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आलू किसानों की मुश्किलें बरकरार, क्रेता-विक्रेता सम्मेलन के बाद भी निर्यात शुरू नहीं

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आलू किसानों को उनकी फसल का बेहतर मूल्य दिलाने और उत्पादन लागत के मुकाबले अधिक आमदनी सुनिश्चित करने के लिए सरकार की ओर से कई प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों की परेशानी अभी कम होती नहीं दिख रही है। आलू की कीमतों में गिरावट और विपणन की कमजोर व्यवस्था के कारण किसान दबाव में हैं। कई क्षेत्रों में हालात ऐसे हैं कि किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए उचित खरीदार तक नहीं मिल पा रहे हैं।
करीब 15 दिन पहले आलू किसानों को घाटे से उबारने के उद्देश्य से क्रेता-विक्रेता सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में प्रदेश के उद्यान, कृषि विपणन और कृषि निर्यात राज्यमंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने हिस्सा लिया था। सम्मेलन में किसानों, व्यापारियों, शीतगृह संचालकों, निर्यातकों और संबंधित विभागों के अधिकारियों के बीच आलू के बेहतर विपणन और किसानों को उचित मूल्य दिलाने पर चर्चा हुई थी। सितंबर में आगरा में भी इसी तरह के दो दिवसीय आलू क्रेता-विक्रेता सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें कई जिलों के किसान और विभिन्न राज्यों के व्यापारी शामिल हुए थे।
सम्मेलन में किसानों को भरोसा दिलाया गया था कि आलू की खपत बढ़ाने, दूसरे राज्यों में बिक्री बढ़ाने और विदेशों में निर्यात की संभावनाओं पर तेजी से काम किया जाएगा। इसके साथ ही किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने और बिचौलियों पर निर्भरता कम करने की बात भी कही गई थी।
हालांकि किसानों का कहना है कि इन घोषणाओं का असर अभी तक बाजार में दिखाई नहीं दिया है। आलू की कीमतों में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है और कई किसान अपनी उपज को बेचने के लिए परेशान हैं। किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उत्पादन लागत निकालना भी मुश्किल होता जा रहा है।
आलू किसानों का कहना है कि खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी, परिवहन और कोल्ड स्टोरेज का खर्च लगातार बढ़ा है। इसके बावजूद यदि मंडियों में उपज का उचित भाव नहीं मिलता है तो उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर होती है।
सरकार की ओर से पहले भी आलू किसानों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की योजना पर जोर दिया गया है। विभागीय स्तर पर अन्य राज्यों में आलू की बिक्री बढ़ाने और निर्यात के अवसर तलाशने की बात कही गई है। सितंबर की शुरुआत में भी उद्यान विभाग की समीक्षा बैठक में आलू किसानों के लिए नए बाजार तलाशने की कार्ययोजना बनाने पर जोर दिया गया था।
हाल के क्रेता-विक्रेता सम्मेलन में जेवर एयरपोर्ट के माध्यम से आलू निर्यात की व्यवस्था विकसित करने का भी उल्लेख किया गया था। योजना के तहत निर्यात से जुड़ी प्रक्रिया और सर्टिफिकेशन की सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही गई थी, ताकि किसानों और किसान उत्पादक संगठनों को विदेशों में आलू भेजने में सहूलियत हो सके।
कुछ प्रस्तावों में मलेशिया और रूस जैसे देशों में उत्तर प्रदेश का आलू भेजने की संभावना भी सामने आई थी। इसके लिए सैंपल भेजे जाने और अक्टूबर से निर्यात शुरू होने की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि किसानों का कहना है कि फिलहाल उन्हें इसका प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिल पाया है।
किसानों की चिंता यह है कि यदि समय रहते आलू की बिक्री नहीं हुई तो उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। आलू लंबे समय तक खुले में नहीं रखा जा सकता और कोल्ड स्टोरेज में रखने पर अतिरिक्त खर्च बढ़ता है। ऐसे में कम कीमत पर बिक्री या उपज खराब होने, दोनों ही स्थितियां किसानों के लिए नुकसान का कारण बन सकती हैं।
कई किसान इस समय दोहरे दबाव में हैं। एक ओर पिछले सीजन की उपज का सही मूल्य नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर अगली फसल की तैयारी के लिए बीज, खाद और अन्य संसाधनों पर खर्च करना है।
किसानों का कहना है कि सरकार को केवल सम्मेलन और बैठकों तक सीमित रहने के बजाय बाजार में वास्तविक खरीद व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। बड़े खरीदारों, प्रसंस्करण कंपनियों और निर्यातकों को सीधे किसानों से जोड़ा जाए तो उन्हें बेहतर कीमत मिल सकती है।
आलू की खपत बढ़ाने के लिए प्रसंस्करण उद्योग को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चिप्स, फ्रेंच फ्राइज, स्टार्च और अन्य उत्पाद बनाने वाली इकाइयों से किसानों को जोड़ने पर अतिरिक्त बाजार तैयार हो सकता है।
सरकार की ओर से पहले भी भंडारण और विपणन व्यवस्था सुधारने के लिए कदम उठाने की बात कही गई है। साथ ही दूसरे राज्यों में आलू की आपूर्ति बढ़ाने के प्रयास किए गए हैं।
इसके बावजूद किसानों का कहना है कि उन्हें तत्काल राहत की जरूरत है। मंडियों में आलू की मांग बढ़े, निर्यात शुरू हो और बड़े खरीदार सीधे खरीद करें, तभी कीमतों में सुधार संभव होगा।
किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या समय की है। यदि अगले कुछ हफ्तों में बाजार नहीं सुधरा तो बड़ी मात्रा में आलू खराब होने की स्थिति बन सकती है। ऐसे में किसानों को अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ सकती है।
किसान संगठनों और उत्पादकों की मांग है कि सरकार तत्काल प्रभाव से आलू की खरीद, परिवहन और निर्यात की स्पष्ट व्यवस्था बनाए। साथ ही दूसरे राज्यों में भी बाजार तलाशे जाएं।
फिलहाल आलू किसानों की निगाह सरकार की उन योजनाओं पर टिकी है, जिनका उल्लेख क्रेता-विक्रेता सम्मेलन में किया गया था। किसान उम्मीद कर रहे हैं कि घोषणाएं जल्द जमीन पर उतरें और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सके।
प्रदेश में आलू उत्पादन से जुड़े हजारों परिवारों के लिए बाजार भाव सीधे उनकी आय से जुड़ा मुद्दा है। यदि विपणन, निर्यात और प्रसंस्करण की व्यवस्था मजबूत होती है तो किसानों को राहत मिल सकती है। अभी स्थिति यह है कि किसान अपनी उपज को लेकर असमंजस में हैं और उन्हें ठोस बाजार समाधान का इंतजार है।





