- Home
- /
- राज्य
- /
- उत्तर प्रदेश
- /
- दिन में आराम, रात में...
दिन में आराम, रात में चिकन पार्टी वन विभाग के मेहमान बने 6 उल्लू

बिजनौर। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में वन विभाग के छह अनोखे मेहमान इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रहे हैं। ये मेहमान कोई इंसान नहीं, बल्कि उल्लू के छह नन्हे बच्चे हैं, जिनकी खातिरदारी में वन विभाग के कर्मचारी जुटे हुए हैं। इन बच्चों की खास बात यह है कि ये प्रतिदिन करीब एक किलो चिकन-मटन खा रहे हैं। दिनभर शांत रहने वाले ये नन्हे पक्षी रात होते ही सक्रिय हो जाते हैं और उनके सामने रखा भोजन कुछ ही समय में खत्म हो जाता है। करीब ढाई महीने की उम्र के ये उल्लू फिलहाल वन विभाग के रेंज कार्यालय में सुरक्षित हैं, जहां उनकी देखभाल की जा रही है।
मामला बिजनौर की कृष्ण विहार कॉलोनी का है। यहां कुछ दिन पहले एक मकान में उल्लू के छह बच्चे मिलने से परिवार के लोग हैरान रह गए थे। मकान मालिक ने तत्काल इसकी सूचना वन विभाग को दी। मौके पर पहुंची टीम ने सभी छह बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला और अपने साथ रेंज कार्यालय ले आई। अब इनकी देखभाल के साथ खानपान का विशेष इंतजाम किया गया है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सभी बच्चे स्वस्थ हैं और तेजी से विकसित हो रहे हैं।
घर की बंद खिड़की से आई आवाज तो खुला राज
जानकारी के अनुसार, कृष्ण विहार कॉलोनी निवासी जगदीश कुमार के घर में साफ-सफाई और मरम्मत का काम चल रहा था। इसी दौरान घर के एक झरोखे में जाली लगा दी गई थी। परिवार को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उसके अंदर उल्लू के बच्चे मौजूद हैं।
बताया गया कि इस स्थान से उल्लू के माता-पिता अपने बच्चों के पास आते-जाते थे। जाली लगने के कारण उनका अंदर पहुंचना बंद हो गया। कुछ समय बाद घर के भीतर से पक्षियों की आवाज आने लगी। शुरुआत में परिवार ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन आवाज लगातार तेज होने पर जांच की गई।
जब परिवार के सदस्यों ने ऊंचाई पर बने स्थान को देखा तो वहां उल्लू के छह बच्चे मौजूद थे। यह देखकर सभी हैरान रह गए। इसके बाद जगदीश कुमार ने वन विभाग को सूचना दी। सूचना मिलने पर वनकर्मी मौके पर पहुंचे और बच्चों को सुरक्षित निकाल लिया।
पहले आधा किलो चिकन मिला, फिर बढ़ानी पड़ी खुराक
वन विभाग के कार्यालय में पहुंचने के बाद इन बच्चों के भोजन की व्यवस्था की गई। शुरुआत में सभी छह बच्चों को मिलाकर आधा किलो चिकन दिया गया, जिसे उन्होंने पूरा खा लिया। इसके बाद उनकी खुराक बढ़ाकर करीब एक किलो प्रतिदिन कर दी गई।
कर्मचारी चिकन को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर बच्चों के सामने रखते हैं। खास बात यह है कि भोजन शाम के समय रख दिया जाता है, लेकिन बच्चे अंधेरा होने के बाद ही उसे खाना शुरू करते हैं।
वन विभाग के अनुसार, इन छह बच्चों में चार नर और दो मादा हैं। सभी की उम्र करीब ढाई महीने बताई जा रही है। पर्याप्त भोजन और देखभाल के कारण इनका शारीरिक विकास हो रहा है।
दिन में आराम, रात में शुरू होती है दावत
