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Shravasti: कोर्ट की फटकार के बाद श्रावस्ती में अनवारुल उलूम पहला मदरसा खुला

श्रावस्ती: उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जनपद में अवैध और गैर मान्यता प्राप्त मदरसों पर प्रशासनिक कार्रवाई के बाद अब इस अभियान की दिशा और मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। जनपद में सील किए गए 120 मदरसों में से पहला मदरसा अनवारुल उलूम बनगई अब एक महीने बाद फिर खुल गया है—वो भी प्रशासन की मर्जी से नहीं, बल्कि हाईकोर्ट के आदेश पर।
गौरतलब है कि पिछले महीने 27 अप्रैल को प्रशासन ने इस मदरसे को यह कहते हुए सील कर दिया था कि यह अल्पसंख्यक विभाग से मान्यता प्राप्त नहीं है। मदरसा संचालक ने कई बार जिला प्रशासन से मुलाकात की, दस्तावेज प्रस्तुत किए, लेकिन किसी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद संचालक ने हाईकोर्ट की शरण ली।
हाईकोर्ट में जब यह मामला सामने आया, तो कोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग की मान्यता को वैध मानते हुए प्रशासन की कार्रवाई को अनुचित ठहराया और मदरसे को तत्काल खोलने का आदेश जारी किया। कोर्ट ने साफ कहा कि बेसिक शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त मदरसों को केवल अल्पसंख्यक विभाग की बिना अनुमति के गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में गुरुवार को मदरसे का ताला खोला गया। करीब एक महीने बाद जब मदरसे के दरवाजे खुले, तो संचालक की आंखें भर आईं। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उनका नहीं, बल्कि उन सैकड़ों बच्चों का न्याय है जिनकी पढ़ाई बिना किसी गलती के बाधित कर दी गई थी।
प्रशासनिक कार्रवाई बनी सवालों के घेरे में: श्रावस्ती में प्रशासन की कार्रवाई को लेकर पहले भी कई सवाल उठते रहे हैं। जनपद में कुल 192 अवैध मदरसों की पहचान की गई थी। इनमें से 120 मदरसों को सील किया गया, जबकि 21 से अधिक मदरसों को सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण मानते हुए बुलडोजर से ढहा दिया गया।
लेकिन अब अनवारुल उलूम जैसे मामलों से यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासन ने बिना पूरी जांच के ऐसे मदरसों पर भी ताले जड़ दिए जो पूरी तरह वैध थे?
यह मामला सिर्फ कानूनी कार्रवाई या प्रशासनिक आदेशों का नहीं, बल्कि सैकड़ों बच्चों के भविष्य का सवाल भी बन चुका है। जिस मदरसे का ताला अब कोर्ट के आदेश पर खुला, वहां पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई एक महीने तक रुकी रही। ऐसे में यह सवाल भी खड़ा होता है कि श्रावस्ती में कितने और ऐसे मदरसे हैं जिनकी मान्यता के बावजूद उन्हें बंद कर दिया गया, और वहां के बच्चे अब भी शिक्षा से वंचित हैं।
मदरसों के संचालकों का कहना है कि उन्होंने समय रहते अपनी बात रखने की कोशिश की, कागजात भी दिए, लेकिन प्रशासन ने कोई सुनवाई नहीं की। वहीं, प्रशासन की ओर से अब तक इस मसले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
श्रावस्ती में मदरसों पर चली कार्रवाई अब कानूनी कटघरे में है। अनवारुल उलूम बनगई का ताला खुलना महज एक प्रतीक नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक खामियों का आइना है, जिनकी कीमत समाज के सबसे नाजुक तबके—बच्चों को चुकानी पड़ रही है। हाईकोर्ट के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि बिना समुचित जांच और वैधता की पुष्टि के किसी भी शिक्षा संस्थान पर ताला जड़ना सिर्फ संवैधानिक गलती नहीं, शैक्षणिक अन्याय भी है।
अब देखना होगा कि जिला प्रशासन इस फैसले से क्या सबक लेता है और कितने और ऐसे मदरसों की सुध लेता है, जिनका ताला अभी भी न्याय के इंतजार में बंद है।





