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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध में रहते हैं, तो बाद में शादी का वादा पूरा न होने भर से उसे आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-69 के तहत दर्ज एक मामले में ट्रायल कोर्ट में चल रही मुकदमे की कार्यवाही को रद्द कर दिया।
लीगढ़ के गांधी पार्क थाने का है, जहां जितेंद्र कुमार पर शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाने और गर्भपात कराने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई गई थी। साथ ही आरोपी के भाई और भाभी पर भी धमकी देने का आरोप लगाया गया था।
आरोपियों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर चार्जशीट, संज्ञान आदेश और ट्रायल कोर्ट की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई। याची पक्ष के वकील ने दलील दी कि पीड़िता और आरोपी के बीच पढ़ाई के समय से प्रेम संबंध थे और दोनों वयस्क हैं। आरोप लगाया गया कि पीड़िता ने आरोपी से 10 लाख रुपये की मांग की थी और रुपये न मिलने पर झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया।
वहीं, पीड़िता पक्ष की ओर से कहा गया कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाए।हाईकोर्ट ने कहा कि दोनों के बीच संबंध कॉलेज के दिनों से चले आ रहे थे और दोनों के बीच विवाह को लेकर आपसी सहमति भी थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि शुरुआत में किया गया वादा धोखा देने की नीयत से किया गया झूठा वादा नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब दो समझदार वयस्क कई वर्षों तक सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो इसे उनकी स्वेच्छा माना जाएगा। केवल बाद में विवाह न हो पाने को दंडनीय अपराध नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने मुकदमे की कार्यवाही रद्द कर दी।





