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उद्योगों के CEMS आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल, कैलिब्रेशन और रखरखाव में मिली खामियां

लखनऊ। प्रदेश में उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाले प्रदूषण पर नजर रखने के लिए लगाए गए सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली यानी सीईएमएस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि अधिकतर उद्योगों में सिस्टम तो लगे हुए हैं, लेकिन उनके कैलिब्रेशन, रखरखाव और आंकड़ों के सत्यापन की व्यवस्था में गंभीर कमियां हैं। ऐसी स्थिति में इनसे प्राप्त आंकड़ों को फिलहाल नियामकीय कार्रवाई का पूरी तरह भरोसेमंद आधार मानना मुश्किल बताया गया है।
सीईएमएस का उद्देश्य उद्योगों से होने वाले उत्सर्जन की लगातार निगरानी करना है। इससे चिमनी से निकलने वाली गैसों और प्रदूषक तत्वों के स्तर का नियमित रिकॉर्ड तैयार होता है। सामान्य तौर पर ऐसी व्यवस्था इसलिए जरूरी मानी जाती है ताकि प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को वास्तविक समय के करीब जानकारी मिल सके और मानकों से अधिक उत्सर्जन होने पर संबंधित उद्योग के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
अध्ययन में हालांकि यह पाया गया कि सिस्टम के मौजूद होने भर से विश्वसनीय निगरानी सुनिश्चित नहीं हो रही है। कई जगह उपकरणों का समय पर अंशांकन नहीं किया गया, जिससे यह आशंका बढ़ती है कि दर्ज किए जा रहे आंकड़े वास्तविक उत्सर्जन स्तर से अलग हो सकते हैं।
कैलिब्रेशन किसी भी निगरानी उपकरण की सटीकता के लिए महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। यदि सेंसर और अन्य उपकरण तय अवधि में जांचे और समायोजित नहीं किए जाएं तो समय के साथ उनकी रीडिंग में अंतर आ सकता है।
अध्ययन में यही चिंता सामने आई है कि कुछ उद्योगों में सिस्टम लंबे समय से चालू तो हैं, लेकिन उनकी तकनीकी शुद्धता की नियमित जांच की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
रखरखाव से जुड़ी कमियां भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आई हैं। सीईएमएस उपकरण औद्योगिक वातावरण में लगातार काम करते हैं, जहां तापमान, धूल और अन्य परिस्थितियों का असर उन पर पड़ सकता है। ऐसे में नियमित सर्विसिंग, सेंसर की जांच और खराब पुर्जों को समय पर बदलना जरूरी होता है।
यदि सिस्टम का रखरखाव ठीक से न हो तो वह डेटा तो देता रह सकता है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। यही वजह है कि अध्ययन में केवल उपकरण की मौजूदगी नहीं बल्कि उसके संचालन की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा आंकड़ों के सत्यापन का है। अध्ययन में कहा गया है कि सीईएमएस से आने वाले डेटा का स्वतंत्र और नियमित सत्यापन पर्याप्त स्तर पर नहीं हो रहा है।
यदि किसी उद्योग द्वारा भेजे जा रहे आंकड़ों की समय-समय पर दूसरी तकनीकी विधि से तुलना नहीं की जाती तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि ऑनलाइन डेटा सही है या नहीं।
प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था में आंकड़ों की विश्वसनीयता सबसे अहम होती है। किसी उद्योग पर कार्रवाई करनी हो, नोटिस जारी करना हो या उत्सर्जन सीमा का उल्लंघन तय करना हो तो तकनीकी रिकॉर्ड का मजबूत होना जरूरी है।
ऐसे में यदि मूल डेटा पर ही संदेह हो तो पूरी नियामकीय प्रक्रिया कमजोर पड़ सकती है। अध्ययन में इसी स्थिति को लेकर चिंता जताई गई है।
यह भी सामने आया है कि कई उद्योग सीईएमएस के जरिए लगातार डेटा भेज रहे हैं, लेकिन इस डेटा की गुणवत्ता सभी जगह समान नहीं है।
कुछ जगह उपकरणों की तकनीकी स्थिति बेहतर है, जबकि कुछ स्थानों पर रखरखाव और सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर है। इससे पूरे सिस्टम की एकरूपता प्रभावित होती है।
अध्ययन का निष्कर्ष यह संकेत देता है कि केवल सीईएमएस इंस्टॉल कर देना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ एक मजबूत तकनीकी निगरानी व्यवस्था भी जरूरी है।
