उत्तर प्रदेश

करेंसी चेस्ट के 17 करोड़ जाली नोट केस में कर्मचारी की भूमिका पर उठे सवाल

Ratna Netam
11 Sept 2026 6:44 PM IST
करेंसी चेस्ट के 17 करोड़ जाली नोट केस में कर्मचारी की भूमिका पर उठे सवाल
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सहारनपुर : PNB करेंसी चेस्ट से जुड़े करीब 17 करोड़ रुपये के कथित जाली नोट मामले में जांच आगे बढ़ने के साथ चौंकाने वाली जानकारियां सामने आने का दावा किया जा रहा है। मामले में सबसे ज्यादा सवाल उस कर्मचारी की आर्थिक गतिविधियों को लेकर उठ रहे हैं, जिसकी मासिक तनख्वाह कथित तौर पर महज 11 हजार रुपये थी, लेकिन उसने करीब 15 हजार रुपये महीने पर अपना ड्राइवर रख रखा था। यानी जितनी उसकी बताई जा रही सैलरी थी, उससे ज्यादा रकम वह अकेले ड्राइवर को देने में खर्च कर रहा था। यही आर्थिक असमानता अब जांच में महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा रही है।**
करेंसी चेस्ट जैसे बेहद संवेदनशील बैंकिंग सिस्टम से करोड़ों रुपये के संदिग्ध नोटों का मामला सामने आना अपने आप में गंभीर है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि कथित जाली नोट कहां से आए, उन्हें असली नोटों के बीच कैसे शामिल किया गया और क्या इस पूरे खेल में एक से ज्यादा लोगों की भूमिका थी।
11 हजार वेतन लेकिन 15 हजार का ड्राइवर
जांच में सामने आई सबसे हैरान करने वाली बात कर्मचारी की आय और खर्च के बीच कथित अंतर है।
बताया जा रहा है कि कर्मचारी को करीब 11 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। इसके बावजूद उसने लगभग 15 हजार रुपये महीने पर निजी ड्राइवर रखा हुआ था।
सवाल स्वाभाविक है कि अगर उसकी घोषित आमदनी केवल 11 हजार रुपये थी तो उससे ज्यादा रकम वह ड्राइवर को कैसे दे रहा था?
उसके अपने परिवार और रोजमर्रा के खर्च अलग थे।
यही कारण है कि जांच एजेंसियां उसकी आय के अन्य संभावित स्रोतों की पड़ताल कर सकती हैं।
हालांकि केवल आय से ज्यादा खर्च दिखाई देना अपने आप किसी अपराध को साबित नहीं करता। इसके लिए बैंक रिकॉर्ड, संपत्ति, नकद लेनदेन और अन्य साक्ष्यों की जरूरत होगी।
17 करोड़ के जाली नोट का मामला
मामला PNB के करेंसी चेस्ट से जुड़े करीब 17 करोड़ रुपये के कथित जाली नोटों का बताया जा रहा है।
इतनी बड़ी रकम होने के कारण जांच का दायरा भी बड़ा हो गया है।
करेंसी चेस्ट में बड़ी मात्रा में नकदी रखी जाती है। यहां सुरक्षा के कई स्तर होते हैं और नोटों की गिनती तथा सत्यापन के लिए मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है।
ऐसी स्थिति में सवाल उठ रहा है कि अगर करोड़ों रुपये के नकली या संदिग्ध नोट सिस्टम में पहुंचे तो वे शुरुआती स्तर पर क्यों नहीं पकड़े गए।
यह भी जांच का विषय है कि नोट एक साथ आए या लंबे समय के दौरान धीरे-धीरे जमा किए गए।
क्या अकेला कर्मचारी कर सकता था इतना बड़ा खेल?
करीब 17 करोड़ रुपये की रकम को देखते हुए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी एक कर्मचारी के लिए इतना बड़ा कथित खेल करना संभव था।
करेंसी चेस्ट में आमतौर पर नकदी से जुड़ी प्रक्रियाओं में कई कर्मचारियों की जिम्मेदारियां तय होती हैं।
कैश जमा करने, निकालने, गिनने, मिलान करने और रिकॉर्ड तैयार करने के अलग-अलग चरण होते हैं।
इसलिए अगर सिस्टम में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है तो जांच में पूरी प्रक्रिया की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी।
यह देखा जाएगा कि किस कर्मचारी के पास किस स्तर की पहुंच थी और किन तारीखों पर संदिग्ध लेनदेन हुए।
ड्राइवर से भी मिल सकती हैं महत्वपूर्ण जानकारियां
15 हजार रुपये महीने पर रखे गए कथित निजी ड्राइवर की भूमिका भी जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है।
ड्राइवर को कर्मचारी की आवाजाही के बारे में जानकारी हो सकती है।
वह किन लोगों से मिलता था, कहां जाता था और किन स्थानों पर नियमित रूप से उसका आना-जाना था—ऐसी जानकारियां घटनाक्रम समझने में मदद कर सकती हैं।
हालांकि ड्राइवर होना अपने आप किसी अपराध में शामिल होने का प्रमाण नहीं है।
अगर उससे पूछताछ होती है तो उसका उद्देश्य कर्मचारी की गतिविधियों और संपर्कों की जानकारी जुटाना हो सकता है।
आय और खर्च का खंगाला जा सकता है रिकॉर्ड
ऐसे मामलों में वित्तीय जांच सबसे महत्वपूर्ण होती है।
संदिग्ध व्यक्ति के बैंक खातों की जांच से पता चल सकता है कि वेतन के अलावा उसके खाते में कितनी रकम आती थी।
बड़ी नकद जमा, अचानक हुए ट्रांसफर, महंगी खरीदारी या संपत्ति में निवेश जैसे लेनदेन महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इसके अलावा परिवार के सदस्यों या करीबी लोगों के खातों में हुए असामान्य लेनदेन को भी जांच के दायरे में लिया जा सकता है, अगर इसके लिए कानूनी आधार और साक्ष्य मौजूद हों।
11 हजार रुपये वेतन और 15 हजार रुपये के ड्राइवर वाली बात ने इसी वजह से जांचकर्ताओं का ध्यान खींचा है।
करेंसी चेस्ट क्या होता है?
