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उत्तर प्रदेश
वाराणसी में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का बड़ा ऐलान, 'चतुरंगिनी सेना' बनेगी गोरक्षा की ताकत
SHIDDHANT
23 March 2026 8:49 PM IST

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Varanasi वाराणसी। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वाराणसी में 27 सदस्यों वाली चतुरंगिनी सेना के गठन की घोषणा की है, जिसे आगे चलकर गोरक्षा के उद्देश्य से विस्तारित करने की योजना है। इस संबंध में मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि यह पहल हिंदू समाज में व्याप्त भय को दूर करने और सत्य के साथ खड़े होने का साहस पैदा करने के उद्देश्य से की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि यह संगठन अगले 10 महीनों के भीतर विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य करता हुआ नजर आएगा और लोगों के बीच विश्वास व सुरक्षा की भावना को मजबूत करेगा।
शंकराचार्य ने कहा कि आज के समय में हिंदू समाज में कई लोग भय के कारण सच का साथ नहीं दे पाते और मजबूरी में गलत का समर्थन करने लगते हैं। ऐसे में चतुरंगिनी सेना का मुख्य उद्देश्य निर्बलों का बल बनना और समाज में न्याय स्थापित करना होगा। उन्होंने इस संगठन के कार्य करने के तरीके को “टोको, रोको और ठोको” के सिद्धांत से स्पष्ट किया। उनके अनुसार, सबसे पहले गलत कार्यों को चिन्हित कर लोगों को समझाने का प्रयास किया जाएगा। यदि इसके बावजूद सुधार नहीं होता है तो उसका विरोध कर उसे रोकने की कोशिश की जाएगी। वहीं, अंतिम चरण में “ठोको” का आशय हिंसा नहीं, बल्कि वैधानिक प्रक्रिया के तहत शिकायत दर्ज कराने, पंचायत करने और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करने से है।
फरसा धारण करने के सवाल पर उन्होंने भगवान परशुराम का उदाहरण देते हुए कहा कि परशुराम ने पहले वेदों का अध्ययन किया और तपस्या में जीवन बिताया। उनके आश्रम में गौ माता की सेवा होती थी, लेकिन जब सहस्रार्जुन नामक राजा ने उन पर आक्रमण कर गायों को कष्ट पहुंचाया, तब उन्होंने उनकी रक्षा के लिए शस्त्र धारण किया। शंकराचार्य ने कहा कि फरसा उसी परंपरा और प्रतीक का प्रतिनिधित्व करता है, जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा के अनुसार, किसी भी धार्मिक स्थल पर उसी धर्म के अनुयायियों को प्रवेश की अनुमति होती है। उन्होंने इसे सदियों पुरानी व्यवस्था बताते हुए कहा कि इसका पालन समाज में धार्मिक अनुशासन और मर्यादा बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
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