उत्तर प्रदेश

सदन में हंगामे पर छलका सतीश महाना का दर्द

Ratna Netam
5 Aug 2026 2:08 PM IST
सदन में हंगामे पर छलका सतीश महाना का दर्द
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उत्तर प्रदेश : विधानसभा में मंगलवार को हुए अभूतपूर्व हंगामे के बाद बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना सदन में बेहद भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि पिछले दिन सदन में जो कुछ हुआ, उसने उन्हें गहरी पीड़ा पहुंचाई है और अब उन्हें इस बात पर आत्ममंथन करना पड़ेगा कि क्या वह इस महत्वपूर्ण पद की गरिमा के अनुरूप अपनी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि वह जल्द ही इस विषय पर विचार कर निर्णय लेंगे कि वह इस कुर्सी के योग्य हैं या नहीं।

सदन को संबोधित करते हुए सतीश महाना ने कहा कि पिछले साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने हमेशा यही प्रयास किया कि विधानसभा और जनप्रतिनिधियों की गरिमा बनी रहे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की अपनी-अपनी भूमिका होती है। विपक्ष का काम केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि जनता से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाकर सरकार को सचेत करना भी है। इसी प्रकार सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने कार्यों और नीतियों को सदन के माध्यम से जनता के सामने रखे।

उन्होंने कहा कि कई बार सदन में असहज परिस्थितियां पैदा होती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप संवाद और संयम के जरिए उनका समाधान किया जाता रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले साढ़े चार वर्षों में कई अवसर ऐसे आए जब विपक्ष वेल में पहुंचा, नारेबाजी की और अपना विरोध दर्ज कराया, लेकिन कुछ समय बाद सदन की कार्यवाही सामान्य हो गई। हालांकि, मंगलवार को जो घटनाक्रम सामने आया, वह पहले की सभी घटनाओं से अलग और बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था।

सतीश महाना ने कहा कि उन्हें समाज में विधायिका और विधायकों की छवि को लेकर हमेशा चिंता रहती है। उन्होंने बताया कि कई लोग उनसे पूछते थे कि विपक्ष सदन में शोर-शराबा क्यों करता है। इस पर वह हमेशा यही जवाब देते थे कि लोकतंत्र में विपक्ष को अपनी बात रखने और सरकार से सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। लेकिन अधिकारों का प्रयोग भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर होना चाहिए।

अपने संबोधन के दौरान विधानसभा अध्यक्ष ने संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के उस कथन का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि भविष्य में कोई कमी दिखाई देगी तो वह संविधान में नहीं, बल्कि उसे संचालित करने वाले लोगों में होगी। महाना ने कहा कि मंगलवार की घटना के बाद उन्हें पहली बार लगा कि शायद बाबा साहब की यह बात सही साबित होती दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा कि कल सदन में जो कुछ हुआ, उससे वह बेहद दुखी और निराश हैं तथा उन्हें महसूस हुआ कि कहीं न कहीं उनके प्रयास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।

उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर भी अफसोस जताया कि सदन के एक ऐसे वरिष्ठ सदस्य का व्यवहार उन्हें सबसे अधिक आहत कर गया, जिन्हें अन्य विधायक एक आदर्श और रोल मॉडल के रूप में देखते हैं। उनका कहना था कि जब अनुभवी और वरिष्ठ जनप्रतिनिधि भी सदन की गरिमा का ध्यान नहीं रखते, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।

सतीश महाना ने कहा कि उन्होंने कई बार सदस्यों से संयम बरतने और मर्यादा बनाए रखने की अपील की थी, लेकिन इसके बावजूद सदन के बाहर और उनके कक्ष के बाहर जिस प्रकार की भाषा और व्यवहार देखने को मिला, वह अत्यंत निंदनीय था। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से भी आहत किया है। उनकी राजनीतिक यात्रा काफी लंबी रही है और अब वह अपने सार्वजनिक जीवन के अंतिम चरण में हैं। ऐसे समय में उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही रही कि विधानसभा ने उन्हें जो सम्मान और जिम्मेदारी दी है, उसका ऋण वह पूरी निष्ठा के साथ चुका सकें।

उन्होंने स्पष्ट किया कि विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उन्होंने हमेशा सभी दलों के साथ समान व्यवहार करने का प्रयास किया है। उनका उद्देश्य कभी किसी पक्ष का समर्थन या विरोध करना नहीं रहा, बल्कि सदन की निष्पक्षता, गरिमा और लोकतांत्रिक परंपराओं की रक्षा करना रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें और मतभेदों के बावजूद संवाद की संस्कृति को जीवित रखें।

गौरतलब है कि मंगलवार को विधानसभा में एक मुद्दे को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखा टकराव देखने को मिला था। हंगामा इतना बढ़ गया कि सदन की कार्यवाही बाधित हुई और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए मार्शलों को भी हस्तक्षेप करना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम के बाद बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष का भावुक संबोधन सदन के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया। अब सभी की नजर इस बात पर है कि आत्ममंथन की बात कहने वाले सतीश महाना आगे क्या फैसला लेते हैं और सदन की गरिमा बहाल करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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