आम बैंक शाखा और करेंसी चेस्ट में अंतर होता है।
करेंसी चेस्ट ऐसी सुरक्षित बैंकिंग सुविधा है जहां बड़ी मात्रा में नकदी रखी जाती है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से अधिकृत बैंक संचालित करते हैं।
इन चेस्ट का इस्तेमाल आसपास की बैंक शाखाओं में नकदी की जरूरत पूरी करने और अतिरिक्त नकदी जमा करने के लिए किया जाता है।
इस वजह से यहां करोड़ों रुपये की नकदी का आवागमन सामान्य बात है।
लेकिन इतनी संवेदनशील व्यवस्था में सुरक्षा और रिकॉर्ड की सटीकता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
नकली नोट पकड़ने की होती है व्यवस्था
बैंकों में नकली नोट पहचानने के लिए मशीनें और निर्धारित प्रक्रियाएं होती हैं।
नोटों के सुरक्षा फीचर जांचे जाते हैं और संदिग्ध नोट मिलने पर उसके लिए अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है।
अगर करोड़ों रुपये के नकली नोट किसी करेंसी चेस्ट से जुड़े पाए गए हैं तो यह केवल एक व्यक्ति की कथित भूमिका का मामला नहीं रह जाता, बल्कि आंतरिक नियंत्रण व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि नोटों की जांच किस स्तर पर हुई और रिकॉर्ड में उन्हें किस तरह दर्ज किया गया।
CCTV फुटेज बन सकती है बड़ी कड़ी
करेंसी चेस्ट जैसे संवेदनशील स्थानों पर CCTV निगरानी बेहद महत्वपूर्ण होती है।
अगर संबंधित अवधि की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है तो जांच में उससे कई सवालों के जवाब मिल सकते हैं।
किसने नकदी संभाली, कौन कर्मचारी किन क्षेत्रों में गया और संदिग्ध अवधि में कौन-कौन वहां मौजूद था—इसकी जानकारी CCTV से मिल सकती है।
हालांकि लंबे समय पुराने मामले में फुटेज की उपलब्धता डेटा रिटेंशन अवधि पर निर्भर करेगी।
मशीनों के लॉग भी हो सकते हैं महत्वपूर्ण
करेंसी चेस्ट में इस्तेमाल होने वाली नकदी गिनने और सत्यापित करने वाली मशीनों का रिकॉर्ड भी जांच में मदद कर सकता है।
अगर किसी मशीन ने संदिग्ध नोट पकड़े थे तो यह देखा जा सकता है कि उसके बाद कर्मचारियों ने क्या प्रक्रिया अपनाई।
क्या मशीन ने नोटों को संदिग्ध बताकर अलग किया था?
अगर हां तो वे बाद में कहां गए?
अगर मशीनों ने उन्हें नहीं पकड़ा तो नोटों की गुणवत्ता और मशीनों की कार्यक्षमता दोनों की जांच की जरूरत पड़ सकती है।
असली नोट कहां गए?
कथित जाली नोट मामले का सबसे महत्वपूर्ण सवाल केवल यह नहीं है कि नकली नोट कहां से आए।
अगर वे असली नोटों की जगह रखे गए थे तो असली नकदी कहां गई?
जांच के लिए यह पहलू बेहद अहम होगा।
अगर किसी ने असली नोट निकालकर उनकी जगह जाली नोट रखे तो असली रकम के अंतिम ठिकाने तक पहुंचना जरूरी होगा।
इतनी बड़ी राशि नकद में छिपाना आसान नहीं है।
इसलिए संपत्ति, निवेश, कारोबार और दूसरे वित्तीय लेनदेन की जांच से महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं।
क्या लंबे समय से चल रहा था खेल?
