उत्तर प्रदेश

वाराणसी में BJP की लगातार दूसरी हार, संगठन पर उठे बड़े सवाल

Kavita2
30 Oct 2026 9:48 AM IST
वाराणसी में BJP की लगातार दूसरी हार, संगठन पर उठे बड़े सवाल
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वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की दोनों सीटों पर भाजपा को लगातार दूसरी बार हार का सामना करना पड़ा है। समाजवादी पार्टी ने दोनों सीटों पर जीत दर्ज कर भाजपा की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2020 के बाद 2026 में भी दोनों सीटों पर मिली हार ने पार्टी नेतृत्व के सामने नई चुनौती पैदा कर दी है। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आए इन नतीजों को राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा नेतृत्व इस हार से सबक लेकर संगठन में बदलाव करेगा या फिर स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी और कमजोर चुनावी प्रबंधन का असर आगामी विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिलेगा।

वाराणसी खंड स्नातक सीट पर समाजवादी पार्टी के आशुतोष सिन्हा ने भाजपा के केदारनाथ सिंह को 19,932 मतों से हराया। वर्ष 2020 में भी आशुतोष सिन्हा ने केदारनाथ सिंह को 3,850 मतों से पराजित किया था। इस बार जीत का अंतर 16 हजार से अधिक मतों तक बढ़ गया। इसी तरह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सपा के लाल बिहारी यादव ने भाजपा प्रत्याशी डॉ. प्रमोद मिश्र को हराकर अपनी सीट बरकरार रखी। लाल बिहारी यादव को 11,612 मत मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी को 6,597 वोट हासिल हुए। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में समाजवादी पार्टी ने अपनी स्थिति मजबूत की है।

भाजपा के लिए यह हार इसलिए भी चिंताजनक मानी जा रही है क्योंकि वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है। केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के बावजूद पार्टी दोनों सीटों पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। चुनाव के दौरान संगठन ने बूथ स्तर पर बैठकें कीं और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के प्रयास भी किए। कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में चुनावी रणनीति तैयार की गई, लेकिन परिणाम पार्टी की उम्मीदों के विपरीत रहे। ऐसे में स्थानीय स्तर पर संगठन की सक्रियता, मतदाताओं से संपर्क और प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार दूसरी बार एक ही क्षेत्र की दोनों सीटों पर हार केवल चुनावी संयोग नहीं मानी जा सकती। इसके पीछे संगठनात्मक कमियां, स्थानीय राजनीतिक समीकरण और मतदाताओं की प्राथमिकताओं जैसे कई कारण हो सकते हैं। भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्ष 2020 की हार के बाद पार्टी ने अपनी रणनीति में क्या बदलाव किए और वे बदलाव मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में प्रभावी क्यों नहीं रहे।

पार्टी के भीतर भी चुनावी तैयारियों को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। भाजपा के काशी क्षेत्रीय अध्यक्ष अशोक चौरसिया ने प्रत्याशी चयन में देरी को हार का एक प्रमुख कारण बताया है। उनका कहना है कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्येक मतदाता तक व्यक्तिगत रूप से पहुंचना आवश्यक होता है। प्रत्याशियों की घोषणा देर से होने के कारण उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल सका। वहीं कुछ स्थानीय नेताओं ने अति आत्मविश्वास और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की कमी को भी संभावित वजह बताया है।

भाजपा के लिए स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस निर्वाचन क्षेत्र में शिक्षित मतदाता, नौकरीपेशा लोग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा शामिल होते हैं। रोजगार, सरकारी भर्ती, परीक्षा व्यवस्था और उच्च शिक्षा से जुड़े मुद्दे इस वर्ग की प्राथमिकताओं में रहते हैं। ऐसे में पार्टी को यह समझना होगा कि इन मतदाताओं तक उसकी नीतियां और चुनावी संदेश किस हद तक पहुंच सके।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। डॉ. प्रमोद मिश्र ने वर्ष 2020 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 6,830 मत प्राप्त किए थे, जबकि इस बार भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के बावजूद उन्हें 6,597 मत मिले। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी के लाल बिहारी यादव ने पिछली बार के मुकाबले अपने मतों में बढ़ोतरी दर्ज की। इससे प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ और पार्टी के संगठनात्मक समर्थन की प्रभावशीलता पर चर्चा तेज हो गई है।

इस चुनावी हार के बाद भाजपा के स्थानीय संगठन की जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि चुनाव प्रचार, मतदाता सूची तैयार कराने और बूथ स्तर पर सक्रियता बढ़ाने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में अपेक्षित समन्वय नहीं बन पाया। हालांकि इन संभावित कारणों की वास्तविक पुष्टि संगठन की आंतरिक समीक्षा के बाद ही हो सकेगी। पार्टी को यह भी देखना होगा कि स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायतों और सुझावों को चुनावी रणनीति में कितना महत्व दिया गया।

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी इस जीत से उत्साहित है। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने विधान परिषद चुनाव में सपा प्रत्याशियों की सफलता पर भाजपा को घेरा है। उन्होंने वाराणसी के परिणामों को भाजपा की राजनीतिक असफलता बताते हुए तंज कसा। सपा अब इन नतीजों को आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता आधार विधानसभा चुनाव से अलग होता है, इसलिए इन परिणामों को सीधे विधानसभा चुनाव की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता।

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह परिणाम भाजपा के लिए संगठनात्मक समीक्षा का अवसर भी है। पार्टी को न केवल हार के कारणों का पता लगाना होगा, बल्कि स्थानीय नेताओं, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच बेहतर संवाद स्थापित करने पर भी ध्यान देना होगा। वाराणसी जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में लगातार दूसरी बार मिली हार ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल बड़े नेताओं की लोकप्रियता के सहारे हर चुनाव जीतना आसान नहीं है।

अब देखना होगा कि भाजपा नेतृत्व इस हार के बाद संगठनात्मक स्तर पर क्या कदम उठाता है। प्रत्याशी चयन, कार्यकर्ताओं की भूमिका और मतदाता संपर्क अभियान की समीक्षा से ही भविष्य की रणनीति तय होगी। फिलहाल वाराणसी की दोनों एमएलसी सीटों पर सपा की जीत ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

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