उत्तर प्रदेश

बेटे ने नहीं दिया पिता को कंधा बस्ती में पांच दिन तक मोर्चरी में पड़ा रहा शव

nidhi
8 Aug 2026 10:53 AM IST
बेटे ने नहीं दिया पिता को कंधा बस्ती में पांच दिन तक मोर्चरी में पड़ा रहा शव
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बस्ती में इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला पांच दिन बाद भी शव लेने नहीं आया बेटा

पुरानी बस्ती : उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से रिश्तों को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। यहां एक व्यक्ति का शव पांच दिनों तक मोर्चरी में पड़ा रहा, लेकिन अंतिम संस्कार के लिए उसका बेटा तक नहीं पहुंचा। घटना ने परिवार और समाज में बदलते रिश्तों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

पांच दिन तक मोर्चरी में रहा शव
जानकारी के मुताबिक, व्यक्ति की मौत के बाद शव को पोस्टमार्टम और अन्य आवश्यक प्रक्रिया के लिए मोर्चरी में रखा गया था। उम्मीद थी कि परिजन पहुंचेंगे और शव की पहचान के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी होगी।
लेकिन पांच दिन बीत जाने के बाद भी मृतक का बेटा अंतिम दर्शन के लिए नहीं पहुंचा। इससे प्रशासन के सामने भी शव के अंतिम संस्कार को लेकर स्थिति जटिल हो गई।
बेटे के नहीं पहुंचने से उठे सवाल
सबसे ज्यादा हैरानी इस बात को लेकर जताई जा रही है कि पिता की मृत्यु के बाद भी बेटा अंतिम दर्शन के लिए नहीं आया। आखिर ऐसी क्या परिस्थिति थी कि वह अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सका, यह स्पष्ट नहीं है।
ऐसे मामलों में पारिवारिक विवाद, दूरी या अन्य व्यक्तिगत परिस्थितियां वजह हो सकती हैं, लेकिन वास्तविक कारण संबंधित परिवार और प्रशासन की जानकारी के बाद ही स्पष्ट हो सकता है।
प्रशासन ने निभाई जिम्मेदारी
शव के लंबे समय तक मोर्चरी में पड़े रहने के बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया। नियमानुसार शव की पहचान और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी करने की दिशा में कार्रवाई की गई।
ऐसी परिस्थितियों में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती शव को सुरक्षित रखना और कानूनी औपचारिकताएं पूरी करना होती है।
रिश्तों पर सोचने को मजबूर करती घटना
यह घटना सिर्फ एक शव के मोर्चरी में पड़े रहने की कहानी नहीं है। यह सवाल भी खड़ा करती है कि बदलते सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में बुजुर्गों और अकेले रह रहे लोगों की देखभाल कौन करेगा?
माता-पिता के साथ रहने की पारंपरिक व्यवस्था बदल रही है। रोजगार, पलायन, पारिवारिक विवाद और अलग-अलग शहरों में रहने की वजह से कई परिवारों में दूरी बढ़ी है। ऐसे में बुजुर्गों की सुरक्षा और सामाजिक सहारे की जरूरत और बढ़ जाती है।
अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार भारतीय समाज में भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति के शव का कई दिनों तक इंतजार करना और परिजनों का न पहुंचना निश्चित रूप से भावुक करने वाला है।
हालांकि, घटना के पीछे की वास्तविक परिस्थितियों को जाने बिना किसी व्यक्ति या परिवार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
सवाल छोड़ गई बस्ती की यह घटना
बस्ती की यह घटना समाज के सामने एक गंभीर सवाल छोड़ती है—क्या बदलती जीवनशैली के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों और बुजुर्गों की देखभाल को लेकर हमारी सोच भी बदल रही है?
जरूरत इस बात की है कि परिवारों के साथ-साथ समाज और प्रशासन भी ऐसे लोगों की पहचान करे जो उम्र या परिस्थितियों के कारण अकेले पड़ रहे हैं, ताकि किसी की जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर वह पूरी तरह असहाय न रह जाए।
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