उत्तर प्रदेश

मजदूर आंदोलन केस में आकृति चौधरी को राहत हाईकोर्ट ने NSA किया रद्द

Ratna Netam
2 Sept 2026 9:19 PM IST
मजदूर आंदोलन केस में आकृति चौधरी को राहत हाईकोर्ट ने NSA किया रद्द
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प्रयागराज/नोएडा। अप्रैल 2026 में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन से जुड़े मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास की पढ़ाई कर चुकीं **25 वर्षीय आकृति चौधरी** को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने आकृति के खिलाफ **राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA)** के तहत की गई एहतियाती हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने मामले में राज्य की ओर से पेश किए गए घटनाक्रम और रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि आकृति किसी अन्य मामले में हिरासत के लिए जरूरी नहीं हैं तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
जस्टिस **अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव** की खंडपीठ ने आकृति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने NSA के तहत उनकी हिरासत के आधार को स्वीकार नहीं किया और राज्य के मामले को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक हाईकोर्ट ने इसे राज्य की ओर से बनाई गई 'मनगढ़ंत कहानी' तक कहा।
करीब पांच महीने से हिरासत में थीं आकृति
आकृति चौधरी पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक हैं। उन्हें अप्रैल में नोएडा के औद्योगिक मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था।
मजदूर बेहतर वेतन और कामकाज की बेहतर परिस्थितियों की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे। बाद में विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा, पथराव और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने इसके बाद कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की।
आकृति मजदूरों के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल हुई थीं। पुलिस का आरोप था कि उन्होंने मजदूरों को भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके बाद सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई।
आकृति ने इन आरोपों को चुनौती देते हुए कहा था कि वह एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में मजदूरों के समर्थन में प्रदर्शन में शामिल हुई थीं और आंदोलन की आयोजक नहीं थीं।
13 मई को लगाया गया था NSA
नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत भी कार्रवाई की थी।
रिपोर्ट के मुताबिक **13 मई 2026** को आकृति और पत्रकार-कार्यकर्ता सत्यम वर्मा के खिलाफ NSA लगाया गया था।
NSA के तहत प्रशासन किसी व्यक्ति को कुछ परिस्थितियों में एहतियाती हिरासत में रख सकता है। लेकिन ऐसी कार्रवाई के लिए कानूनी प्रक्रिया और पर्याप्त आधार का होना जरूरी होता है।
आकृति ने इसी हिरासत को इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए चुनौती दी थी।
उनकी याचिका में कहा गया कि हिरासत के आधार पर लगाए गए आरोप अस्पष्ट, व्यापक और सामान्य प्रकृति के हैं तथा उनमें ठोस विवरण का अभाव है।
गिरफ्तारी के घटनाक्रम पर कोर्ट ने उठाए सवाल
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में आकृति की गिरफ्तारी और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS के तहत जारी किए गए नोटिस का क्रम रहा।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि आकृति को **12 अप्रैल 2026 को सुबह 10:56 बजे** गिरफ्तार किया गया था और उन्हें BNSS के तहत नोटिस दिया गया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और जनरल डायरी की प्रविष्टियों की जांच करते हुए घटनाओं के क्रम पर सवाल खड़े किए।
अदालत ने यह जानना चाहा कि आकृति को शांति बनाए रखने से जुड़ी आवश्यक प्रक्रिया के तहत पहले नोटिस क्यों नहीं दिया गया।
राज्य की ओर से अदालत में बताया गया कि BNSS की धारा 126 के तहत नोटिस नहीं दिया गया था और धारा 130 के तहत नोटिस दिया गया था। अदालत ने इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए क्योंकि धारा 130 की कार्रवाई से पहले संबंधित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक था।
'पहले गिरफ्तारी फिर नोटिस कैसे?'
