उत्तर प्रदेश

यूपी चुनाव से पहले सियासी घमासान, ओवैसी ने अखिलेश यादव पर बोला हमला

Kavita2
22 Oct 2026 9:27 AM IST
यूपी चुनाव से पहले सियासी घमासान, ओवैसी ने अखिलेश यादव पर बोला हमला
x

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार करने और संभावित गठबंधनों की संभावनाएं तलाशने में जुट गए हैं। इसी बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ओवैसी लगातार सवाल उठा रहे हैं कि आखिर समाजवादी पार्टी उनकी पार्टी के साथ गठबंधन करने से क्यों बच रही है। उन्होंने सपा नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति और मुस्लिम प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर भी सवाल खड़े किए हैं।

ओवैसी का कहना है कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को लगातार तीसरी बार सत्ता में आने से रोकना चाहती है। इसके लिए AIMIM विपक्षी दलों के साथ गठबंधन करने को तैयार है। हालांकि, समाजवादी पार्टी की ओर से अभी तक उनके प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख सामने नहीं आया है। इस स्थिति ने दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरियां और बढ़ा दी हैं।

अखिलेश यादव से ओवैसी ने पूछा बड़ा सवाल

असदुद्दीन ओवैसी ने समाजवादी पार्टी की राजनीतिक रणनीति पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को हराने की बात करते हैं, तो AIMIM को साथ लेने से परहेज क्यों किया जा रहा है।

ओवैसी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि यदि विपक्ष का वास्तविक उद्देश्य भाजपा को हराना है, तो समान राजनीतिक लक्ष्य रखने वाले दलों को एक मंच पर आने पर विचार करना चाहिए।

उनका कहना है कि AIMIM को केवल मुस्लिम मतदाताओं से जुड़ी पार्टी मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है। पार्टी समाज के वंचित वर्गों के राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व के सवाल को भी प्रमुखता से उठा रही है।

ओवैसी की इन टिप्पणियों को समाजवादी पार्टी पर गठबंधन के लिए राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

भाजपा को रोकने के लिए गठबंधन की पेशकश

ओवैसी ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को सत्ता से बाहर करने के उद्देश्य से विपक्षी दलों को एकजुट होने का प्रस्ताव दिया है। सितंबर में कानपुर की एक जनसभा के दौरान उन्होंने कहा था कि AIMIM नहीं चाहती कि उत्तर प्रदेश में तीसरी बार भाजपा की सरकार बने।

उन्होंने विपक्षी दलों से राजनीतिक मतभेद भुलाकर चुनावी समझौते की संभावनाओं पर चर्चा करने की अपील की थी।

ओवैसी ने गठबंधन के लिए दो अक्टूबर तक इंतजार करने की बात भी कही थी। हालांकि, निर्धारित तारीख बीतने के बाद भी समाजवादी पार्टी और AIMIM के बीच किसी औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई।

पांच अक्टूबर को लखनऊ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान भी उन्होंने दोहराया कि उनकी पार्टी गठबंधन के सवाल पर अपना पक्ष स्पष्ट कर चुकी है। उन्होंने कहा कि जब कोई समझौता होगा, तो उसकी जानकारी सार्वजनिक कर दी जाएगी।

अखिलेश यादव ने साफ किया अपना रुख

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी गठबंधन नीति स्पष्ट कर दी है।

तीन अक्टूबर को अखिलेश यादव ने कहा था कि उनकी पार्टी उन्हीं सहयोगियों के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी, जिन्होंने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को चुनौती दी थी।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली प्रदर्शन कर चुका है। ऐसे में अखिलेश यादव मौजूदा राजनीतिक समीकरण को बरकरार रखने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।

अखिलेश के इस रुख से संकेत मिलता है कि फिलहाल समाजवादी पार्टी AIMIM को अपने गठबंधन में शामिल करने की योजना नहीं बना रही है। हालांकि, राजनीति में भविष्य के समीकरणों की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।

मुस्लिम वोट बैंक को लेकर बढ़ी राजनीतिक लड़ाई

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। समाजवादी पार्टी को मुस्लिम और यादव मतदाताओं के पारंपरिक समर्थन का लाभ मिलता रहा है।

वहीं असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

ओवैसी का तर्क है कि मुस्लिम समुदाय को केवल चुनावी वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक दलों में मुस्लिम नेताओं की भागीदारी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व बढ़ाने की आवश्यकता बताई है।

आजमगढ़ में आयोजित एक जनसभा में भी ओवैसी ने समाजवादी पार्टी की आलोचना करते हुए मुस्लिम नेतृत्व को आगे बढ़ाने का मुद्दा उठाया था।

राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से देखा जाए तो दोनों दलों के बीच मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन हासिल करने की प्रतिस्पर्धा आगामी विधानसभा चुनाव को प्रभावित कर सकती है।

2024 के लोकसभा चुनाव से बढ़ा सपा का आत्मविश्वास

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन किया था।

प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटों पर जीत हासिल की थी। इस तरह दोनों दलों के गठबंधन को 43 सीटें मिली थीं।

इस चुनावी सफलता ने अखिलेश यादव की राजनीतिक रणनीति को मजबूती दी। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनाव में भी मौजूदा सहयोगियों के साथ आगे बढ़ना चाहती है।

हालांकि, लोकसभा और विधानसभा चुनाव के राजनीतिक मुद्दे अलग-अलग हो सकते हैं। स्थानीय उम्मीदवारों, जातीय समीकरणों और क्षेत्रीय दलों की भूमिका विधानसभा चुनाव में अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।

विपक्षी वोटों के बंटवारे का खतरा

उत्तर प्रदेश में यदि समाजवादी पार्टी और AIMIM अलग-अलग चुनाव लड़ती हैं, तो कुछ सीटों पर विपक्षी मतों का बंटवारा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव उम्मीदवारों, स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों और मतदाताओं की प्राथमिकताओं पर निर्भर करेगा।

ओवैसी अपनी पार्टी के लिए अधिक राजनीतिक हिस्सेदारी चाहते हैं, जबकि अखिलेश यादव पहले से स्थापित गठबंधन को बनाए रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं।

इस बीच भारतीय जनता पार्टी भी विपक्षी दलों के बीच मतभेदों को राजनीतिक मुद्दा बना सकती है। भाजपा का लक्ष्य उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना होगा।

2027 के चुनाव में किसका पलड़ा रहेगा भारी?

उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों के लिए होने वाला अगला चुनाव प्रदेश की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा सत्ता बरकरार रखने की कोशिश करेगी, जबकि समाजवादी पार्टी सत्ता में वापसी के लिए अपनी चुनावी रणनीति तैयार कर रही है।

वहीं AIMIM अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करने और अधिक सीटों पर प्रभाव स्थापित करने की कोशिश में जुटी है।

फिलहाल ओवैसी और अखिलेश यादव के बीच गठबंधन को लेकर जारी बयानबाजी ने उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति को नया मुद्दा दे दिया है।

अब देखना होगा कि दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरियां कम होती हैं या AIMIM अलग गठबंधन अथवा स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का रास्ता अपनाती है। इतना तय है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की राजनीति, मुस्लिम प्रतिनिधित्व और विपक्षी एकजुटता का मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहेगा।

Next Story