- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- डायलिसिस से जूझ रही...
उत्तर प्रदेश
डायलिसिस से जूझ रही पत्नी के लिए आगे आए संजय, किडनी दान से मिली नई उम्मीद
nidhi
29 Oct 2026 10:25 AM IST

x
पत्नी की जिंदगी संवारने के लिए पति ने दी किडनी
ग्रेटर नोएडा: करवाचौथ से पहले एक दंपती की कहानी जीवनसाथी के प्रति सहयोग और समर्पण की मिसाल बनकर सामने आई है। किडनी फेलियर से जूझ रही 32 वर्षीय रूबी को उनके 46 वर्षीय पति संजय ने अपनी एक किडनी दान की। दोनों का ब्लड ग्रुप अलग होने के कारण प्रत्यारोपण चुनौतीपूर्ण था। विशेषज्ञों की टीम ने विशेष तैयारी के बाद शारदाकेयर हेल्थसिटी में ट्रांसप्लांट किया। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उपचार के बाद दोनों को स्थिर हालत में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। रूबी नियमित हीमोडायलिसिस पर निर्भर थीं। डॉक्टरों ने उनके लिए किडनी प्रत्यारोपण का विकल्प बताया था। पति का ब्लड ग्रुप ए पॉजिटिव और पत्नी का बी पॉजिटिव होने से अतिरिक्त तैयारी की जरूरत पड़ी। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रत्यारोपण से पहले रूबी को डीसेंसिटाइजेशन उपचार दिया गया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य प्रत्यारोपित अंग के खिलाफ शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का खतरा कम करना था।
इलाज के कठिन दौर में पति बने सहारा
रूबी ने डायलिसिस के समय को अपने जीवन का कठिन दौर बताया। उन्होंने पति के फैसले और डॉक्टरों के उपचार के प्रति आभार जताया। संजय के अनुसार, पत्नी को बीमारी से जूझते देखना उनके लिए मुश्किल था और उनकी बेहतर होती सेहत सबसे बड़ी खुशी है। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद दंपती के लिए यह करवाचौथ नई उम्मीद लेकर आया है। अंगदान का यह निर्णय भावनात्मक होने के साथ चिकित्सकीय मूल्यांकन से जुड़ा होता है। दाता की इच्छा महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके स्वास्थ्य और भविष्य के जोखिमों की जांच भी उतनी ही जरूरी है। किसी दूसरे मरीज के लिए यही विकल्प उपयुक्त होगा या नहीं, इसका फैसला उसकी ट्रांसप्लांट टीम करती है।
अलग ब्लड ग्रुप में कैसे संभव होता है प्रत्यारोपण?
सामान्य चिकित्सा जानकारी के अनुसार, कुछ मरीजों में अलग ब्लड ग्रुप वाले दाता से भी किडनी प्रत्यारोपण किया जा सकता है। इसे एबीओ-असंगत किडनी ट्रांसप्लांट कहा जाता है। हालांकि, इसके लिए सामान्य प्रत्यारोपण से अतिरिक्त तैयारी और निगरानी की जरूरत हो सकती है। मेयो क्लिनिक के अनुसार, ऐसे प्रत्यारोपण में ऑपरेशन से पहले और बाद में उपचार देकर रक्त में एंटीबॉडी का स्तर कम करने तथा दाता की किडनी को अस्वीकार किए जाने का जोखिम घटाने का प्रयास किया जाता है। इसलिए केवल ब्लड ग्रुप अलग होना हर परिस्थिति में प्रत्यारोपण असंभव होने का अर्थ नहीं है।
इस प्रक्रिया की उपलब्धता का मतलब यह भी नहीं कि जोखिम समाप्त हो जाता है। मरीज की जांच, एंटीबॉडी की स्थिति और अन्य चिकित्सकीय तथ्यों के आधार पर विशेषज्ञ उपचार की योजना बनाते हैं। एक सफल मामले को सभी मरीजों के लिए समान परिणाम की गारंटी के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
ऑपरेशन के बाद भी जारी रहती है देखभाल
किडनी प्रत्यारोपण उपचार का महत्वपूर्ण चरण है, लेकिन इसके बाद नियमित देखभाल की जरूरत बनी रहती है। अमेरिकी राष्ट्रीय मधुमेह, पाचन एवं किडनी रोग संस्थान यानी एनआईडीडीके के अनुसार, शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली नई किडनी को बाहरी अंग समझकर उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया कर सकती है। इसे रोकने के लिए निर्धारित दवाएं लेना आवश्यक होता है। अस्पताल से लौटने के बाद नियमित फॉलोअप और जांच से नई किडनी की कार्यक्षमता तथा दवाओं के असर पर नजर रखी जाती है। मरीज को दवाओं का समय और मात्रा अपनी ओर से नहीं बदलनी चाहिए। उपचार संबंधी बदलाव चिकित्सकीय टीम की सलाह से ही किए जाते हैं। इसलिए अस्पताल से छुट्टी मिलना देखभाल पूरी हो जाने के बराबर नहीं है। घर पर दवाएं समय से लेना, तय जांच कराना और डॉक्टर से संपर्क बनाए रखना आगे की प्रक्रिया का हिस्सा है। परिवार का सहयोग इन व्यवस्थाओं को निभाने में उपयोगी हो सकता है।
दाता का स्वास्थ्य भी बराबर महत्वपूर्ण
किडनी प्राप्त करने वाले मरीज के साथ दाता की देखभाल पर भी ध्यान दिया जाता है। जीवित किडनी दाताओं के मूल्यांकन संबंधी केडीआईजीओ दिशानिर्देश व्यक्तिगत स्वास्थ्य, संभावित जोखिमों और दान के बाद फॉलोअप की योजना पर जोर देते हैं। दाता को प्रक्रिया और उसके प्रभाव समझाकर स्वतंत्र निर्णय लेने का अवसर मिलना चाहिए। जीवनसाथी के प्रति प्रेम को अंगदान की अनिवार्यता से जोड़ना उचित नहीं होगा। हर व्यक्ति चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त दाता नहीं होता। मदद के दूसरे रूप—इलाज में साथ देना, अस्पताल की व्यवस्थाएं संभालना और मरीज का भावनात्मक सहयोग करना—भी महत्वपूर्ण हैं।
त्योहार के बीच नई उम्मीद की कहानी
रूबी और संजय का मामला परिवार के सहयोग तथा विशेषज्ञ उपचार की भूमिका सामने लाता है। पत्नी की बीमारी के बीच पति आगे आए और चिकित्सकों ने अलग ब्लड ग्रुप की चुनौती को ध्यान में रखकर उपचार किया। करवाचौथ से पहले सामने आई इस कहानी में सबसे महत्वपूर्ण बात रूबी की बेहतर सेहत और दोनों का सुरक्षित घर लौटना है। आगे नियमित चिकित्सा देखभाल के साथ यह दंपती जीवन की नई दिनचर्या की ओर बढ़ सकेगा। प्रत्यारोपण से जुड़े निर्णय और उसके बाद की सावधानियां उनकी उपचार टीम के मार्गदर्शन में ही रहेंगी।
Next Story





