलोग्राम पेलोड क्षमता वाले 'वायुपुत्र' ड्रोन का सफल परीक्षण किया गया था। उस परियोजना का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में छिड़काव और निगरानी जैसी सुविधाएं विकसित करना था।

अब 'वायुपुत्र ड्यूल' के जरिए विद्यार्थियों ने आपदा प्रबंधन और कृषि तकनीक को एक ही मॉडल की अवधारणा में शामिल करने का प्रयास किया है।

आने वाले समय में यदि इस परियोजना को आवश्यक तकनीकी संसाधन, परीक्षण सुविधाएं और विशेषज्ञ मार्गदर्शन मिलता है, तो इसे और विकसित किया जा सकता है। वास्तविक उपयोग से पहले इसकी उड़ान क्षमता, बैटरी बैकअप, संचार प्रणाली, सेंसर की विश्वसनीयता और सुरक्षा मानकों का परीक्षण आवश्यक होगा।

फिलहाल देवरिया के विद्यार्थियों की यह पहल तकनीकी शिक्षा में नवाचार और सामाजिक समस्याओं के समाधान की दिशा में एक सकारात्मक उदाहरण बनकर सामने आई है। 'वायुपुत्र ड्यूल' मॉडल ने यह दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बीच भी विद्यार्थी नई तकनीकों की मदद से आपदा प्रबंधन और खेती जैसी महत्वपूर्ण जरूरतों के लिए उपयोगी विचार प्रस्तुत कर सकते हैं।

Next Story