उत्तर प्रदेश

हड़प्पाकालीन शिल्प से रूबरू हुए विद्यार्थी, अनवर ने सिखाई घिसाई और पॉलिशिंग

nidhi
24 Oct 2026 8:21 AM IST
हड़प्पाकालीन शिल्प से रूबरू हुए विद्यार्थी, अनवर ने सिखाई घिसाई और पॉलिशिंग
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अनवर की कारीगरी में बसी विरासत
लखनऊ: पत्थरों को तराशकर खूबसूरत मनकों में बदलने की पारंपरिक कला गुजरात के खंभात निवासी अनवर हुसैन शेख के परिवार में छह पीढ़ियों से आगे बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय की ओर से लखनऊ में आयोजित कार्यशाला में उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को इस शिल्प की बारीकियां सिखाईं। अनवर लखनऊ के निवासी नहीं हैं; वह यहां प्रशिक्षण देने पहुंचे थे।
अनवर हुसैन शेख को वर्ष 2003 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था। उनके मुताबिक, परिवार की पिछली पीढ़ियां भी इस काम से जुड़ी रही हैं और अब वह अपने बेटों को पत्थरों के चयन, आकार देने तथा मनकों में छेद करने का कौशल सिखा रहे हैं।
पत्थर के चयन से पॉलिशिंग तक मिला प्रशिक्षण
दो दिवसीय कार्यशाला में प्रतिभागियों को मनका निर्माण का सैद्धांतिक और व्यावहारिक परिचय दिया गया। राज्य पुरातत्व निदेशालय की निदेशक रेनू द्विवेदी ने बताया कि प्राचीन मनके तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता, कलात्मक रुचि, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक जीवन को समझने के महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य हैं। आयोजन में 150 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया और पहले दिन आठ बैचों में प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण में पत्थरों को घर्षण से आकार देने, सतह चिकनी करने और चमक लाने की प्रक्रिया समझाई गई। अनवर हुसैन शेख, आफताब हुसैन शेख और प्रताप भाई माथुर भाई परमार ने पारंपरिक तकनीकों का प्रदर्शन किया। विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने स्वयं अभ्यास करके निर्माण की कठिनाइयों और सूक्ष्मता को समझा।
लाजवर्द और कार्नेलियन से बनते हैं मनके
अनवर के अनुसार, लाजवर्द यानी लैपिस लाजुली और कार्नेलियन जैसे पत्थरों से विभिन्न आकार के मनके तथा आभूषण तैयार किए जाते हैं। उन्होंने अफगानिस्तान के लाजवर्द और गुजरात के राजपीपला व झगड़िया क्षेत्र के कार्नेलियन का उल्लेख किया। उनका कहना है कि मनका बनाने में अनुभव, धैर्य और हाथों के कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कार्यशाला में शामिल विद्यार्थियों ने पत्थरों में छेद करने, घिसाई और पॉलिशिंग को नया अनुभव बताया। ऐसे आयोजन प्राचीन शिल्प को समझने के साथ पारंपरिक कारीगरों का ज्ञान नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर देते हैं। यहां तैयार किए गए मनके वर्तमान कारीगरी के उदाहरण हैं; इन्हें पुरातात्त्विक खुदाई में मिले वास्तविक हड़प्पाकालीन मनकों से अलग समझना चाहिए।
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