17 करोड़ रुपये जैसी बड़ी रकम को देखते हुए यह सवाल भी उठता है कि क्या कथित गड़बड़ी एक बार में हुई या लंबे समय से चल रही थी।
अगर छोटी-छोटी मात्रा में लगातार नोट बदले गए हों तो इसका पता लगाना ज्यादा कठिन हो सकता है।
इसके लिए पुराने रिकॉर्ड और दैनिक कैश मिलान की जांच करनी होगी।
किस तारीख से अंतर शुरू हुआ और कब सबसे ज्यादा रकम प्रभावित हुई, इसका विश्लेषण कथित घटनाक्रम की समयरेखा तैयार करने में मदद करेगा।
बैंक के आंतरिक ऑडिट पर भी सवाल
बैंकिंग व्यवस्था में नियमित आंतरिक ऑडिट महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
करेंसी चेस्ट जैसे संवेदनशील स्थानों पर नकदी और रिकॉर्ड का मिलान किया जाता है।
अगर कथित गड़बड़ी लंबे समय तक चली तो यह सवाल उठेगा कि ऑडिट में इसका पता क्यों नहीं चला।
क्या रिकॉर्ड में कोई हेरफेर किया गया?
क्या जांच के दौरान किसी असामान्य अंतर को नजरअंदाज किया गया?
या फिर संदिग्ध नोट इतनी गुणवत्ता वाले थे कि सामान्य जांच में पकड़ में नहीं आए?
इन सभी सवालों के जवाब विस्तृत जांच के बाद ही मिलेंगे।
मोबाइल और संपर्कों की जांच से खुल सकता है नेटवर्क
अगर जांचकर्ताओं को किसी कर्मचारी पर संदेह है तो उसके संपर्कों की पड़ताल महत्वपूर्ण हो सकती है।
कॉल रिकॉर्ड, डिजिटल लेनदेन और उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया के तहत दूसरे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य यह समझने में मदद कर सकते हैं कि वह किन लोगों के संपर्क में था।
जाली नोटों की इतनी बड़ी मात्रा का मामला किसी बड़े नेटवर्क से जुड़ा है या नहीं, इसका पता लगाना भी जरूरी होगा।
हालांकि जब तक जांच में प्रमाण नहीं मिलता तब तक किसी व्यक्ति या समूह को नेटवर्क का हिस्सा बताना उचित नहीं होगा।
जाली नोट कहां छपे यह सबसे बड़ा सवाल
अगर बरामद या पहचाने गए नोट वास्तव में नकली हैं तो उनकी फोरेंसिक जांच से कई महत्वपूर्ण बातें सामने आ सकती हैं।
नोट किस तरह के कागज पर बने हैं, सुरक्षा फीचर की कितनी सटीक नकल की गई और सीरियल नंबर का पैटर्न क्या है—इनसे स्रोत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
अगर अलग-अलग जगह पहले भी इसी प्रकार के नकली नोट मिले हों तो दोनों मामलों के बीच संभावित संबंध की जांच की जा सकती है।
यहीं से जांच करेंसी चेस्ट से बाहर निकलकर बड़े नेटवर्क तक पहुंच सकती है।
आरोपी का पक्ष भी जरूरी
मामले में जिस कर्मचारी की आय और खर्च को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उसका पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
हो सकता है उसके पास वेतन के अलावा वैध पारिवारिक आय, बचत या अन्य स्रोत हों।
15 हजार रुपये का ड्राइवर रखने की रकम किसी अन्य सदस्य द्वारा दी जाती हो, इसकी संभावना को भी बिना जांच खारिज नहीं किया जा सकता।
इसीलिए केवल जीवनशैली और वेतन के अंतर के आधार पर अपराध साबित नहीं किया जा सकता।
अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजी और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही निकलेगा।
जांच में कई परतें खुलना बाकी
करीब 17 करोड़ रुपये के कथित जाली नोट मामले में **11 हजार रुपये की सैलरी वाले कर्मचारी द्वारा 15 हजार रुपये में ड्राइवर रखने** का दावा निश्चित रूप से जांच का ध्यान खींचने वाला तथ्य है।
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि करेंसी चेस्ट जैसी सुरक्षित व्यवस्था तक इतनी बड़ी मात्रा में संदिग्ध नोट आखिर पहुंचे कैसे।
जांच में अब आय-व्यय, बैंक खाते, नकदी रिकॉर्ड, मशीन लॉग, उपलब्ध CCTV फुटेज और संबंधित कर्मचारियों की जिम्मेदारियों की कड़ियां जोड़ी जा सकती हैं।
अगर असली नोटों को कथित तौर पर जाली नोटों से बदला गया था तो असली रकम कहां गई, यह पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है।
फिलहाल जांच पूरी होने और अदालत में साक्ष्य पेश किए जाने से पहले आरोपों को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन करोड़ों रुपये की रकम और कर्मचारी की कथित आमदनी-खर्च के अंतर ने इस केस को बेहद गंभीर बना दिया है।
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