- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- चीनी मिल राख से बनेगी...
चीनी मिल राख से बनेगी Strong ईंट, प्लास्टर की जरूरत नहीं

Kanpur.कानपुर। चीनी मिलों से निकलने वाली राख वायु प्रदूषण का बड़ा कारण है, लेकिन अब इसका पर्यावरण अनुकूल और स्थायी समाधान मिल गया है। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. नरेंद्र मोहन के नेतृत्व में शोध दल ने इससे सुंदर और टिकाऊ ईंट तैयार करने की विधि विकसित की है।महाराष्ट्र के कोल्हापुर और यूपी के सीतापुर के रामगढ़ की चीनी मिलों में भी इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू हो गया है।अब दोनों चीनी मिलों की राख से ईंटें बनाई जा रही हैं, जो परंपरागत ईंटों से ज्यादा मजबूत और नमी रहित हैं। इन ईंटों से बनी दीवारों पर प्लास्टर करने की जरूरत नहीं है।चीनी मिल की राख से ईंट बनाते श्रमिक। संस्थानपांच हजार टन गन्ना पेरने वाली एक चीनी मिल से प्रतिदिन 20 टन तक राख निकलती है। अभी तक चीनी मिलों द्वारा इस राख का निपटान गड्ढों को भरकर किया जाता रहा है, लेकिन चीनी मिलों से निकलने वाली राख में कई तरह के रसायन होने के कारण इसे मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है।
इसी कारण केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड चीनी मिलों पर लगातार शिकंजा कसते रहते हैं। उनसे राख के उचित निस्तारण को लेकर सवाल किए जाते हैं।राष्ट्रीय शर्करा संस्थान के पूर्व निदेशक प्रो. नरेंद्र मोहन ने बताया कि चीनी मिलों के बॉयलर से निकलने वाली राख से वायु प्रदूषण होता है और इसका निस्तारण मुश्किल होता है।लंबे समय से इसके सुरक्षित निस्तारण पर विचार किया जा रहा है।चीनी मिलों में गन्ने की खोई जलाने से निकलने वाली राख से ईंटें तैयार की जा रही हैं। संस्थानजब इस समस्या के समाधान पर काम शुरू हुआ तो इसे बिजली संयंत्रों से निकलने वाली राख की तरह इस्तेमाल करने का विचार आया। चीनी मिलों से निकलने वाली राख और बिजली संयंत्रों की राख के गुण अलग-अलग होते हैं।इससे ईंट बनाने में बड़ी दिक्कतें आईं, लेकिन आखिरकार सफलता मिल ही गई। अब डालमिया समूह की दो चीनी मिलों में बॉयलर की राख से ईंटें बनाई जा रही हैं। ऐसे बनती हैं ईंटेंप्रो. नरेंद्र मोहन ने बताया कि ईंट बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल बॉयलर की राख, पत्थर की रेत और सीमेंट है। इसे निर्धारित अनुपात में मिलाकर हाइड्रोलिक प्रेस से मनचाहे आकार की ईंटें बनाई जा रही हैं।
बगास की राख से बनी ईंटों को 21-30 दिन तक पानी छिड़ककर मजबूत किया जाता है। डालमिया भारत शुगर एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड के डिप्टी एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर आसिफ बेग के मुताबिक बॉयलर से प्राप्त राख से ईंट, पेवर्स, टाइल्स और ब्लॉक बनाए जा रहे हैं।ज्यादा मजबूती, प्लास्टर की जरूरत नहींनेशनल शुगर इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक और डालमिया समूह के सलाहकार प्रो. नरेंद्र मोहन। संस्थानप्रो. मोहन ने बताया कि चीनी मिलों के बॉयलर में गन्ने की बगास जलाई जाती है। इस राख में मुख्य रूप से सिलिकॉन, एल्युमीनियम, आयरन और कैल्शियम के ऑक्साइड होते हैं। इसमें थोड़ी मात्रा में मैग्नीशियम, पोटैशियम, सोडियम, टाइटेनियम और सल्फर भी होता है।इससे ईंटों की मजबूती बढ़ी और वे दिखने में चमकदार हो गईं। ये ईंटें बाजार में उपलब्ध स्टोन डस्ट, फ्लाई ऐश (कोयले की राख) और सीमेंट से बनी ईंटों से सस्ती और ज्यादा टिकाऊ हैं। इन ईंटों को बनाने की लागत पांच से सात रुपये प्रति ईंट आती है।





