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गाजीपुर : उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में परीक्षा देने स्कूल पहुंचे छात्र उत्कर्ष गुप्ता की करंट लगने से मौत हो गई। घटना जंगीपुर थाना क्षेत्र के एक निजी विद्यालय की है। शुरुआती जानकारी के अनुसार, परीक्षा शुरू होने से पहले उत्कर्ष स्कूल परिसर में खेल रहा था। इसी दौरान वह बिजली के तार के संपर्क में आ गया। उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। बच्चे की मौत के बाद परिजनों ने विद्यालय प्रबंधन पर लापरवाही और घटना की तत्काल सूचना नहीं देने का आरोप लगाया है।
उत्कर्ष की उम्र को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों में अंतर है। कहीं सात तो कहीं आठ वर्ष बताया गया है, इसलिए उसे 11 वर्षीय बताने की पुष्टि नहीं हो सकी है। इसी तरह मां से झूठ बोले जाने का दावा भी स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं है। हालांकि, परिजनों का आरोप है कि स्कूल की ओर से उन्हें समय पर सही जानकारी नहीं दी गई। घटना से जुड़े इन अलग-अलग विवरणों के बीच बच्चे की मृत्यु, परिसर में बिजली के तार की मौजूदगी और स्कूल की जिम्मेदारी मुख्य सवाल हैं।
स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, जंगीपुर निवासी दिलीप गुप्ता का बेटा उत्कर्ष तीसरी कक्षा में पढ़ता था। पिता ने बताया कि वह सुबह करीब आठ बजे परीक्षा देने विद्यालय पहुंचा था। परीक्षा और प्रार्थना शुरू होने से पहले बच्चे मैदान में खेल रहे थे। कुछ समय बाद स्कूल के एक बच्चे ने परिवार को सूचना दी कि उत्कर्ष को करंट लग गया है और उसे अस्पताल ले जाया जा रहा है। जानकारी मिलते ही परिजन अस्पताल पहुंचे, लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी। पिता ने स्कूल की लापरवाही का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की है।
मृतक के मामा दीपक गुप्ता ने बिजली के तार की व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि विद्यालय के आसपास बंदरों से बचाव के लिए परिसर में जमीन से लगभग दो से तीन फीट ऊपर बिजली का तार लगाया गया था। उनके मुताबिक, खेलते समय उत्कर्ष इसी तार की चपेट में आया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हादसे के बाद विद्यालय प्रबंधन ने परिवार को सूचना नहीं दी। दूसरे माध्यम से जानकारी मिलने पर वह स्कूल पहुंचे। वहां उत्कर्ष नहीं मिला तो अस्पताल गए, जहां उन्हें उसकी मौत का पता चला। तार लगाने के उद्देश्य से जुड़ा यह विवरण परिजन का आरोप है।
एक अन्य रिपोर्ट में घटना झूले के पास होने का उल्लेख है। उसमें परिजनों के हवाले से बताया गया है कि झूले के नजदीक बिजली का तार लटक रहा था। मामा का आरोप है कि बच्चे पहले भी इस खतरे की शिकायत कर चुके थे, लेकिन तार हटाने या सुरक्षित करने के लिए कदम नहीं उठाया गया। अस्पताल के इमरजेंसी मेडिकल अधिकारी के अनुसार, उत्कर्ष को मृत अवस्था में लाया गया था। यह विवरण उस शुरुआती सूचना से अलग है, जिसमें उपचार के दौरान मृत्यु होने की बात कही गई थी।
परिजनों ने घटना के बाद स्कूल में हुए व्यवहार पर भी आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि जब वे विद्यालय पहुंचे तो प्रधानाचार्य वहां नहीं मिले। उन्होंने हाथापाई किए जाने और वीडियो बनाने से रोकने का आरोप भी लगाया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। ऐसे में इन्हें परिवार के बयान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
विद्यालय के प्रधानाचार्य नीरज गुप्ता का पक्ष भी सामने आया है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने बताया कि वह जरूरी काम से पटना जा रहे थे, तभी घटना की जानकारी मिली। उनका कहना है कि बच्चे को पहले स्थानीय अस्पताल और फिर जिला अस्पताल भेजा गया। तार के संबंध में उन्होंने कहा कि वह चहारदीवारी के ऊपर लगा था और रात में बंदरों के कारण टूटकर नीचे गिर गया। थानाध्यक्ष ओम प्रकाश के मुताबिक, मामले में तहरीर मिली है और शव को मोर्चरी भेजा गया है।
परिजनों और विद्यालय के बयानों से जांच के लिए कई सवाल निकलते हैं। बिजली का तार बच्चों की पहुंच तक कैसे आया? क्या उसके आसपास कोई अवरोध था? विद्यालय खुलने से पहले मैदान और झूले की जांच हुई थी या नहीं? यदि खतरे की शिकायत पहले की गई थी तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब से ही यह स्पष्ट होगा कि दुर्घटना अचानक उत्पन्न खतरे से हुई या सुरक्षा संबंधी चूक पहले से मौजूद थी।
घटना के बाद की समयरेखा भी उतनी ही जरूरी है। बच्चे को सबसे पहले किसने देखा, अस्पताल ले जाने की व्यवस्था कब हुई और परिवार को सूचना किस समय दी गई—इन बातों का मिलान संबंधित लोगों के बयानों तथा अस्पताल के रिकॉर्ड से किया जा सकता है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। परिवार के आरोप और प्रधानाचार्य का स्पष्टीकरण दोनों जांच का हिस्सा होने चाहिए।
उत्कर्ष की मौत ने विद्यालय परिसर में बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़ा किया है। इस मामले में जिम्मेदारी तय करने के लिए तार की स्थिति, उसकी बिजली आपूर्ति और हादसे से पहले तथा बाद की परिस्थितियों का स्पष्ट होना आवश्यक है। परिजनों की शिकायत का निष्पक्ष परीक्षण और स्कूल के पक्ष की जांच ही घटना की सही तस्वीर सामने ला सकती है।
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