उल्लू की पहचान एक निशाचर पक्षी के रूप में होती है। इसका मतलब है कि ये पक्षी मुख्य रूप से रात के समय सक्रिय रहते हैं। बिजनौर में रेस्क्यू किए गए बच्चों में भी यही प्राकृतिक व्यवहार देखने को मिल रहा है।
दिन में अधिकांश समय ये शांत रहते हैं, जबकि रात होते ही सक्रिय होकर भोजन करने लगते हैं। वन विभाग के कर्मचारियों को भी इनकी प्राकृतिक दिनचर्या के अनुसार भोजन की व्यवस्था करनी पड़ रही है।
वन अधिकारियों का कहना है कि उल्लू मांसाहारी पक्षी होते हैं। प्राकृतिक वातावरण में ये चूहे, छिपकलियां और दूसरे छोटे जीवों का शिकार करते हैं। फिलहाल रेस्क्यू किए गए बच्चों को उपलब्ध कराए जा रहे मांसाहारी भोजन से उनकी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है।
बार्न आउल प्रजाति के हैं सभी छह बच्चे
वन विभाग के अनुसार, सभी छह बच्चे बार्न आउल यानी खलिहानी उल्लू प्रजाति के हैं। इस प्रजाति के उल्लुओं की पहचान उनके दिल के आकार जैसे चेहरे और हल्के रंग के पंखों से की जाती है।
बार्न आउल सामान्यतः पुराने भवनों, पेड़ों की खोखली जगहों और ऐसे सुरक्षित स्थानों में घोंसला बनाते हैं, जहां मानवीय गतिविधियां कम होती हैं।
पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी इन पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विशेष रूप से चूहों जैसे छोटे जीवों की संख्या नियंत्रित करने में उल्लू उपयोगी माने जाते हैं। यही वजह है कि वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से इनकी सुरक्षा महत्वपूर्ण है।
वन विभाग ने की रेस्क्यू सेंटर भेजने की तैयारी
बिजनौर के क्षेत्रीय वनाधिकारी महेशचंद्र गौतम के अनुसार, सभी छह उल्लू के बच्चे सुरक्षित हैं और नियमित रूप से भोजन कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें रेंज कार्यालय में रखा गया है।
वन विभाग की योजना इन बच्चों को रेस्क्यू सेंटर भेजने की है। वहां विशेषज्ञों की निगरानी में उनकी देखभाल की जा सकेगी। उड़ने और स्वतंत्र रूप से जीवनयापन करने की क्षमता विकसित होने के बाद उन्हें प्राकृतिक आवास में छोड़ने पर निर्णय लिया जाएगा।
अधिकारियों के मुताबिक, इनकी उम्र अभी कम है। ऐसे में इन्हें तुरंत खुले वातावरण में छोड़ने के बजाय आवश्यक देखभाल देना जरूरी है।
परिवार की सतर्कता से बच गईं छह नन्हीं जानें
इस घटना में मकान मालिक और उनके परिवार की सतर्कता भी महत्वपूर्ण रही। घर से आ रही आवाजों को अनदेखा करने के बजाय उन्होंने उसकी वजह जानने की कोशिश की और वन विभाग को सूचना दी।
वन्यजीवों के जानकारों के अनुसार, घर में किसी पक्षी या वन्यजीव के बच्चे मिलने पर उन्हें खुद पकड़ने या मनमाना भोजन देने से बचना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में वन विभाग अथवा प्रशिक्षित वन्यजीव बचाव दल की सहायता लेना बेहतर होता है।
फिलहाल बिजनौर के ये छह नन्हे उल्लू वन विभाग के खास मेहमान बने हुए हैं। प्रतिदिन करीब एक किलो चिकन-मटन की खुराक और रात में भोजन करने की अनोखी आदत के कारण यह मामला चर्चा में है। अब इन बच्चों के स्वस्थ विकास और सुरक्षित पुनर्वास पर वन विभाग का ध्यान केंद्रित है।





