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यूपी : अस्पतालों की फार्मेसी में बेची जाने वाली दवाओं और इंजेक्शन की खरीद कीमत तथा उन पर दर्ज अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की ओर से मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों की फार्मेसियों के निरीक्षण के बाद जुटाए गए आंकड़ों के विश्लेषण में यह स्थिति सामने आई है। जांच के दायरे में राज्य के 214 अस्पतालों की फार्मेसियों को शामिल किया गया, जहां से दवाओं और इंजेक्शन की खरीद तथा बिक्री से संबंधित जानकारी जुटाई गई।
आंकड़ों में सबसे चौंकाने वाला उदाहरण पॉलिमिक्सिन-बी इंजेक्शन का सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस इंजेक्शन की खरीद कीमत 74.09 रुपये बताई गई है, जबकि उस पर 4,980.94 रुपये एमआरपी दर्ज है। यानी खरीद कीमत और एमआरपी के बीच कई गुना अंतर है। इस तरह के आंकड़ों ने अस्पतालों में मरीजों को मिलने वाली दवाओं की कीमतों और उनके मूल्य निर्धारण को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
एफएसडीए ने अस्पतालों की फार्मेसियों से अलग-अलग दवाओं और इंजेक्शन की खरीद कीमत तथा उनकी बिक्री से संबंधित आंकड़े एकत्र किए हैं। इन आंकड़ों का विश्लेषण करने पर कई उत्पादों में खरीद मूल्य और एमआरपी के बीच काफी अंतर पाया गया। खास तौर पर अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं और इंजेक्शन के मामले में यह अंतर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि भर्ती मरीजों को कई बार अस्पताल परिसर में मौजूद फार्मेसी से ही दवाएं खरीदनी पड़ती हैं।
अस्पताल में भर्ती मरीज और उनके परिजन आमतौर पर डॉक्टर की ओर से लिखी गई दवाओं को तत्काल खरीदते हैं। गंभीर स्थिति या आपातकाल में उनके पास अलग-अलग दुकानों पर कीमत की तुलना करने का अवसर भी सीमित रहता है। ऐसे में दवाओं पर दर्ज एमआरपी और अस्पताल की फार्मेसी में वसूली जाने वाली वास्तविक कीमत सीधे मरीज के इलाज के खर्च को प्रभावित कर सकती है।
एफएसडीए की जांच में 214 अस्पतालों की फार्मेसियों को शामिल किया जाना इस मामले के व्यापक स्तर को दिखाता है। इसमें मेडिकल कॉलेजों के साथ निजी अस्पतालों की फार्मेसियों से भी जानकारी ली गई। विभाग ने दवाओं और इंजेक्शन की खरीद और बिक्री से जुड़े आंकड़ों को लेकर उनका विश्लेषण किया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अस्पतालों को संबंधित दवा किस कीमत पर उपलब्ध हो रही है और उस पर कितनी एमआरपी दर्ज की गई है।
पॉलिमिक्सिन-बी इंजेक्शन से जुड़े आंकड़े ने विशेष रूप से ध्यान खींचा है। 74.09 रुपये की खरीद कीमत के मुकाबले 4,980.94 रुपये की एमआरपी होने का मतलब है कि दोनों कीमतों के बीच करीब 67 गुना का अंतर है। हालांकि केवल एमआरपी अधिक होने का अर्थ यह नहीं है कि फार्मेसी उसी कीमत पर दवा बेच रही है। वास्तविक बिक्री मूल्य कितना है और मरीजों से कितनी राशि ली गई, इसका निर्धारण बिक्री के आंकड़ों और बिलों के आधार पर ही किया जा सकता है।
इस मामले में खरीद मूल्य, एमआरपी और वास्तविक बिक्री मूल्य तीन अलग-अलग पहलू हैं। एमआरपी किसी उत्पाद की वह अधिकतम कीमत होती है, जिससे अधिक कीमत पर उसे खुदरा स्तर पर नहीं बेचा जा सकता। वहीं अस्पताल या फार्मेसी दवा को एमआरपी से कम कीमत पर भी बेच सकती है। इसलिए एफएसडीए की ओर से जुटाए गए बिक्री के आंकड़े यह समझने में अहम होंगे कि खरीद कीमत और मरीज से वसूली गई राशि में वास्तव में कितना अंतर रहा।
अस्पतालों में इलाज के कुल खर्च में दवाओं और इंजेक्शन की कीमत महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। गंभीर बीमारी, लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने या महंगे इंजेक्शन की जरूरत पड़ने पर दवाओं पर होने वाला खर्च काफी बढ़ सकता है। ऐसे में खरीद मूल्य और एमआरपी में बहुत अधिक अंतर मरीजों और उनके परिजनों के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
एफएसडीए के इस निरीक्षण और विश्लेषण से दवाओं की मूल्य व्यवस्था में पारदर्शिता का मुद्दा भी सामने आया है। यदि अस्पताल की फार्मेसी को कोई दवा बहुत कम कीमत पर मिल रही है और उसकी एमआरपी कई गुना अधिक दर्ज है, तो मरीज के लिए यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि उससे वास्तविक रूप से कितनी कीमत ली जा रही है। बिलिंग व्यवस्था और बिक्री मूल्य की स्पष्ट जानकारी इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
फिलहाल सामने आए आंकड़ों में पॉलिमिक्सिन-बी इंजेक्शन की खरीद कीमत और एमआरपी का अंतर सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित कर रहा है। एफएसडीए द्वारा 214 अस्पतालों की फार्मेसियों से जुटाए गए विस्तृत आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि अन्य दवाओं में कीमतों का अंतर कितना है और मरीजों को ये दवाएं वास्तव में किस कीमत पर बेची जा रही हैं।
दवाओं की कीमत से जुड़ा यह मामला सीधे मरीजों की जेब और इलाज के खर्च से संबंधित है। ऐसे में अस्पतालों की फार्मेसियों में खरीद मूल्य, एमआरपी और वास्तविक बिक्री मूल्य के बीच अंतर की पारदर्शी जानकारी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। एफएसडीए की जांच से सामने आए आंकड़ों ने अस्पतालों में दवाओं की कीमतों को लेकर नई बहस जरूर शुरू कर दी है।