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड में दर्ज समय और घटनाओं के क्रम की भी जांच की।
कोर्ट के सामने मौजूद रिकॉर्ड से यह संकेत मिला कि आकृति को नोटिस तैयार होने से पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।
इसी आधार पर अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए घटनाक्रम पर सवाल उठाए।
अदालत का जोर इस बात पर था कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाली कार्रवाई में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया जाना चाहिए।
आकृति के मामले में कोर्ट ने इन्हीं प्रक्रियागत पहलुओं की गहराई से जांच की।
कोर्ट ने पूछा- हिंसा के लिए उकसाने का वीडियो कहां है?
आकृति के खिलाफ पुलिस का मुख्य आरोप था कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इस दावे के समर्थन में ठोस सबूत मांगे।
1 सितंबर की सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से पूछा था कि जिस वीडियो फुटेज को आकृति के खिलाफ महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया जा रहा है उसमें वह आखिर कहां लोगों को **पथराव या वाहनों में आग लगाने** के लिए उकसाती दिखाई दे रही हैं।
अदालत ने पूछा कि रिकॉर्ड में ऐसी क्या सामग्री मौजूद है जिससे यह साबित हो सके कि आकृति ने लोगों को बुलाकर पत्थर फेंकने या वाहनों में आग लगाने के लिए कहा था।
राज्य सरकार ने गवाहों के बयानों और आरोपपत्र का उल्लेख किया।
इसके बाद कोर्ट ने पूछा कि जब प्रदर्शन की वीडियोग्राफी हुई थी तो संबंधित फुटेज अदालत के सामने क्यों नहीं है।
सरकार ने मांगा समय, कोर्ट ने किया इनकार
राज्य सरकार की ओर से वीडियो फुटेज पेश करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया।
लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए ज्यादा समय देने से इनकार कर दिया कि आकृति पहले ही करीब **पांच महीने से जेल में हैं**।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि इतने लंबे समय से हिरासत में रखे गए व्यक्ति के खिलाफ यदि ठोस साक्ष्य मौजूद हैं तो उन्हें अदालत के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि संबंधित मामलों में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है।
इस पर अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह भी देखा जा सकता था कि गवाहों के बयानों में आकृति की कथित भूमिका किस तरह दर्ज है।
हिंसा गिरफ्तारी के बाद हुई? कोर्ट ने पूछा सवाल
सुनवाई के दौरान एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया।
राज्य सरकार के मुताबिक 11 अप्रैल को लोग नोएडा में प्रदर्शन के लिए एकत्र हुए थे। लेकिन अदालत ने घटनाओं की समयरेखा को देखते हुए कहा कि उस दिन हिंसा नहीं हुई थी।
रिपोर्टों के मुताबिक कोर्ट ने इस तथ्य की तरफ भी ध्यान दिलाया कि जिस हिंसा को आधार बनाकर आकृति की भूमिका बताई जा रही थी, उसका समय उनकी गिरफ्तारी के बाद का दिखाई देता है।
यही कारण है कि अदालत ने राज्य से पूछा कि ऐसी कौन सी सामग्री है जिससे आकृति को बाद की हिंसक घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
NSA के तहत हिरासत रद्द
दोनों पक्षों को सुनने और रिकॉर्ड की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने आकृति चौधरी के खिलाफ **NSA के तहत जारी डिटेंशन ऑर्डर को रद्द कर दिया।**
अदालत ने कहा कि यदि किसी अन्य मामले में आकृति की हिरासत आवश्यक नहीं है तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि NSA के तहत हिरासत सामान्य आपराधिक मुकदमे से अलग एहतियाती कार्रवाई होती है।
हाईकोर्ट ने माना कि मौजूदा मामले में जिस आधार पर यह कार्रवाई की गई थी वह न्यायिक कसौटी पर कायम नहीं रह सकी।
5 लाख रुपये मुआवजे का भी आदेश
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू मुआवजे का है।
आकृति की ओर से पेश वकीलों के अनुसार हाईकोर्ट ने उन्हें **5 लाख रुपये का मुआवजा** देने का निर्देश भी दिया है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि यह राशि उन अधिकारियों से वसूले जाने की बात कही गई है जिन्होंने NSA की कार्रवाई को मंजूरी दी थी।
हिंदुस्तान की रिपोर्ट में कहा गया है कि अदालत ने मुआवजे की रकम संबंधित जिलाधिकारी की सैलरी से वसूलने का निर्देश दिया।
हालांकि अलग-अलग शुरुआती रिपोर्टों में मुआवजे को लेकर विसंगति भी दिखाई देती है। एक समाचार एजेंसी की रिपोर्ट में रकम 5,000 रुपये बताई गई है, जबकि कई कानूनी और राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट इसे **5 लाख रुपये** बता रही हैं। इसलिए लिखित आदेश के पूर्ण विवरण से इस पहलू की अंतिम स्थिति और स्पष्ट होगी।
क्या NSA हटते ही जेल से बाहर आ जाएंगी आकृति?
यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति समझना जरूरी है।
NSA के तहत हिरासत रद्द होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि आकृति तत्काल जेल से बाहर आ जाएंगी।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक नोएडा मजदूर आंदोलन से जुड़े दूसरे आपराधिक मामलों में उन्हें अभी जमानत मिलना बाकी है, इसलिए वह फिलहाल हिरासत में रह सकती हैं।
वहीं हाईकोर्ट का आदेश है कि यदि किसी दूसरे मामले में उनकी गिरफ्तारी या हिरासत जरूरी नहीं है तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।
रिपोर्ट के मुताबिक ग्रेटर नोएडा की सत्र अदालत उनकी चार जमानत अर्जियों में से तीन को खारिज कर चुकी थी, जबकि एक मामले में राहत मिली थी। इसके बाद आकृति ने सुप्रीम कोर्ट का भी रुख किया था, जहां से उन्हें हाईकोर्ट जाने की सलाह मिली थी।
इसलिए उनकी वास्तविक रिहाई दूसरे लंबित मामलों में जमानत की स्थिति पर निर्भर करेगी।
आकृति की तरफ से कौन लड़ा मामला?
हाईकोर्ट में आकृति चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता **कॉलिन गोंसाल्वेस** और अधिवक्ता **चार्ली प्रकाश** पेश हुए।
आकृति की तरफ से अदालत में तर्क दिया गया कि उन्होंने मजदूर आंदोलन में एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर हिस्सा लिया था और वह प्रदर्शन की आयोजक नहीं थीं।
उनका पक्ष था कि NSA के तहत हिरासत के लिए जो आरोप लगाए गए वे पर्याप्त रूप से विशिष्ट नहीं थे।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच और राज्य से सबूत मांगने के बाद आखिरकार NSA की कार्रवाई को निरस्त कर दिया।
नोएडा मजदूर आंदोलन से जुड़ा था मामला
यह पूरा विवाद अप्रैल 2026 में नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के आंदोलन से शुरू हुआ था।
कामगार बेहतर वेतन और कामकाज की स्थितियों में सुधार की मांग कर रहे थे। आंदोलन के दौरान बाद में हिंसा, पथराव और आगजनी की घटनाएं हुईं और पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए।
आकृति चौधरी और पत्रकार-कार्यकर्ता सत्यम वर्मा समेत कई लोगों पर हिंसा भड़काने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने के आरोप लगाए गए।
इन आरोपों का अंतिम निर्धारण संबंधित आपराधिक मामलों की न्यायिक प्रक्रिया में होगा। हाईकोर्ट का मौजूदा फैसला विशेष रूप से आकृति के खिलाफ **NSA के तहत की गई एहतियाती हिरासत** की वैधता पर है; इसे उनके खिलाफ सभी आपराधिक मामलों के अंतिम निपटारे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
फिलहाल इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से आकृति चौधरी को NSA मामले में बड़ी राहत मिली है। अदालत ने करीब पांच महीने की हिरासत के बाद राज्य के सबूतों, गिरफ्तारी की प्रक्रिया और घटनाओं की समयरेखा पर सवाल उठाते हुए डिटेंशन ऑर्डर रद्द कर दिया है। अब उनकी जेल से वास्तविक रिहाई इस बात पर निर्भर करेगी कि नोएडा मजदूर आंदोलन से जुड़े बाकी मामलों में उन्हें जमानत मिलती है या नहीं।
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