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दो वयस्कों की शादी पर पुलिस कार्रवाई गलत, हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बालिग व्यक्तियों के विवाह और निजी जीवन में पुलिस हस्तक्षेप को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि दो वयस्क लोगों द्वारा अपनी मर्जी से किए गए विवाह की जांच करना पुलिस का काम नहीं है। पुलिस की जिम्मेदारी अपराधों की जांच करना है, न कि किसी बालिग व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में अनावश्यक दखल देना।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक वयस्क नागरिक को अपने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इसमें अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने और उसके साथ रहने की स्वतंत्रता भी शामिल है।
अदालत ने सौंभागिनी शुक्ला और उनके पति प्रवि गुप्ता की ओर से दाखिल याचिका को स्वीकार करते हुए भदोही जिले के सुरियावां थाने में दर्ज अपहरण संबंधी एफआईआर को रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि दोनों पक्ष बालिग हैं और उन्होंने अपनी इच्छा से विवाह किया है, इसलिए उनके वैवाहिक संबंधों में पुलिस कार्रवाई का कोई आधार नहीं बनता।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि सौंभागिनी शुक्ला और प्रवि गुप्ता दोनों वयस्क हैं और पिछले करीब एक साल से एक-दूसरे के संपर्क में थे। दोनों ने 18 फरवरी 2026 को प्रयागराज स्थित आर्य वैदिक सभा में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार विवाह किया था। विवाह के बाद दोनों अपनी इच्छा से साथ रह रहे थे।
मामले में विवाद तब शुरू हुआ जब युवती के परिवार को इस विवाह की जानकारी मिली। युवती के पिता ने शादी का विरोध करते हुए भदोही के सुरियावां थाने में अपहरण की एफआईआर दर्ज करा दी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि युवती को बहला-फुसलाकर ले जाया गया है। इसके बाद दंपती ने हाईकोर्ट का रुख किया और एफआईआर रद्द करने की मांग की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों की उम्र और विवाह से जुड़े दस्तावेजों पर गौर किया। कोर्ट ने कहा कि जब दोनों व्यक्ति बालिग हैं और अपनी इच्छा से जीवनसाथी चुन चुके हैं तो किसी बाहरी दबाव या शिकायत के आधार पर उनके निजी जीवन में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसले लेने की स्वतंत्रता संविधान द्वारा दी गई है। विवाह करना या किसी के साथ जीवन बिताना व्यक्ति की निजी पसंद का विषय है। केवल परिवार की असहमति या सामाजिक दबाव के आधार पर पुलिस कार्रवाई शुरू करना उचित नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस को अपनी भूमिका और अधिकार क्षेत्र को समझना चाहिए। पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अपराधों की जांच करना है। लेकिन जब मामला दो बालिग व्यक्तियों की सहमति से हुए विवाह का हो, तो पुलिस को उसमें हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वयस्कों के अधिकारों को मजबूत करने वाला है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद और जीवन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार देता है।
इस फैसले के बाद यह भी साफ हो गया है कि केवल परिवार की नाराजगी या सामाजिक आपत्ति के आधार पर बालिग दंपती के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत ने एक बार फिर दोहराया कि संविधान में मिली व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोच्च है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए।