इसमें नियमित कैलिब्रेशन, समयबद्ध रखरखाव, डेटा ऑडिट और स्वतंत्र सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं को शामिल करना होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण निगरानी से जुड़ी तकनीक तभी प्रभावी हो सकती है जब उसकी रीडिंग पर नियामक संस्था और आम जनता दोनों भरोसा कर सकें।
यदि अलग-अलग उद्योगों में अलग गुणवत्ता के उपकरण या अलग रखरखाव मानक होंगे तो आंकड़ों की तुलना करना भी मुश्किल हो जाएगा।
अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि सीईएमएस से मिलने वाले आंकड़ों को नियामकीय कार्रवाई का आधार बनाने से पहले उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करना जरूरी है।
अगर डेटा गलत या अधूरा हुआ तो किसी उद्योग के वास्तविक प्रदूषण स्तर का सही आकलन नहीं हो सकेगा।
इसका एक असर यह भी हो सकता है कि मानक से अधिक उत्सर्जन करने वाला उद्योग रिकॉर्ड में सामान्य दिखाई दे या इसके उलट किसी तकनीकी त्रुटि के कारण गलत रीडिंग सामने आए।
दोनों ही स्थितियां प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था के लिए समस्या पैदा कर सकती हैं।
इसलिए अध्ययन में निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और तकनीकी मानकों के अनुपालन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत बताई गई है।
कैलिब्रेशन रिकॉर्ड का नियमित ऑडिट भी महत्वपूर्ण माना गया है। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि उपकरण की आखिरी तकनीकी जांच कब हुई थी और उसके बाद उसकी सटीकता का परीक्षण किया गया या नहीं।
रखरखाव का रिकॉर्ड भी निगरानी प्रणाली का हिस्सा होना चाहिए। यदि किसी सेंसर या उपकरण में खराबी आई हो तो उसे कितने समय में ठीक किया गया, इसकी जानकारी उपलब्ध रहनी चाहिए।
डेटा सत्यापन के लिए समय-समय पर मैनुअल या अन्य मानक विधियों से उत्सर्जन की जांच की जा सकती है। इससे ऑनलाइन सिस्टम के आंकड़ों की तुलना वास्तविक नमूनों से की जा सकेगी।
अध्ययन ने यह भी संकेत दिया है कि नियामक एजेंसियों के पास केवल डेटा प्राप्त करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि डेटा की गुणवत्ता पर नजर रखना भी जरूरी है।
यदि सीईएमएस पोर्टल पर लगातार रीडिंग आ रही है लेकिन तकनीकी जांच नहीं हो रही तो निगरानी अधूरी मानी जाएगी।
उद्योगों के लिए भी यह जरूरी है कि वे सिस्टम को केवल अनुपालन की औपचारिकता न मानें। उपकरणों का सही संचालन और समय पर रखरखाव उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।
प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को भी नियमित निरीक्षण के दौरान सीईएमएस की कार्यक्षमता की जांच करने की जरूरत होगी।
अध्ययन में सामने आई खामियों के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि मौजूदा डेटा के आधार पर पूर्व में की गई नियामकीय कार्रवाइयों की विश्वसनीयता कितनी मजबूत है।
हालांकि हर उद्योग या हर रीडिंग को गलत मानना उचित नहीं होगा, लेकिन सिस्टम में व्यापक तकनीकी खामियां मिलने से सुधार की जरूरत साफ दिखाई देती है।
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती निगरानी प्रणाली को तकनीकी रूप से मजबूत बनाना है। जब तक कैलिब्रेशन, रखरखाव और सत्यापन की व्यवस्था व्यवस्थित नहीं होती, तब तक सीईएमएस डेटा पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
प्रदेश में उद्योगों की संख्या और औद्योगिक गतिविधियों को देखते हुए प्रदूषण निगरानी की मजबूत व्यवस्था बेहद जरूरी है।
सीईएमएस जैसी तकनीक इस काम में उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसकी सफलता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि उपकरण सही काम कर रहे हैं या नहीं।
अध्ययन के निष्कर्षों ने साफ कर दिया है कि तकनीक लगाने के बाद भी नियमित निगरानी, जांच और सत्यापन उतने ही जरूरी हैं।
अब जरूरत है कि संबंधित विभाग और उद्योग मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें हर रीडिंग तकनीकी रूप से भरोसेमंद हो और उसे नियामकीय कार्रवाई के लिए सुरक्षित आधार माना जा सके।
फिलहाल अध्ययन ने यही संकेत दिया है कि मौजूदा स्थिति में कई उद्योगों से मिल रहे सीईएमएस आंकड़ों को सीधे अंतिम और पूर्ण सत्य मानना उचित नहीं होगा। पहले सिस्टम की तकनीकी खामियों को दूर करना और डेटा की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना जरूरी है।





